Tuesday, 26 September 2017

सतावर की खेती

सतावर की खेती

https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/Asparagus-farming.html         / Asparagus racemosus /  शतावर , शतावरी , सतावरी , सतमूल और सतमूली



सतावर (वानस्पतिक नाम: Asparagus racemosus / ऐस्पेरेगस रेसीमोसस) लिलिएसी कुल का एक औषधीय गुणों वाला पादप है। इसे 'शतावर', 'शतावरी', 'सतावरी', 'सतमूल' और 'सतमूली' के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत, श्री लंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। 
इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है। इसकी जड़ें गुच्छों के रूप में होतीं हैं। वर्तमान समय में इस पौधे पर लुप्त होने का खतरा है।
एक और काँटे रहित जाति हिमलाय में 4 से 9 हजार फीट की ऊँचाई तक मिलती है, जिसे एस्पेरेगस फिलिसिनस नाम से जाना जाता है।

यह 1 से 2 मीटर तक लंबी बेल होती है जो हर तरह के जंगलों और मैदानी इलाकों में पाई जाती है। 
आयुर्वेद में इसे ‘औषधियों की रानी’ माना जाता है। इसकी गांठ या कंद का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जो महत्वपूर्ण रासायनिक घटक पाए जाते हैं वे हैं ऐस्मेरेगेमीन ए नामक पॉलिसाइक्लिक एल्कालॉइड, स्टेराइडल सैपोनिन, शैटेवैरोसाइड ए, शैटेवैरोसाइड बी, फिलियास्पैरोसाइड सी और आइसोफ्लेवोंस। सतावर का इस्तेमाल दर्द कम करने, महिलाओं में स्तन्य (दूध) की मात्रा बढ़ाने, मूत्र विसर्जनं के समय होने वाली जलन को कम करने और कामोत्तेजक के रूप में किया जाता है। 
इसकी जड़ तंत्रिका प्रणाली और पाचन तंत्र की बीमारियों के इलाज, ट्यूमर, गले के संक्रमण, ब्रोंकाइटिस और कमजोरी में फायदेमंद होती है। 
यह पौधा कम भूख लगने व अनिद्रा की बीमारी में भी फायदेमंद है। अतिसक्रिय बच्चों और ऐसे लोगों को जिनका वजन कम है, उन्हें भी ऐस्पैरेगस से फायदा होता है। इसे महिलाओं के लिए एक बढ़िया टॉनिक माना जाता है। 
इसका इस्तेमाल कामोत्तेजना की कमी और पुरुषों व महिलाओं में बांझपन को दूर करने और रजोनिवृत्ति के लक्षणों के इलाज में भी होता है।

सतावर जड़ वाली एक औषधीय फसल है जिसकी मांसल जड़ों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण में होता है। सतावर को लोग भिन्न-भिन्न नाम से पुकारते हैं। अंग्रेज लोग इसे एस्पेरेगस कहते हैं। कहीं इसे लोग शतमली तो कहीं शतवीर्या कहते हैं। सतावर कहीं वहुसुत्ता के नाम से विख्यात है तो कहीं यह शतावरी के नाम से भी। 
यह औषधीय फसल भारत के विभिन्न प्रांतों में प्राकृतिक अवस्था में भी खूब पाई जाती है। विश्व में सतावर भारत के अतिरिक्त ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, चीन, बांग्लादेश तथा अफ्रीका में भी पाया जाता है। सतावर का प्रयोग मुख्य रूप से औषधि के रूप में किया जाता है। इसका इस्तेमाल बलवर्धक, स्तनपान करने वाली महिलाओं के लिए लाभकारी दवाइयों व शारीरिक स्फूर्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसके साथ-साथ सतावर के नियमित सेवन से ल्युकोरिया व एनीमिया जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है।

सतावर का वानस्पतिक विवरण

सतावर का पौधा झाड़ीदार, कांटेदार लता होता है। इसकी शाखाएं पतली होती हैं। पत्तियां सुई के समान होती हैं जो 1.5-2.5 सेमी तक लम्बी होती हैं। इसके कांटे टेढ़े तथा 6-8 सेंमी लम्बे होते हैं। इसकी शाखाएं चारों ओर फैली होती हैं। इसके फूल सफेद या गुलाबी रंग के सुगंधयुक्त, छोटे, अनेक शाखाओं वाले डंठल पर लगते हैं जो फरवरी और मार्च में फूलते हैं। अप्रैल में फल बढ़कर बड़े-बड़े हो जाते हैं। फल मटर के समान 1-2 बीज युक्त होते हैं। इसके बीज पकने पर काले होते हैं। इसकी जड़े कन्दवत 20-30 सेंमी लम्बी, 1-2 सेंमी मोटी तथा गुच्छे में पैदा होती हैं। जड़ों की संख्या प्रति लता में 60-100 तक होती है। ये जड़े धूसर पीले रंग की हल्की सुगंधयुक्त स्वाद में कुछ मधुर तथा कड़वी लगती हैं। मांसल जड़ों को आदिवासी लोग पूरे पकने पर चाव से खाते हैं। यह सूखने पर भी प्रयोग में लाई जाती हैं। इन्हीं श्वेत जड़ों का प्रयोग चिकित्सा कार्य हेतु होता है। सूखी जड़े बाजार में सतावर के नाम से बेची जाती है। जिसमें सतावरिन-1 तथा सतावरिन-4 में ग्लूकोसाइड रसायन प्रमुख रूप से पाया जाता है। यही रसायन इसके औषधीय गुणों का स्रोत है।

कैसे करें खेती 

सतावर की खेती के लिए मध्यम तापमान अच्छा माना जाता है। खेती के लिए उचित तापमान 10 से 50 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसकी खेती के लिए जुलाई-अगस्त में 2-3 बार खेत की पहली जुताई कर लेनी चाहिए। इसमें प्रति एकड़ के दर से 10 टन गोबर की खाद मिला देनी चाहिए। दूसरी जुताई नवंबर के शुरुआती दिनों में होती है।

 पौध की तैयारी

जोते गए खेत में 10 मीटर की क्यारियां बनाकर इसमें 4 और 2 के अनुपात में मिट्टी व गोबर की खाद मिलाकर डालनी चाहिए। प्रति एकड़ पांच किलोग्राम बीज की ज़रूरत होती है। अगस्त में ही क्यारियों में बीजों की बुआई कर देनी चाहिए सतावर के बीजों की खरीद के बारे वीरेंद्र बताते हैं, ''यूं तो सतावर की कई प्रजातियां पाई जाती हैं पर मुख्य रूप से दो प्रजातियों (पिली या नैपाली सतावर, बेल या देसी सतावर) को बोया जाता है। इसके बीच निजी दुकानों व सीमैप से आसानी से मिल जाते हैं।" एक हेक्टेयर के खेत में 3 से 4 किलो सतावर के बीज डाले जाते हैं। बाज़ार में इसका मूल्य 1000 रुपए प्रति किलो के हिसाब से है।

 सिंचाई 

सतावर की खेती में ज़्यादा पानी की ज़रुरत नहीं होती है। पौधे लगाने के एक सप्ताह के भीतर हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। यह सिंचाई पौधों के लिए पर्याप्त होती है। दूसरी हल्की सिंचाई पौधों के बड़े होने के बाद करनी चाहिए।
सतावर की खेती में सही समय पर खुदाई बेहद जरूरी होती है 'दूसरी सिंचाई के बाद जब पौध पीली पडऩे लगें तब इसकी रसदार जड़ों की खुदाई कर लेनी चाहिए। इसी समय किसान दूसरी फसल के लिए खेत तैयार कर सकता है।"

निराई-गुड़ाई

 सतावर के पौधों की जड़ों के समुचित विकास के लिए खेत को खरपतवार रहित रखना तथा मिट्टी को भुरभुरी बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए एक दो निराई-गुड़ाई आवश्यक है। निराई-गुड़ाई के दरम्यान पौधों की जड़ों पर हल्की मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

खोदी जड़ों को सुखाना जरूरी

खोदकर निकाली गई रसदार जड़ों को साफ  कर अलग-अलग करके हल्की धूप में सुखने के लिए छोड़ देना चाहिए। 

सतावर का बाज़ार

प्रति एकड़ के खेत में 300 से 350  क्विंटल गीली जड़ मिलती है जो सूखने के बाद 40 से 50 क्विंटल प्राप्त होती है । वर्तमान समय में सतावर की जड़ 250 से 300 रुपए प्रति किलो के रेट पर बिकती है।


मधुमक्खी पालन

मधुमक्खी पालन कैसे करें (How do you follow beekeeping)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/beekeeping.html / beekeeping photos india



मधुमक्खी पालन कृषि से ही जुड़ा एक व्यवसाय है । जिसमें कम लागत और अधिक मुनाफा है । कृषि से जुड़े लोग या फिर बेरोजगार युवक इस व्यवसाय को आसानी से अपना सकते है । कृषिभूमि आपको यह व्यवसाय करने की राह बताने जा रहा है ।

मधुमक्खी पालन उद्योग करनेवालों की खादी ग्राम उद्योग कई मात्रा में मदद करता है ।  मधुमक्खी पालन एक लघु व्यवसाय है, जिससे शहद एवं मोम प्राप्त होता है। यह एक ऐसा व्यवसाय है, जो ग्रामीण क्षेत्रों के विकास का पर्याय बनता जा रहा है। गौर करनेवाली बात यह है कि शहद उत्पादन के मामले में भारत पांचवें स्थान पर है।

मधुमक्खी के प्रकार

इस व्यवसाय के लिए चार तरह की मधुमक्खियां इस्तेमाल होती हैं। ये हैं- एपिस मेलीफेरा, एपिस इंडिका, एपिस डोरसाला और एपिस फ्लोरिया। इस व्यवसाय के लिए एपिस मेलीफेरा मक्खियां ही अधिक शहद उत्पादन करने वाली और स्वभाव की शांत होती हैं। इन्हें डिब्बों में आसानी से पाला जा सकता है। इस प्रजाति की रानी मक्खी में अंडे देने की क्षमता भी अधिक होती है।

सामग्री

मधुमक्खी पालन के लिए लकड़ी का बॉक्स, बॉक्सफ्रेम, मुंह पर ढकने के लिए जालीदार कवर, दस्तानें, चाकू, शहद, रिमूविंग मशीन, शहद इकट्ठा करने के लिए ड्रम

सावधानी  

जहां मधुमक्खियां पाली जाएं, उसके आसपास की जमीन साफ-सुथरी होनी चाहिए। बड़े चींटे, मोमभझी कीड़े, छिपकली, चूहे, गिरगिट तथा भालू मधुमक्खियों के दुश्मन हैं, इनसे बचाव के पूरे इंतजाम होने चाहिए।

उपयुक्त वातावरण

फूलों की खेती के साथ यह उद्योग अधिक फायदेमंद होता है । जिससे  20 से 80 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो जाती है। सूरजमुखी, गाजर, मिर्च, सोयाबीन, पॉपीलेनटिल्स ग्रैम, फलदार पेडमें जैसे नींबू, कीनू, आंवला, पपीता, अमरूद, आम, संतरा, मौसमी, अंगूर, यूकेलिप्टस और गुलमोहर जैसे पेडवाले क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन आसानी से किया जा सकता है ।

उपयुक्त समय

मधुमक्खी पालन के लिए जनवरी से मार्च का समय सबसे उपयुक्त है, लेकिन नवंबर से फरवरी का समय तो इस व्यवसाय के लिए वरदान है।

लागत

पचास डिब्बे वाली इकाई पर करीब दो लाख रुपए तक का खर्च आता है ।

ऋण-व्यवस्था

इस उद्योग के लिए सरकार ने राष्ट्रीयकृत बैंकों से लोन सुविधा उपलब्ध करवाई है। इस व्यवसाय के लिए 2 से 5 लाख रुपए तक का लोन उपलब्ध है, चूंकि यह उद्योग लघु उद्योग श्रेणी के अंतर्गत आता है। इस उद्योग की जानकारी के लिए उद्यान विभाग से भी संपर्क कर सकते है |

प्रशिक्षण

शहद उत्पन्न करने के लिए उचित वातावरण, नए-नए उपकरण एवं प्रबंध की जानकारी, उत्पादन के लिए उच्चकोटि की तकनीक, अधिक शहद देने वाली मधुमक्खियों की प्रजातियां, नस्ल सुधार एवं रोगों से बचने की सम्यक जानकारी तथा वैज्ञानिक विधि से मधुमक्खी पालन में नवनिर्मित तकनीक आदि का ज्ञान दिया जाता है।

योग्यता

मधुमक्खी पालन से संबंधित कई तरह के सर्टिफिकेट, डिप्लोमा अथवा डिग्री कोर्स किए जा सकते हैं। डिप्लोमा करने वाले अभ्यर्थी के लिए साइंस स्ट्रीम से स्नातक होना जरूरी है, जबकि हॉबी कोर्स के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं होती। प्रशिक्षण के लिए एक हफ्ते से लेकर 9 महीने तक का कोर्स उपलब्ध है। कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति, जो इस व्यवसाय में दिलचस्पी रखता हो, वह भी प्रशिक्षण प्राप्त कर अपना व्यवसाय शुरू कर सकता है। प्रशिक्षण शुल्क फीस 500 से लेकर 4000 रुपए तक है।

प्रशिक्षण संस्थान

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा रोड, नई दिल्ली
नेशनल बी बोर्ड
बी इंस्टीटय़ूशनल एरिया, अगस्त क्रांति मार्ग, हौज खास, नई दिल्ली
निदेशक, उद्यान विभाग, कृषि पंत भवन, जयपुर, राजस्थान
ल्यूपिन ह्यूपिन वेलफेयर एंड रिसर्च फाउंडेशन, कृष्णानगर, भरतपुर, राजस्थान
राष्ट्रीय बागबानी बोर्ड, लालकोठी, जयपुर, राजस्थान
मधुमक्खी पालन एंड शोध संस्थान कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा
ज्योति ग्रामोद्योग संस्थान, गंगोह, सहारनपुर,
उत्तर प्रदेश
मधुमक्खी प्रशिक्षण केंद्र, हल्द्वानी, नैनीताल
मधुमक्खी पालन प्रशिक्षण केंद्र, जनमहादेव रोड, खादी ग्रामोद्योग, देहरादून
केन्द्रीय मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान,
ग्रामोद्योग आयोग, गणेशखिंड रोड, पुणे (महाराष्ट्र)
उपर्युक्त जानकारी की मदद से अब जरूर आप मधुमक्खी पालन उद्योग आरम्भ कर सकते है ।


Monday, 25 September 2017

अमरूद की उन्नत खेती

अमरूद की उन्नत खेती (Advanced cultivation of guava)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/Advanced-cultivation-of-guava.html अमरूद की उन्नत खेती (Advanced cultivation of guava) / amrud (guava) tree photos , fruits





अमरूद भारत का एक लोकप्रिय फल है। क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से देश में उगाये जाने वाले फलों में अमरूद का चौथा स्थान है। यह विटामिन-सी का मुख्य स्त्रोत है। यह असिंचित एंव सिंचित क्षेत्रों में सभी प्रकार की ज़मीन में उगाया जा सकता है।

भूमि एवं जलवायु:

अमरूद को लगभग प्रत्येक प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है, परन्तु अच्छे उत्पादन के लिये उपजाऊ बलुई दुमट भूमि अच्छी पाई गई है। इसके उत्पादन हेतु 6 से 7.5 पी.एच. मान की मृदा उपयुक्त होती है किन्तु 7.5 से अधिक पी.एच. मान की मृदा में उकठा रोग के प्रकोप की संभावना होती है। अमरूद को उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में सफलता पूर्वक पैदा किया जा सकता है, परन्तु अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, अमरूद की खेती के लिये उपयुक्त नहीं होते हैं। अमरूद की खेती के लिये 15 डिग्री. से. 30 डिग्री से. तापमान अनुकूल होता है। यह सूखे को भी भली-भाँति सहन कर लेता है। तापमान के अधिक उतार चढ़ाव, गर्म हवा, कम वर्षा, जलक्रान्ति का फलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता है। अमरूद को मध्यप्रदेश के सभी जि़लों में उगाया जा सकता है ।

उन्नत किस्में:

 अमरूद की व्यावयायिक स्तर पर उगाई जाने वाली किस्मों में से इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ-49, चित्तीदार, ग्वालियर-27, एपिल-गुवावा एवं धारीदार प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त अर्का-मृदुला, श्वेता, ललित एवं पंत-प्रभात किस्में व्यवसायिक उत्पादन हेतु उपयोग में लाई जा सकती हैं। कोहीर, सफेदा एवं सफेद जाम नामक संकर प्रजातियाँ भी उपयोग में लाई जा सकती हैं।

 इलाहाबाद-सफेदा:

 इस किस्म के पेड़ सीधे बढ़ने वाले एवं मध्यम ऊँचाई वाले होते हैं । फल का आकार मध्यम, गोलाकार एंव औसत वजन 180 ग्राम होता है। फल की सतह चिकनी, छिल्का पीला, गूदा मुलायम, रंग सफेद, सुविकसित और स्वाद मीठा होता है। बीज बड़े एवं कड़े होते हैं। इस किस्म की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।

लखनऊ-49 (सरदार अमरूद):

 इस किस्म के पेड़ मध्यम ऊँचाई के, फलने वाले तथा अधिक शाखाओं वाले होते हैं। फल मध्यम से बडे़, गोल, अंडाकार, खुरदुरी सतह वाले एवं पीले रंग के होते हैं। गूदा मूलायम, सफेद तथा स्वाद खटास लिये हुये मीठा होता है। इसकी भंडारण क्षमता अन्य जातियों की तुलना में अच्छी होती है तथा इसमें उकठा रोग का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है।

चित्तीदार:

यह किस्म सफेदा के समान होती है। परन्तु फलों की सतह पर लाल रंग के धब्बे पाये जाते हैं। इसके बीज मुलायम तथा छोटे होते हैं । फल मध्यम, अंडाकार, चिकने एवं हल्के पीले रंग के होते हैं। गूदा मुलायम, सफेद, सुवास युक्त मीठा होता है।

एप्पल-कलर:

 इस किस्म के भी पौधे मध्यम ऊँचाई के एवं फैले हुये होते हैं। फल गोल एवं चिकने होते हैं। छिल्का गुलाबी या हरे लाल रंग का होता है। फलों का गूदा मुलायम, सफेद एवं सुवास युक्त होता है। बीज मध्यम आकार के होते हैं तथा फलों की भंडारण क्षमता मध्यम होती है।

अर्का-मृदुला:

 यह जाति इलाहाबाद सफेदा से पौधे चुनाव विधि के द्वारा विकसित की गई है। फल चिकने, मध्यम आकार, मुलायम बीज, गूदा सफेद एवं मीठा होता है। इस किस्म में प्रचुर मात्रा में विटामिन-सी पाई जाती है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।

ललित:

 यह किस्म सी.आई.एस.एच. लखनऊ द्वारा विकसित की गई है। फल मध्यम आकार एवं केशरनुमा आकर्षक पीले रंग के होते हैं। गूदा गुलाबी रंग का होता है। जिसके कारण यह किस्म संरक्षित पदार्थों को बनाने हेतु उपयुक्त होती है। यह किस्म इलाहाबाद सफेदा की अपेक्षा 24 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन देती है। फल का वजन 250 से 300 ग्राम तक होता है ।

संकर जातियाँ अमरूद की संकर जातियाँ इस प्रकार हैं:

अर्का-अमूल्या:

 यह जाति सीडलेस एंव इलाहाबाद सफेदा के संकरण से तैयार की गई है। इसके वृक्ष मध्यम आकार के एवं अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। फल मध्यम आकार (180-200 ग्राम), सफेद रंग, गूदा मीठा, मुलायम एवं बीज छोटे होते हैं। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।

प्रसारण तथा प्रवर्धन:

 अमरूद का प्रसार व्यवसायिक स्तर पर वानस्पतिक विधियों द्वारा किया जा सकता है अतः अमरूद का बाग लगाने के लिये वानस्पतिक विधियों द्वारा तैयार पौधों का ही उपयोग करें। इसके व्यावसायिक प्रसार के लिये पेंच कलिकायन एवं उपरोपण विधि का उपयोग किया जाना उत्तम पाया गया है ।

पादप रोपणः

 पादप रोपण द्वारा अमरूद के पौधे लगाने का मुख्य समय जुलाई से अगस्त तक है लेकिन जिन स्थानों में सिंचाई की सुविधा हो वहाँ पर पौधे फरवरी-मार्च में भी लगाये जा सकते हैं। बाग लगाने के लिये खेत को समतल करने के पश्चात् रेखांकन कर पौधे लगाने के लिये निश्चित दूरी पर 60 सें.मी X 60 सें.मी. X 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार करें। इन गड्ढों को 15-20 कि.ग्रा. अच्छी तैयार हुई गोबर की खाद, 500 ग्राम सुपर फॉस्फेट, 250 ग्राम पोटाश तथा 100 ग्राम मिथाईल पैराथियॉन पाऊडर को अच्छी तरह से मिट्टी में मिला कर पौधे लगाने के 15-20 दिन पहले भर दें। बाग में पौधे लगाने की दूरी मृदा की उर्वरता, किस्म विशेष एवं जलवायु पर निर्भर करती है। इस प्रकार कम उपजाऊ भूमि में 6 मी. X 6 मी. एवं 6.5 मी. X 6.5 मी. की दूरी पर पौधे लगायें।

सघन बागवानी/रोपण:

अमरूद की सघन बागवानी के बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं। सघन रोपण में प्रति हैक्टेयर 500 से 5000 पौधे तक लगाये जा सकते हैं तथा समय-समय पर कटाई-छँटाई करके एवं वृद्धि नियंत्रकों का प्रयोग करके पौधों का आकार छोटा रखा जाता है। इस तरह की बागवानी से 30 टन से 50 टन तक उत्पादन/है. लिया जा सकता है। जबकि पारम्परिक विधि से लगाये गये बगीचों का उत्पादन 15-20 टन/है. होता है।

 (अ) 3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 1.5 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 2222 पौधे/हैक्टेयर।

 (ब) 3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 3 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 1111 पौधे/हैक्टेयर।

 (स) 6 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 1.5 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 555 पौधे/हैक्टेयर।

खाद एवं उर्वरक:

 अमरूद की संतोषजनक वृद्धि एवं उत्पादन के लिये पर्याप्त मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। अमरूद को मुख्य एवं सूक्ष्म तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश युक्त तत्वों की काफी मात्रा में आवश्यकता होती है। जस्ते एवं बोरॉन तत्वों की कम मात्रा में अवश्यकता पड़ती है। अमरूद के कुछ बागों/पौधों में जस्ते की कमी देखी गई है। इसकी कमी से पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है, बहुत सी छोटी व नुकीली पत्तियाँ गुच्छों के रूप में निकलती हैं और पत्तियों के नसों का रंग हल्का पीला हो जाता है। बहुत अधिक कमी होने पर पेड़ों की शाखायें ऊपर की तरफ से सूखना प्रारंभ कर देती हैं । पौधों में फूल कम आते हैं एवं जो फल लगते हैं, फटकर सूख जाते हैं। बोरॉन की कमी से फलों के अन्दर, बीजों के पास एक धब्बा बन जाता है जो गूदे की तरफ बढ़ कर गूदे को भूरे या काले रंग का कर देता है जिससे प्रभावित भाग कड़ा हो जाता है तथा फलों का आकार छोटा हो जाता है।

अतः पौधों की उत्तम वृद्धि एवं उत्पादन के लिये खाद एवं उर्वरकों की निम्नलिखित मात्रा का प्रयोग करें -

अमरूद के लिये खाद एवं उर्वरक की मात्रा

क्र.      पौधों की आयु (वर्षों में)        गोबर खाद(कि.ग्रा.)      नत्रजन(ग्राम)       स्फुर(ग्राम)        पोटाश  (ग्राम)
1.        1                                             10                   50                     30                50
2.        2                                              20                  100                   60              100
3.        3                                               30                 150                   90              150
4.        4                                               40                  200                 120             200
5.        5                                               50                  250                 150             250
6.            6 वर्ष एवं ऊपर                          60                   300                 180             300

उपरोक्त खाद एवं उर्वरकों के अतिरिक्त 0.5 प्रतिशत ज़िंक सल्फेट, 0.4 प्रतिशत बोरिक ऐसिड एवं 0.4 प्रतिशत कॉपर सल्फेट का छिड़काव फूल आने के पहले करने से पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन बढ़ाने में सफलता मिलेगी।

जैविक खाद:

 अमरूद में नीम की खली 6 कि.ग्रा. प्रति पौधा डालने से उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्तम गुण वाले फल प्राप्त करें। गोबर की खाद 40 कि.ग्रा. अथवा 4 कि.ग्रा. वर्मी कम्पोस्ट के साथ 100 ग्राम जैविक खाद जैसे एज़ोस्पाईरिलम, व्ही.ए.एम. एवं पी.एस.एम. के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि एवं अच्छी गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन होगा।

खाद देने का समय एवं विधि:

अमरूद में पोषक तत्व खींचने वाली जड़ें तने के आस-पास एवं 30 सें.मी. की गहराई में होती है। इसलिये खाद देते समय इस बात का ध्यान रखें कि खाद, पेड़ के फैलाव में 15-20 सें.मी. की गहराई में थाला बनाकर दें । गोबर की खाद, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा जून-जुलाई में तथा शेष नत्रजन की मात्रा सितम्बर-अक्टूबर में वर्षा समाप्त होने से पहले दें।

सिंचाई:

 अमरूद के एक से दो वर्ष पुराने पौधों की सिंचाई, भारी भूमि में 10-15 दिन के अन्तर से तथा हल्की भूमि में 5-7 दिन के अन्तर से करें। गर्मियों में सिंचाई का अंतराल कम करें व सिंचाई जल्दी-जल्दी करें। दो वर्ष से अधिक उम्र के पौधों को भारी भूमि में 20 दिन तथा हल्की भूमि में 10 दिन के अन्तर से थाला बनाकर पानी दें। पुराने एवं फलदार पेड़ों की सिंचाई, वर्षा के बाद 20-25 दिन के अंतर से, जब तक फसल बढ़ती है, करते रहें तथा फसल तोड़ने के बाद सिंचाई बंद कर दें।

मल्चिंग/बिछावन:

 असिंचित क्षेत्रों में वर्षा के जल को अमरूद के पौधो के चारों ओर थाला बना कर सिंचित करें तथा सितम्बर माह में घास एवं पत्तियाँ बिछा कर नमी को संरक्षित करें। इससे उत्पादन में वृद्धि होकर उत्तम गुण वाले फल प्राप्त होंगे ।

कटाई-छँटाईः

 प्रारंभिक वर्ष में कटाई-छँटाई का कार्य कर पौधों को आकार दें। पौधों को साधने के लिये सबसे पहले उन्हें 60-90 सें.मी. तक सीधा बढ़ने दें। फिर इस ऊँचाई के बाद 15-20 से.मी. के अंतर पर 3-4 शाखायें चुन लें। इसके पश्चात् मुख्य तने के शीर्ष एवं किनारे की शाखाओं की कटाई एवं छँटाई करें जिससे पेड़ का आकार नियंत्रित रहे। बड़े पेड़ों से सूखी तथा रोगग्रस्त टहनियों को अलग करें। तने के आस-पास भूमि की सतह से निकलने वाले कल्लों को निकालते रहें। पुराने पौधे जिनकी उत्पादन क्षमता घट गई हो उनकी मुख्य एवं द्वितीयक शाखाओं की कटाई करें जिससे नई शाखायें आयेंगी तथा पुराने पौधों की उत्पादन क्षमता बढे़गी।

अन्तरवर्तीय फसलें:

 प्रारंभिक दो-तीन वर्षों में बगीचों के रिक्त स्थानों में रबी में मटर,फ्रैंचबीन, गोभी एवं मेथी, खरीफ में लोबिया, ज्वार, उर्द, मूँग एवं सोयाबीन तथा ज़ायद (गर्मी की फसल) में कद्दू वर्गीय सब्ज़ियाँ उगायें।

फलन उपचार (बहार ट्रीटमैंट):

 अमरूद में आमतौर पर वर्ष में एक मुख्य शीतकालीन फसल (हस्त बहार) लेने का सुझाव दिया जाता है जबकि अमरूद में वर्ष में तीन बार फूल आते हैं । अतः गर्मी एवं वर्षा ऋतु में आने वाले फूलों को सिंचाई रोककर प्रतिबंधित करना उचित होता है। वर्षाकालीन फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप अधिक होता है। जबकि सर्दी की फसल के फल उत्तम गुण वाले होते हैं तथा फलों में विटामिन-सी की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। वर्षाकालीन फसल को बाज़ार में अच्छा मूल्य नहीं मिल पाता है। अतः ठंड की फसल लेने की सिफारिश की जाती है।

वर्षाकालीन फसल को रोक कर ठंड की फसल लेने के लिये निम्नलिखित उपाय करें –

 1. अप्रैल से जून तक पौधों को पानी नहीं दें। पानी रोकने की यह क्रिया 4 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में ही करें। जिससे बसंत ऋतु में फूल एवं पत्तियाँ गिर जाती हैं तथा वर्षान्त में फूल काफी संख्या में आते हैं। इस कार्य हेतु स्थानीय अनुभव अनुसार पानी रोकने की समय सीमा तय करे।

 2. यूरिया का 10 प्रतिशत घोल का छिड़काव एक बार या 100-200 पी.पी.एम नेफ्थलीन ऐसेटिक एसिड के घोल का छिड़काव 20 दिन के अंतराल से दो बार करें । जिससे अनचाहे फल/पत्तियाँ गिराये जा सकते हैं ।

रोग नियंत्रण

 यद्यपि अमरूद में कई प्रकार के रोग बीमारियाँ जैसे उकठा, एन्थ्रेक्नोज़, पौध अंगमारी, तना कैन्कर, फल चित्ती एवं स्कैब आदि से नुकसान होता है लेकिन सर्वाधिक नुकसान उकठा से होता हैं।

अमरूद के पेड़ को प्रभावित करने वाले रोग एवं उनके नियंत्रण निम्नानुसार है –

उकठा:

यह अमरूद का सबसे विनाशकारी रोग है। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम वर्षांत में दिखाई देते हैं। रोगी पेड़ों की पत्तियाँ भूरे रंग की होती हैं एवं पेड़ मुरझा जाता है। प्रभावित पेड़ों की डालियाँ एक-एक करके सूखने लगती हैं। यह रोग उन क्षेत्रों में अधिक तीव्र गति से फैलता है जहाँ कि मृदा का पी.एच. मान 7.5 से अधिक होता है। भूमि की नमी भी रोग को फैलने में सहायक होती है। मृदा आर्द्रता (60-80 प्रतिशत) पर रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। यह रोग लाल लैटराईट एवं एल्यूवियल भूमि में तीव्रता से फैलता है।

नियंत्रण:

इस रोग से ग्रसित पौधों / पेड़ों के गड्ढों की मिट्टी को एक ग्राम बेनलेट या कार्बेन्डाज़िम प्रति लीटर पानी में घोल कर (20 लीटर प्रति गड्ढा) उपचारित करें। भूमि में चूना, जिप्सम तथा कार्बनिक खाद मिलाकर रोग के प्रकोप को कम करें। अमरूद की लखनऊ-49 किस्म में यह रोग कम लगता है। अतः इस जाति का प्रयोग करें। चायनीज़ जाति के अमरूद इस रोग से काफी हद तक प्रतिरोधी पाये गये हैं। अतः इसे मूलवृन्त के रूप में प्रयोग करें। कीट नियंत्रण अमरूद में तना छेदक, फल की मक्खी, मिली बग, स्केल कीट आदि से नुकसान होता है।
अमरूद के पेड़ को प्रभावित करने वाले कीट एवं उनके नियंत्रण निम्नानुसार हैं –

 छाल भक्षक इल्ली:

अमरूद में सबसे ज्यादा नुकसान इस इल्ली के द्वारा होता है, जो कि अमरूद के अतिरिक्त आम, बेर, अनार तथा नींबू जाति के फलों पर भी आक्रमण करती है। इस कीट की इल्ली तने का छाल खाती है तथा तने में छेद कर देती है। छाल खाने के बाद एक प्रकार का काला अवशेष छोड़ती है जो कि प्रभावित हिस्सों पर चिपका रहता है।

नियंत्रण:

इसकी रोकथाम के लिये छिद्रों में मिट्टी के तेल या पेट्रोल या न्यूवॉन से भीगी रूई छेद में डालें एवं ऊपर से छेद के मुँह को गीली मिट्टी से बन्द कर दें।


Sunday, 24 September 2017

लीची की उन्नत जैविक खेती

लीची की उन्नत जैविक खेती (Organic Farming of Lychee)



https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/Organic-Farming-of-Lychee.html / lychee tree photos



लीची एक फल के रूप में जाना जाता है, जिसे वैज्ञानिक नाम से बुलाते हैं, जीनस लीची का एकमात्र सदस्य है। इसका परिवार है सोपबैरी। यह ऊष्णकटिबन्धीय फ़ल है, जिसका मूल निवास चीन है। यह सामान्यतः मैडागास्कर, भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, दक्षिण ताइवान, उत्तरी वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका में पायी जाती है।

मध्यम ऊंचाई का सदाबहार पेड़ होता है, जो कि 15-20 मीटर तक होता है, ऑल्टर्नेट पाइनेट पत्तियां, लगभग 15-25 सें.मी. लम्बी होती हैं। नव पल्लव उजले ताम्रवर्णी होते हैं और पूरे आकार तक आते हुए हरे होते जाते हैं। पुष्प छोटे हरित-श्वेत या पीत-श्वेत वर्ण के होते हैं, जो कि 30 सें.मी. लम्बी पैनिकल पर लगते हैं। इसका फल ड्रूप प्रकार का होता है, 3-4 से.मी. और 3 से.मी व्यास का। इसका छिलका गुलाबी-लाल से मैरून तक दाने दार होता है, जो कि अखाद्य और सरलता से हट जाता है। इसके अंदर एक मीठे, दूधिया श्वेत गूदे वाली, विटामिन- सी बहुल, कुछ-कुछ छिले अंगूर सी, मोटी पर्त इसके एकल, भूरे, चिकने मेवा जैसे बीज को ढंके होती है।

जलवायु

जाड़े के दिनों में अधिक पाला तथा गर्मी के दिनों में गर्म हवाओ से लू को लीची से हानी होती है . पाले से नई और - कभी कभी पुरानी पत्तियां तथा टहनियां मर जाती है . फलों के पकने के समय लू चलने से इसके फलों में फटन आ जाती है . जिससे फल ख़राब होकर गिरने लगते है . अगेती किस्मों में फल सूर्य कि कड़ी धुप से झुलस जाते है . और फट भी जाते है . जिसे सनस्काल्ड कहते है . यह हानी उस समय अधिक होती है . जब तापक्रम 38 डि 0 से 0 से अधिक हो जाता है और हवा में आद्रता 60 प्रतिशत से कम हो जाती है . इसलिए उन क्षेत्रों में जहाँ का 38 डि 0 से 0 से अधिक हो जाये और आद्रता तापक्रम 60 प्रतिशत से कम हो जाये , लीची कि खेती सफलतापूर्वक करना संभव नहीं है . 38 डि 0 से 0 से कम तापक्रम और 150 सेमी 0 वर्षा वाले क्षेत्र जहाँ आद्रता 60 प्रतिशत से ऊपर हो , लीची कि खेती के लिए उत्तम है .

भूमि 

उसर भूमि छोड़कर सभी प्रकार कि भूमियों में जिसमे जीवाश्म पदार्थ अच्छी मात्रा में हो और जल निकास अच्छा हो लीची कि खेती सफलतापूर्वक कि जा सकती है . चिकनी दोमट मिटटी जिसमे जीवाश्म पदार्थ अच्छा हो और पानी न ठहरता हो लीची के लिए सर्वोत्तम है . हल्की अम्लीय भूमि में पेड़ों कि बृद्धि अच्छी होती है . ऐसी भूमि में लीची कि जड़ो के ऊपर कुछ गांठे पाई जाती है . जिनमे माइकोराइजा नामक कवक पाई जाती है . जिस कारण वृक्षों कि वृद्धी अच्छी होती है .

प्रजातियाँ 

भारत में अभी तक लीची कि सिमित जातियां ही उपलब्ध है , जिसका मुख्य कारण इसका भारत में देर से प्रवेश है यहाँ पर व्यापारिक स्तर कि कुछ प्रमुख प्रजातियाँ दी जा रही है जो निम्न प्रकार है . : -

अर्ली सीडलेस अर्ली बेदाना


इसके फल जून के दुसरे सप्ताह में पकते है . फुल हृदयाकार से अंडाकार शक्ल के होते है . प्रति फल औसत भार 21.67 ग्राम होता है . छिलका पतले गहरे लाल रंग का होता है . प्रतिफल गुदे का भार लगभग 18 ग्राम , गुदा मुलायम रंग सफ़ेद क्रीमी तथा 13.64 प्रतिशत व अम्ल 0 शर्करा . 436 % होता है . फल खाने में स्वादिष्ट एवं सुगन्धित होता है बिज बहुत छोटा और फलत बहुत अच्छी होती है .

रोज सेंटेड

इसके फल भी जून के दुसरे सप्ताह में पकते है फल पके हृदयाकार 3.12 लगभग से.मी. लम्बे 3.05 ओर से.मी. चौड़े होते हैएक फल का औसत भार 17.45 ग्राम होता है छिलका पतला व बैगनी रंग का मिश्रित होता है गुदा मुलायम रंग में भूरा सफ़ेद तथा प्रति फल औसत भार 13.29 ग्राम होता है गुदे में शर्करा कि मात्रा लगभग 12.79 % अम्ल कि मात्रा 0.33 % होती है फल खाने से मीठा और गुलाब कि तरह खुशबू युक्त होता है बिज आकार में बड़ा होता है फल उत्पादन उपज सामान्य होता है

अर्ली लार्ज रेड

फल जून के तीसरे सप्ताह में पकता है फल तिरक्षा हृदयाकार लगभग 3.53 सेमि . लम्बे 3.03 से.मी. चौड़े होते है तथा फल का औसत भार 20.45 ग्राम होता है छिलका पतला , गहरे लाल रंग का गुदा कड़ा भूरा सफ़ेद शर्करा 10 0.88 % 0.41 % अम्लता खुशबू अच्छी और स्वाद मीठा होता है बिज आकार में बड़ा और फलत मध्यम होता है .

मुजफ्फर पुर

इसको लेट लार्ज रेड भी कहते है इसके फल जून के चौथे सप्ताह में पकते है फल आयता कार नुकीले होते है फल कि लम्बाई लगभग 3.75 से.मी. व चौड़ाई लगभग 3.17 मी से .. . और फल का औसत भार 22 0.51 ग्राम होता है गुदे कि औसत मात्रा 16.76 ग्राम प्रति फल गुदे में शर्करा 10.17 % एवं अम्लता 0.54% होती है गुदा मुलायम , सुगंधित एवं मीठा होता है उपज प्रचुर मात्रा में होती है .

कलकतिया

यह देर से पकने वाली किस्म है इसके फल जुलाई के प्रथम सप्ताह में पकते है फल आयता कार होते है फल कि लम्बाई और चौड़ाई लगभग 3.86 से.मी. व 3.40 और फल का औसत भार से.मी. 23.85 ग्रम होता है छिलका मध्यम मोती का तथा टायरियन रोज के रंग का होता है फल में औसत गुदे कि 16.32 ग्राम व गुदे में शर्करा 10.99 % और अम्ल कि मात्रा 0.443 % होती है इसका स्वाद मीठा व बिज आकार में बड़ा होता मात्रा है फटने कि समस्या नाम मात्र कि पाई जाती है .

लेट सीडलेस

इस किस्म को लेट बेदाना के नाम से भी जाना जाता है इसके फलो के पकने का समय जून का अंत या जुलाई का प्रथम सप्ताह है फल लम्बाई में 3.70 से.मी. और चौड़ाई में 3.55 से.मी. होते है लगभग प्रति फल औसत भार 25.4 ग्राम होता है छिलका पतला तथा सिकुड़ा होता है गुदा मुलायम रसीला तथा क्रीमी रंग का होता है गुदे में शर्करा लगभग 13.86 % 0.34 % और अम्लता पाई जाती है फल खाने में सुगन्धित और मीठा होता लगभग है परन्तु बिज के पास कुछ कड़वाहट लिए हुए होता है उपज अच्छी होती है .

शाही 

यह जाती भी मुजफ्फर पुर कि भांति आकर्षक अच्छे फलोत्पादक वाली है और बिहार में ब्यावासयिक स्तर पर सफलता पूर्वक उगाई जा रही है इसका फल भी जून में अंतिम सप्ताह में पकता है फल मीठा बिज मध्यम होता है .

राम नगर,गोला

यह कलकतिया जाती का म्युटेंट है इसके फल जून के अंतिम सप्ताह में पकते है यह हर प्रकार से कलकतिया जाती से उच्च श्रेणी कि है तराई क्षेत्रो में काफी प्रचलित है फलोत्पादन अच्छा है .

पौधरोपण 

पौध लगाने का उत्तम समय जून और जुलाई का महिना है . पौधे से पौधे और लाइन से लाइन कि दूरी भूमि कि उपजाऊ शक्ति के अनुसार 10 से 12 मीटर रखनी चाहिए . मई से जून के प्रथम सप्ताह तक 10 से 12 मीटर कि दूरी पर एक मीटर व्यास और एक मीटर गहराई के गड्ढ़े खोदकर 8 से 15 दिनों तक खुले रहने चाहिए . तत्पश्चात मिटटी व अच्छी सड़ी हुई गोबर कि खाद - बराबर बराबर मात्रा में लेकर कम से 2 ग्राम आर्गेनिक खाद मिश्रण डालकर गड्ढ़े कि मिटटी बैठकर ठोस हो जाये और उसमे पुन किलो : मिटटी व खाद का मिश्रण डालकर भर दिया जाये कम . दोवारा भरने के बाद भी सिंचाई आवश्यक है . ताकि गड्ढ़े कि मिटटी बैठकर ठोस हो जाये तत्पश्चात जुलाई में पौधा का रोपण किया जा सकता है . यदि खेत कि मिटटी चिकनी हो तो खेत कि मिटटी खाद व बालू रेत बराबर - बराबर मात्रा में मिला देना चाहिए .

सावधानियां

जैसा कि ऊपर पहले ही बताया जा चूका है कि लीची के पौधों में मृत्यु दर बहुत अधिक होती है . इसलिए रोपाई करते समय निम्न सावधानियां रखना आवश्यक है

1.खेत में केवल वही पौधे लगाये जाये तो पेड़ से गुटी काटने के बाद कम से कम 6 से 8 माह तक गमलो में अथवा भूमि में लगाये गए हो क्योंकि लीची कि गुटी पेड़ से अलग होने के पश्चात् बहुत कम अधिक जीवित रह पाती है . और कभी - कभी तो 60 प्रतिशत तक मर जाती है . इस प्रकार पुराने पौधे भी खेत में लगाने के बाद शत प्रतिशत जीवित नहीं रह पाते है .

2. जहा तक संभव हो लीची के दो वर्ष के पौधे खेत में लगाये जाना चाहिए , इससे कम पौधे मरेंगे .

3. रोपाई के समय पौधे को गड्ढ़े में रखकर उसके चारों और खाली जगह में बारीक़ मिटटी डालकर इतना पानी डाल देना चाहिए कि गड्ढ़ा पानी से भर जाये . इससे मिटटी नीचे बैठ जाएगी और खाली हुए गड्ढ़े में : पुन बारीक़ मिटटी डालकर गड्ढ़े को जमीन कि सतह तक भर देना चाहिए .

4पेड़ . के चारों और मिटटी डालकर मिटटी को हाथ से नहीं दबाना चाहिए क्योंकि इससे : प्राय पौधे कि मिटटी का खोल पिंडी टूट जाती है . जिससे पौधे कि जड़ टूट जाती है . और पौधा मर जाता है . इसलिए मिटटी को पानी द्वारा उपरोक्त विधि से सेट कर भर देना चाहिए .5लीची . का नया बाग लगने हेतु गड्ढ़ों को भरते समय जो मिटटी व खाद आदि का मिश्रण बनाया जाता है उसमे लीची के बाग़ कि मिटटी अवश्य मिला देना चाहिए क्योंकि लीची कि जड़ों में एक प्रकार कि कवक जिसे माइकोराइजा कहते है पाई जाती है . इस कवक द्वारा पौधे अच्छी प्रकार - फलते फूलते हैऔर नए पौधे में भी कवक अथवा लीची के बाग़ कि मिटटी मिलाने से मृत्युदर कम हो जाती है .

रोपाई के बाद पौधों कि रोपाई के बाद निम्न सावधानियां बरतनी चाहिए ताकि पौधों में म्रत्यु दर कम हो सके और पौधे अच्छी प्रकार फलफूल सके ---

1. पौधों के थालों में नमी बनी रहनी चाहिए वर्षा न होने कि स्थिति में नए पौधों के थाले सूखने नहीं चाहिए . दुसरे अधिक वर्षा कि स्थिति में थालो में पानी रुकना नहीं चाहिए .

2. सर्दियों में पाले से बचाना आवश्यक है जिसके लिए 10 के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए दिन प्रति .गर्मियों में लू से बचाने के लिए प्रति सप्ताह सिंचाई करते रहना चाहिए .

प्रारंभिक 3. अवस्था में में पौधों को पाले और लू से बचने के लिए पौधों को पूर्व कि ओर से खुला छोड़कर शेष तीनो दिशाओं में पुवाल , गन्ने कि पत्तियों और बॉस कि खप्पचियों अथवा अरहर आदि कि डंडियों कि मदद से ढ़क देना चाहिए

4. सूर्य कि तेज धुप से बचाने के लिए तनों को चुने के गाढ़े घोल से पोत देना चाहिए .

5. उत्तर - पश्चिम व दक्क्षिण दिशा में जमौआ या शीशम आदि का सघन वृक्ष रोपण वायु अवरोधक के रूप में किया जाना चाहिए .

6. फलत वाले पेड़ों में सर्दियों में 15 दिन के अंतर पर और गर्मियों में फल बनने के पश्चात् लगातार आद्रता बनाये रखने के लिए जल्दी जल्दी सिंचाई करते रहना चाहिए इस समय पानी कि कमी नहीं होना चाहिए . अन्यथा झड़ने और फटने का डर रहता है .

जैविक खाद

1  नीम वजन 20 किलो ग्राम और अरंडी कि खली वजन 50 किलो ग्राम इन खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण तैयार 2 1 से किलो ग्राम प्रति 6 से 12 साल तक के पौधे को पौधा 3 से 5 किलो ग्राम से 1 साल 5 साल तक पौधे को कर प्रति पौधा साल में दो बार देना चाहिए पहला - जून जुलाई तथा दूसरा अक्तूबर माह में देते 12 साल के ऊपर के पौधे को आधा किलो ग्राम प्रति वर्ष उम्र के हिसाब से जैसे 20 साल के पौधे को 10 किलो ग्राम खाद देते है है .
अच्छी सड़ी हुयी गोबर कि खाद पहले साल 10 किलो ग्राम दुसरे साल 20 किलो ग्राम तीसरे साल 30 किलो ग्राम 4 थे साल 40 किलो ग्राम पांचवे साल या उससे ज्यादा उम्र के पौधे को प्रति साल किलो ग्राम प्रति पौधा देते है प्रत्येक तरह का खाद देने के बाद पानी देना आवश्यक है .
 से भरपूर फुल भी आएगा और भरपूर फसल या फल सेहत मंद स्वादिष्ट तैयार होगा

सिंचाई 

जलवायु और मिटटी कि किस्म के अनुसार लीची के बाग़ कि सिंचाई कि जाना चाहिए बलुई मिटटी में जल्दी - जल्दी और चिकनी मिटटी में कुछ देर से सिंचाई कि आवश्यकता होती है . इसी प्रकार नम जलवायु में कम और खुश्क जलवायु में अधिक अर्थात - बार बार सिंचाई कि आवश्यकता होती है . उत्तर भारत में वर्षा के बाद सर्दियों में पाले से बचाने के लिए उस समय सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए जब पाला पड़ने का भय हो . साधारण अवस्था में जाड़े में दो सिंचाई पर्याप्त है . फ़रवरी से जून तक 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना आवश्यक है . फलों के पकने के समय भी लगातार आद्रता बनाये रखने के लिए - बार बार सिंचाई कि आवश्यकता पड़ती है . छोटे पौधों को गर्मियों में हर सप्ताह तथा जाड़े में हर 15 दिन बाद सींचना आवश्यक है .

खरपतवार नियंत्रण 

बाग़ को खरपतवारों से बचाना आवश्यक है  खरपतवारों के अधिक होने से छोटे पौधों कि वृद्धी रुक जाती है . तथा बड़े पेड़ों में किट एवं व्याधियों का प्रकोप अधिक हो जाता है क्योंकि गर्मी सर्दी से बचने के लिए किट खरपतवारो में छिप जाते है . और अपनी संबर्धन कतरे रहते है दुसरे सूर्य कि धुप जमीन तक न पहुंच पाने के कारण वहां पर कवक जनित बीमारियाँ पनपती रहती है . इसलिए खरपतवारों का नियंत्रण भी आवश्यक है . इनके नियंत्रण के लिए वर्षा के बाद सितम्बर के महीने में हल्की जुताई कर देनी आवश्यक है . इसी जुताई पर खाद भी दिया जाना चाहिए . गर्मियों के दिनों में चुकी बार बार सिंचाई करनी पड़ती है . इसलिए उन दिनों में फलों और पेड़ों को और व्याधियों से बचाने के लिए एक या दो बार बहुत हल्की जुताई कर खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है .

कीट नियंत्रण

लीची लीफ रोलर

जुलाई से सितम्बर तक नयी पत्तियां निकलने पर इस कीड़े कि गिडार पत्तियों के सिरों का धागे जैसे पदार्थ से बांधकर अन्दर कि ओर मोड़ देती है . जिससे पत्तियां गोल दिखाई पड़ने लगती है . और गिडार अन्दर ही पत्तियों को खाती रहती है . इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौ मूत्र माइक्रो झाइम के साथ मिला कर छिड़काव करे .

लीची लीफ माइनर

पत्तियों के दोनों सतहों के बिच कीड़े कि गिडार सुरंग बनाती हुई आगे बढ़ती रहती है . गिडार पूर्ण अवस्था प्राप्त करने के उपरांत एक स्थान पर सफ़ेद झिल्ली के अन्दर प्यूपा में बदल जाती है . इस किट का आक्रमण प्रारंभ होने पर गौ मूत्र या नीम के काढ़े का माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर छिड़काव करे .

छाल खाने वाली गिडार 

दो टहनियों के जोड़ के पास ही छेद बनाकर इसमें गिडार छिपी रहती है . इसकी गिडार छाल खाकर मल निकलती है जो गुच्छों के रूप में पेड़ के तने पर लगे दिखाई पड़ते है . मल के इन गुच्छों को हटा कर छिद्र को साफ करने के बाद उसमे मिटटी का तेल या पेट्रोल या क्लोरोफार्म में रुई भिगोकर तार या इंजेक्सन कि मदद से छेद के अन्दर डालकर ऊपर से मिटटी से बंद कर देने पर गिडार अन्दर ही मर जाती है . सल्फास कि आधी गोलीभी प्रति छिद्र डालकर मिटटी से बंद किया जा सकता है . जो एक अत्यंत सफल उपचार है . टहनियों तथा डालियों को जहाँ पर कीड़ा लगा हो . गौ मूत्र या नीम के काढ़ा का छिड़काव क़र तर क़र देना चाहिए .

लीची फ्रूट बोरर 

इसकी गिडार फलों में छेद कर देती है , जिसके कारण फल अन्दर ही अन्दर ख़राब हो जाता है . और फल कि बढ़बार रुक जाती है . कभी - कभी अधिक प्रकोप होने पर फल सुख कर भी गिरने लगते है इसके रोक थम के लिए फल बनने के 10-15 दिन बाद गौ मूत्र और  नीम का काढ़ा का हर 15 - 20 दिन बाद छिड़काव करते रहना चाहिए .

लीची माईट

यह एक छोटे आकार का किट है जो पत्तियों कि निचली सतह पर चिपका रहता है . और पत्तियों का रस चूसता रहता है यह अपना मल पत्तियों कि निचली सतह पर छोड़ता रहता है जो लसलसा पदार्थ होता है . इससे पत्तियों के स्टोमेटा बंद हो जाते है और पेड़ कि बृद्धि एवं फसल पर बुरा प्रभाव पड़ता है इस अष्टपदी के नियंत्रण हेतु गौ मूत्र और  नीम का काढ़ा का छिड़काव करना चाहिए .

मिली बग

आम के पेड़ो के साथ लगे लीची के पेड़ो पर इसका प्रकोप देखा गया है . यह किट फिलो एवं प्ररोहों का रस चूसकर इनको निष्क्रिय बना देता है जिससे लीची के फल गिरने लगते है इसके नियंत्रण हेतु दिसंबर के महीने में पेड़ के तने पर पालीथीन लपेटकर दोनों सिरों को रस्सी से कसकर बंध दिया जाता है जिससे किट पेड़ के ऊपर नहीं चढ़ पाते और वह पालीथीन से फिसलकर निचे गिर जाते है . मई जून के महीने में पेड़ के निचे थालो में नीम की खाद या गैमेकसीन पाउडर डाल कर - निराई गुड़ाई करने से इस किट का नियंत्रण हो जाता है .

सूत्र कृमि


सूत्र कृमि जमीन के अन्दर पाया जाता है . लीची में प्रोटीलैंथ्स नामक सूत्र क्रीमी का प्रकोप देखा गया है यह जड़ो के ऊपर - छोटे छोटे धब्बों के रूप में दिखाई देते है यह सूत्र क्रीमी एक स्थान से दुसरे स्थान तक धीरे - धीरे पहुंच जाते है या जुताई - गुड़ाई करते समय अथवा सिंचाई के पानी के द्वारा एक स्थान से दुसरे स्थान तक पहुच जाते है . जिन बागों में वर्ष भर नमी बनी रहती है . उन बागों में इनका प्रकोप पाया जाता है . इससे ग्रसित पौधों का विकास अच्छा नहीं होता और फलत भी कम होता है . इसके नियंत्रण हेतु 400 किलो ग्राम नीम का खाद प्रति हेक्टेयर कि दर से बाग में डालकर जुताई व सिंचाई कर देनी चाहिए .

रोग नियंत्रण

लीची का विगलन रोग 

इस रोग का आक्रमण फलों के पकने के समय होता है . इस रोग के प्रभाव से सर्वप्रथम गुदा मुलायम होकर सड़ने लगता है . छिलके का रंग पहले हल्का भूरा और बाद में गहरा भूरा हो जाता है . रोग का प्रकोप फलों पर पेड़ों एवं भंडार व दोनों ही जगह होता है . इसकी रोकथाम के लिए फलों को पकने से पहले नीम का काढ़ा गौमूत्र के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए .

लीची का एलगत रस्ट

इस रोग का आक्रमण उन क्षेत्रों में अधिक होता है जंहा आद्रता अधिक बनी रहती है जैसे पहाड़ो कि तलहटी और तराई क्षेत्र इस रोग का कारण सिफैतन्योरस नामक काई है . वर्षा ऋतू में तने एवं पत्तियों के ऊपर अधिक नमी होने कि दशा में हल्के रंग कि काई फ़ैल जाती है . जिसके फलस्वरूप प्रकाश संस्लेषण भोजन बनाने कि क्रिया में बाधा उत्पन्न हो जाती है और पौधे का विकास रुक जाता है . इसकी रोकथाम के लिए बाग़ में पानी का निकास अच्छा होना चाहिए और नीम के तेल का छिड़काव लगातार करते रहना चाहिए .

लीची का लीफ ब्लाक पूर्ण धब्बा रोग

इस रोग में सर्व प्रथम पत्तियों कि दोनों सतहों पर छोटे छोटे पीले या गहरे पीले रंग के धब्बे बनते है जो उपरी सतह पर अधिक स्पष्ट दिखाई देते है कई छोटे छोटे धब्बे निकलकर बड़े धब्बे में बदल जाते है पत्तियां सूखने लगती हैअधिक प्रकोप कि अवस्था में उत्पादन पर प्रति कुल प्रभाव पड़ता है  नीम काढ़ा या गौ मूत्र का छिड़काव सितम्बर से अक्तूबर तक पर्णीय या सम्पूर्ण पौधों पर किया जाना चाहिए .

असामयिक फल झडन 

लीची में फल झड़ने कि अधिक समस्या तो नहीं है परन्तु फल बनने के बाद सिंचाई कि कमी होना अथवा गर्म हवाओ का प्रकोप होने से लीची के फल झड़ने लगते है जैसा कि पहले बताया जा चूका है कि फल बनने के पश्चात् बाग में लगातार आद्रता बनाये रखने के लिए बराबर सिंचाई करते रहना चाहिए 50 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद खेत में समान रूप से बखेर देनी चाहिए। ५० किलो गोबर की खाद में 1 किलो ट्राईकोडरमा मिला कर बुबाई करनी चाहिए 

फलो का फटना

प्राय उन स्थानों में जहाँ का मौसम अधिकगर्म और सुखा रहता है फल फटने कि समस्या उत्पन्न हो जाती है बिभिन्न प्रजातियों में भी फल फटने कि क्षमता अलग - अलग होने के साथ - साथ दिन और रात्रि के तापक्रम में अधिक उतार चढ़ाव होने पर भारी सिंचाई करने से उक्त समस्या उत्पन्न हो जाती है यह भी प्रकाश में आया कि अगेती किस्म के फलो में फटने कि समस्या पछेती किस्म से अधिक है इसलिए उन क्षेत्रो में जहाँ से 38 तापक्रम ग्रे से अधिक होता है पछेती किस्म ही लगानी चाहिए और में बाग लगातार आद्रता बनाये रखने के लिए बराबर - समय समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए जिससे भूमि सूखने न पाए हवा अवरोधक पौधे भी फलो को झड़ने एवं फटने से बचने में मदत करते है मैग्नीशियम का छिड़काव करने से फलो को रुकने में काफी सफलता मिलती है तथा फलो के रंग का बिकास अच्छा होता है और 40 से 50% उत्पादन बढ़ जाता है .

नीम का काढ़ा 

24 नीम का पत्ती ताजा हरा तोड़कर कुचल कर पीसकर किलो 5 लीटर पानी में पकाए जब पानी 20 0-25 लीटर रह जाय उतार कर ठंडा कर 500 ग्राम प्रति पम्प पानी में मिलाकर किसी भी तरह के रोग व किट पतंगों के प्रकोप होने पर पौधे या फसल पर छिड़काव करे .

गौमूत्र 

देसी गाय का 10 लीटर गौ मूत्र लेकर कांच के बर्तन या पारदर्शी प्लास्टीक के बर्तन या जार में लेकर 10 -15 दिन धुप में रखकरआधा लीटर प्रति पम्प लेकर पानी में मिलाकर रोग ग्रस्त किट ग्रस्त पौधों या फसलो पर छिड़काव करे .

तुड़ाई

किस्म के अनुसार लीची के फल पकने के समय गुलाबी , पिला पीलापन लिए हुए हरे हो जाते है तथा उनके छिलके पर उपस्थित ग्रंथिया चपटी हो जाती है लीची के फलो को टहनी में गुच्छो सहित तोड़ना चाहिए इसमें गुच्छो को रखने और ले जाने में आसानी होती है इससे फल अच्छे और ठीक अवस्था में होते है फलो के गुच्छे टोकरियों में पत्तियां बिछा कर उन पर रखी जाती है और इस प्रकार बेचने हेतु बाजार ले जाते है फलो को यदि दूर के बाजारों में भेजना हो तो फलो को भूरा रंग आने पर ही तोड़ लेना चाहिए तथा लकड़ी कि पतियों में पैक कर बाजार भेज देना चाहिए फल तोड़ने के 24 घंटे बाद रंग बदलने लगते है तथा 3-4 दिनों बाद कत्थई रंग के हो जाते है .

उपज

गुटी द्वारा तैयार पौधे 5 6 वर्षो बाद फलाना प्रारंभ कर देते है लीची में फुल मार्च महीने में आते है तथा फल मई के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम या द्वितीय सप्ताह तक पकते है लीची का पेड़ लगभग 20 वर्ष में पूर्ण बिकसित हो जाता है - और पूर्ण बिकसित पेड़ से लगभग से 3 कुंतल फल प्राप्त हो जाते है .

भण्डारण

लीची के फलो को डंठल तोड़कर भली भंति साफ कर ले पोलीथिन कि छिद्र युक्त थैलियों में बंद 40 से 43 डिग्री से करके ग्रे .. तापक्रम तक 90 आद्रता पर शीत गृह में 28 से 30 दिन तक अच्छी दशा में भण्डारण किया जा सकता है गुदे के चीनी . % 40 के घोल में बंद करके जीरो डिग्री से ग्रे . से -17.8 डिग्री से निचे ग्रे .. तापक्रम पर 270 से 360 दिनों तक अच्छी दशा में रखा जा सकता है 

Saturday, 23 September 2017

कैसे उगाए : हल्दी





https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/how-to-grow-turmeric.html   / turmeric plant photos / haldi photos




हल्दी जिंजिवरेंसी कुल का पौधा हैं। इसका का वानस्पतिक नाम कुर्कमा लांगा हैं। इसकी उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशिया में हुई हैं। हल्दी का उपयोग प्राचीनकाल से विभिन्न रूपों में किया जाता आ रहा हैं, क्योंकि इसमें रंग महक एवं औषधीय गुण पाये जाते हैं। हल्दी में जैव संरक्षण एवं जैव विनाश दोनों ही गुण विद्यमान हैं, क्योंकि यह तंतुओं की सुरक्षा एवं जीवाणु (वैक्टीरिया) को मारता है। इसका उपयोग औषधीय रूप में होने के साथ-साथ समाज में सभी शुभकार्यों में इसका उपयोग बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है। वर्तमान समय में प्रसाधन के सर्वोत्तम उत्पाद हल्दी से ही बनाये जा रहे हैं। हल्दी में कुर्कमिन पाया जाता हैं तथा इससे एलियोरोजिन भी निकाला जाता हैं। हल्दी में स्टार्च की मात्रा सर्वाधिक होती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें 13.1 प्रतिशत पानी, 6.3 प्रतिशत प्रोटीन, 5.1 प्रतिशत वसा, 69.4 प्रतिशत कार्बाेहाइड्रेट, 2.6 प्रतिशत रेशा एवं 3.5 प्रतिशत खनिज लवण पोषक तत्व पाये जाते हैं। इसमें वोनाटाइन आॅरेंज लाल तेल 1.3 से 5.5 प्रतिशत पाया जाता हैं।



भारत विश्व में सबसे बड़ा हल्दी उत्पादक देश है। भारत में हल्दी का विभिन्न रूपों में निर्यात जापान, फ्रांस यू.एस.ए., यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, नीदरलैंड, सउदी अरब एवं आस्ट्रेलिया को किया जाता है। म.प्र. में हल्दी का क्षेत्र बहुत कम है, परंतु यहां पर इसके क्षेत्र एवं उत्पादन वृद्धि की प्रबल संभावना हैं।

जलवायु:-

हल्दी एक मसाला फसल है, जिस क्षेत्र में 1200 से 1400 मि.मी. वर्षा, 100 से 120 वर्षा दिनों में प्राप्त होती
है, वहां पर इसकी अति उत्तम खेती होती है। समुद्र सतह से 1200 मीटर ऊंचाई तक के क्षेत्रों में यह पैदा की जाती है, परंतु हल्दी की खेती के लिए 450 से 900 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्र उत्तम होते हैं। हल्दी एक उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की फसल हैं। हल्दी के लिए 30 से 35 डिग्री से.मी. अंकुरण के समय, 25 से 30 डिग्री से.मी. कल्ले निकलने 20 से 30 डिग्री से.मी. प्रकंद बनने तथा 18 से 20 डिग्री से.मी. हल्दी की मोटाई हेतु उत्तम है।

मृदा:-

हल्दी का उत्पादन सभी प्रकार की मिट्टी में किया जा सकता हैं, परंतु जल निकास उत्तम होना चाहिए। इसका पीएच 5 से 7.5 होना चाहिए। हल्दी की खेती करने के लिए दोमट, जलोढ़, लैटेराइट मिट्टी, जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो, वह इसके लिए अति उत्तम है। पानी भरी मिट्टी इसके लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त होती है।

प्रजातियां –

1. सी.एल. 326 माइडुकुर:-
लीफ स्पाॅट बीमारी की अवरोधक प्रजाति है, लम्बे पंजे वाली, चिकनी, नौ माह में तैयार होती है। उत्पादन क्षमता 200-300 क्विं./हेक्टेयर तथा सूखने पर 19.3 प्रतिशत हल्दी मिलती हैं।
2. सी.एल. 327 ठेकुरपेन्ट:-
इसके पंजे लम्बे, चिकने एवं चपटे होते हैं। परिपक्वता अवधि 5 माह तथा उत्पादन क्षमता 200-250 क्विं./हेक्टर सूखने पर 21.8 प्रतिशत हल्दी प्राप्त होती हैं।
3. कस्तूरी:-
यह शीघ्र (7 माह) में तैयार होती हैं। इसके पंजे पतले एवं सुगन्धित होते हैं। उत्पादन 150-200 क्विं./
हेक्टेयर 25 प्रतिशत सूखी हल्दी मिलती हैं।
4. पीतांबरा:-
यह राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित है, यह अधिक उत्पादन देती है। आई.सी.ए.आर. द्वारा स्थापित हाई अल्टीट्यूट अनुसंधान केन्द्र पोटांगी (उड़ीसा) द्वारा उत्पादन की गई प्रजातियां निम्नलिखित हैं जो म.प्र. के लिए उपयुक्त हैं।
रोमा:-
यह किस्म 250 दिन में परिपक्व होती हैं। उत्पादन 207 क्विंटल/हेक्टेयर शुष्क हल्दी 31.1 प्रतिशत, ओलियोरोजिन 13.2 प्रतिशत इरोन्सियल आयल 4.4 प्रतिशत सिंचित एवं असिंचित दोनों के लिए उपयुक्त होती हैं।
सूरमा:-
इसकी परिपक्वता अवधि 250 दिन एवं उत्पादन 290 क्विं./हे. शुष्क हल्दी 24.8 प्रतिशत, ओलियोरोजीन 13.5 प्रतिशत, इरोन्सियल आॅयल 4.4 प्रतिशत उपयुक्त होती हैं।
सोनाली:-
इसकी अवधि 230 दिन, उत्पादन 270 क्विंटल/हे. शुष्क हल्दी 23 प्रतिशत, ओलियोरोजिन 114 प्रतिशत
इरोन्सियल आयल 4.6 प्रतिशत होता हैं। इस वर्ग की कोयम्बटूर-1, 35 एन, पीटीएस-43, पीसीटी-8 जातियां भी हैं। इसके अतिरिक्त दवा के लिए सफेद हल्दी कर्कुमा अमाड़ा एवं प्रसाधन सामग्री हेतु कुर्कुमा एरोमोटिका की भी कई जातियां तैयार की गयी हैं।

रोपण का समय:-

हल्दी के रोपण का उचित समय अप्रैल एवं मई का होता है।

खेत की तैयारी एवं बोने की विधि एवं प्रकंद की मात्रा:-

खेत की बुआई करने से पहले उसकी 4-5 जुताई कर, उसे पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरा एवं समतल कर लिया जाना चाहिए। पूर्व फसल के अवशेषों को अलग कर दिया जाना चाहिए। हल्दी रोपण हेतु 15 से.मी. ऊंची, एक मीटर चैड़ी तथा सुविधानुसार लम्बी (3-4 मीटर) क्यारियां, 30 से.मी. की दूरी पर क्यारी से क्यारी रख कर बना लेना चाहिए। यदि खेत में नेमोटोड की समस्या हो तो प्लास्टिक सोलेराइजेशन अप्रैल के महीने में ही कर लें, तभी क्यारियां बनाएं। हल्दी का रोपण प्रकन्द (राइजोम) से होता है, जिसमें 20 से 25 क्विंटल प्रकन्द प्रति हेक्टर लगता है। प्रत्येक प्रकन्द में कम से कम 2-3 आॅंखे होना चाहिए। प्रकन्दों को 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल, एम-45 घोल में कम से कम 30 मिनिट तक डुबोकर उपचारित करें, कटे-सड़े एवं सूखे तथा अन्य रोग से ग्रसित प्रकन्दों को छांटकर पृथक कर लेना चाहिए। ध्यान रखें कि एक वजन, आकार के कंद एक कतार में लगाएं अन्यथा छोटा-बड़ा प्रकन्द लगाने पर पौधे की बढ़वार समान नहीं हो पाती है। 5 से.मी. गहरी नाली में 30 से.मी. कतार से कतार तथा 20 से.मी. प्रकंद की दूरी रखकर रोपण करें। मदर राइजोम को ही बीज के रूप में उपयोग करना चाहिए। रोपण के बाद मिट्टी से नाली को ढॅंक दें।

सिंचाई:-

हल्दी की फसल में 20-25 हल्की सिंचाई की जरूरत पड़ती हैं। गर्मी में 7 दिन के अन्तर पर तथा शीतकाल में 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए।

खाद, उर्वरक मल्चिंग एवं अन्तः कर्षण क्रियाएं:-

हल्दी की फसल को जीवांश खाद की काफी आवश्यकता रहती है। 25 टन कम्पोस्ट या गोबर की खूब सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टर की दर से जमीन में मिला देना चाहिए। रासायनिक उर्वरक नत्रजन-60 किग्रा., स्फुर 30 किग्रा. एवं पोटाश 90 किग्रा. प्रति हेक्टर आवश्यक हैं। स्फुर की पूरी मात्रा एवं पोटाश आधी मात्रा रोपण के समय जमीन में मिला लें। नत्रजन की आधी मात्रा 45 दिन रोपण के बाद और शेष आधी नत्रजन एवं पोटाश की मात्रा 90 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय डालें।
हल्दी रोपण के बाद 12.5 टन/हेक्टर की दर से हरी पत्ती, सूखी घास या अन्य जैविक अवरोध परत क्यारियों के ऊपर फैला देना चाहिए। दूसरी एवं तीसरी अन्य 5 टन प्रति हेक्टर की दर से छिड़काव कर देने के बाद किसी भी अवरोध परत पदार्थ को बिछा दें। तीन-चार बार निंदाई करें, क्योंकि इसको ग्रीष्मकाल में लगाते हैं, जिससे पानी काफी देना पड़ता हैं, जिससे खरपतवार काफी उग आते हैं । अक्टूबर के बाद भी सिंचाई करते हैं, जिससे उत्पादन अच्छा होता हैं।

हल्दी की मिश्रित खेती या अन्तरवर्ती फसल:-

मैदानी क्षेत्र में मिर्च एवं अन्य फसलों के साथ मुख्यतया सब्जी वाली फसलों में इसे मिश्रित फसल के रूप में लगाया जाता हैं। इसे अरहर, सोयाबीन, मूंग, उड़द की फसल के साथ भी लगाया जा सकता है। अन्तरवर्ती फसल के रूप में बगीचों में जैसे आम, कटहल, अमरूद, चीकू, केला फसल के लाभ का अतिरिक्त आय प्राप्त की जाती है।

हल्दी फसल के प्रमुख कीट एवं व्याधियां: –

शूटबोरर:- यह कीट हल्दी के स्युडोस्टेम (तना) एवं प्रकंद में छेद कर देता हैं। इससे पौधों में भोज्य सामग्री आदि तंतुओं के नष्ट होने से सुचारू रूप से प्रवाह नहीं कर पाती है तथा कमजोर होकर झुक जाता है। इसका नियंत्रण 0.05 प्रतिशत डाइमिथोएट या फास्फोमिडान का छिड़काव करने से किया जावे।
साॅफ्टराट:-
हल्दी की यह काफी क्षति पहंुचाने वाली बीमारी है। यह बीमारी पीथियमस्पेसीन के प्रकोप से होती है। इसके
प्रकोप से प्रकन्द सड़ जाता है। नियंत्रण के लिए 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल एम-45 से मिट्टी की ड्रेंचिंग करें। रोपण के
पहले प्रकन्द का उपचार करके ही लगायें।
लीफ स्पाट:- यह बीमारी कोलिटोट्राइकम स्पेसीज फफूंद के कारण होती हैं। इसमें छोटे अण्डाकार अनियमित या नियमित भूरे रंग के धब्बे पत्तियों पर दोनों तरफ पड़ जाते हैं, जो बाद में धूमिल पीली या गहरे भूरे रंग के हो तो सावधानी बतौर बीमारी के प्रकोप के पूर्व ही 1 प्रतिशत बोर्डाे मिश्रण का छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर सितंबर के प्रथम सप्ताह में करें।

फसल की खुदाई:-

हल्दी फसल की खुदाई 7 से 10 माह में की जाती है। यह बोई गयी प्रजाति पर निर्भर करता है।
प्रायः जनवरी से मार्च के मध्य खुदाई की जाती है। जब पत्तियां पीली पड़ जाये तथा ऊपर से सूखना प्रारंभ कर दे। खुदाई के पूर्व खेत में घूमकर परीक्षण कर ले कि कौन-कौन से पौधे बीमारी युक्त है, उन्हें चिंहित कर अलग से खुदाई कर अलग कर दें तथा शेष को अलग वर्ष के बीज हेतु रखें।

बीज सामग्री का भंडारण:-

खुदाई कर उसे छाया में सुखा कर मिट्टी आदि साफ करें। प्रकंदों को 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल एम-45 या
0.15 प्रतिशत बाविस्टीन एवं 0.05 प्रतिशत मैलाथियान के घोल में 30 मिनिट तक उपचारित करें। इसे छाया में सुखाकर रखें। हल्दी भंडारण के लिए छायादार जगह पर एक मीटर चैड़ा, 2 मीटर लम्बा तथा 30 से.मी. गहरा गड्ढा खोदें। जमीन की सतह पर धान का पुआल या रेत 5 से.मी. नीचे डाल दें। फिर उस पर हल्दी के प्रकन्द रखें इसी प्रकार रेत की दूसरी सतह बिछा कर हल्दी की तह मोड़ाई करें। गड्ढा भर जाने पर मिट्टी से ढॅंककर गोबर से लीप दें।

हल्दी की क्योरिंग:-

हल्दी के प्रकन्दों को सूखा लेना चाहिए तथा उसके ऊपर की गंदगी साफ करके कड़ाहे में उबलने के लिए डालंे। फिर उसे कड़ाहे में चूने के पानी या सोडियम बाई कार्बनेट के पानी में घोल लें। पानी की मात्रा उतनी ही डालें जिससे पानी ढॅंक जावे। उसे 45 से 60 मिनट तक उबाले जब सफेद झाग आने लगे तथा उसमें से जब विचित्र महक आने लगती है, तब उसे अलग से पृथक करें। आजकल सोलर ड्रायर भी हल्दी के लिए बनाये गये हैं। उसे पानी से निकाल कर अलग करें। हल्दी जो कि उबल कर मुलायम हो गयी है या नहीं। खुदाई के 2 दिन बाद ही उबालना चाहिए। फिर उसे 10-15 दिन सुखाएं।

हल्दी का सुखाना:-

उबली हुई हल्दी को बांस की चटाई पर रोशनी में 5-7 से.मी. मोटी तह पर सुखायें। शाम को ढॅंककर रख दें। 10-15 दिन पूर्णतया सूख जाने से ड्रायर के 60 डिग्री से. पर सुखाते हैं। सूखने के बाद तक उत्पाद प्राप्त होता हैं।
पालिशिंग:- हल्दी का बाहरी भाग खुरदरा तथा छिलके वाला दिखाई देता है। इसीलिए उसे चिकना तथा एक समान
बनाने के लिए हाथ से आदमियों द्वारा पालिश करते है। बोरियों में भरकर उसे रगड़ा जाता है। आजकल पालिशिंग
ड्रम बनाये गये हैं, उसमें भी पालिश करते हैं। हल्दी को रंगने के लिए 1 किलोग्राम हल्दी को पीस कर उससे एक क्विंटल हल्दी को रंगा जा सकता है, जिससे यह ऊपर से एक समान पीले रंग की दिखाई देती है।

हल्दी से बनने वाले उत्पाद:-

1.  हल्दी का पाउडर जो मसाले के काम आता हैं।
2.  
हल्दी का आयल:-
हल्दी में 3 से 5 प्रतिशत बोलाटाइल आयल (तेल) निकलता हैं जो स्टीम डिस्टीलेशन द्वारा निकाला जाता हैं।
यह हल्दी पाउडर से निकाला जाता हैं। तेल 8 से 10 घंटे में धीरे-धीेरे निकलता हैं।


3.   टर्मकेरिक ओलियोरोजिन:-


यह साल्वेन्टर एक्सट्रेक्शन विधि से निकाला जाता है। इसकी कीमत कर्कुमिन की मात्रा के ऊपर निर्भर करती हैं।


हल्दी का उपयोग:-



1. भोजन में सुगन्ध एवं रंग लाने में, बटर, चीज, अचार आदि भोज्य पदार्थों में इसका उपयोग करते हैं। यह भूख बढ़ाने तथा उत्तम पाचक में सहायक होता हैं।
2. यह रंगाई के काम में भी उपयोग होता हैं।
3. दवाओं में भी उपयोग किया जाता हैं।
4. कास्मेटिक सामग्री बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता हैं।