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Saturday, 22 August 2026

कपास में सफेद मक्खी (Whitefly) का कहर: कई जगह ETL से ऊपर, पहचान और 2-स्प्रे वाला पक्का नियंत्रण

खास रिपोर्ट: इस बार अगस्त के चिपचिपे मौसम के कारण कपास में सफेद मक्खी का प्रकोप तेजी से बढ़ा है।

1. नमस्कार किसान भाइयों - ताजा सर्वे रिपोर्ट क्या कहती है?

सभी किसान भाइयों को नमस्कार।


जैसा कि आप जानते हैं,  कपास की फसल का फील्ड सर्वे सर्वे में से ज्यादातर लोकेशन पर सफेद मक्खी (जिसे कई किसान धोला मच्छर भी कहते हैं) की समस्या आर्थिक क्षति स्तर (ETL - Economic Threshold Level) से ऊपर पाई गई।

ETL का मतलब है - अब अगर आपने नियंत्रण नहीं किया तो सीधा-सीधा पैदावार पर नुकसान होगा। इसलिए यह लेख हर कपास किसान के लिए बहुत जरूरी है।
2. सफेद मक्खी का प्रकोप क्यों बढ़ता है?
सफेद मक्खी एक मौसम-आधारित कीट है।

अनुकूल मौसम: अगस्त के पहले पखवाड़े, यानी 15 अगस्त तक जैसा मौसम रहता है - हल्की-फुल्की बारिश, कई जगह अच्छी बारिश और हवा में ज्यादा नमी। ऐसा चिपचिपा मौसम सफेद मक्खी के लिए सबसे अनुकूल होता है। इस मौसम में इसकी बढ़ोतरी 10 गुना तेजी से होती है।
3. पहचान कैसे करें? आपके खेत में सफेद मक्खी है या नहीं?
कई किसान भाई ऊपर-ऊपर से देखते हैं और धोखा खा जाते हैं। इसकी सही पहचान का तरीका यह है:
3.1. पत्तियों की निचली सतह देखें - सबसे पक्का तरीका
सफेद मक्खी के वयस्क और उसके पीले रंग के छोटे-छोटे शिशु (Nymphs) और अंडे हमेशा पत्ती की निचली सतह पर चिपके हुए मिलेंगे। पौधे को हिलाने पर सफेद मच्छरों जैसा झुंड उड़ता हुआ दिखेगा। ये वहीं से पौधे का रस चूसते रहते हैं।
3.2. चिपचिपापन (Honeydew) - दूसरा बड़ा लक्षण
ये कीट रस चूसने के बाद एक मीठा, चिपचिपा पदार्थ मल के रूप में नीचे वाली पत्तियों पर गिराते रहते हैं। इसे Honeydew कहते हैं। अगर पत्तियों पर हाथ लगाने से चिपचिपापन महसूस हो रहा है, तो यह कन्फर्म है।
3.3. पत्तियों का काला पड़ना (Sooty Mould) - तीसरा और खतरनाक लक्षण
यह सबसे खतरनाक स्टेज है। उसी चिपचिपे पदार्थ पर कुछ दिनों बाद काली फफूंद लग जाती है। पत्ते पूरी तरह काले-काले दिखने लगते हैं। इससे पौधा भोजन बनाना बंद कर देता है और टिंडे झड़ने लगते हैं।

अगर आपके खेत में ये 3 लक्षण दिख रहे हैं तो तुरंत स्प्रे की जरूरत है।

4. सबसे बड़ी गलती: इन कीटनाशकों से बिल्कुल बचें
यह जानकारी नोट कर लें, नहीं तो नुकसान दोगुना हो जाएगा।

HIGHLIGHT / चेतावनी: 15 सितंबर से पहले कभी भी Synthetic Pyrethroid ग्रुप के कीटनाशकों का प्रयोग न करें।
किसान भाई अक्सर जल्दबाजी में इस ग्रुप की दवाएं डाल देते हैं। इससे एक बार तो सफेद मक्खी मरी हुई दिखती है, लेकिन ये दवाएं सफेद मक्खी के दुश्मन कीट (मित्र कीट) को मार देती हैं। इसके बाद सफेद मक्खी पहले से 20 गुना तेजी से वापस आती है। यह हमारे सर्वे में भी देखा गया है।

5. सफेद मक्खी का पक्का नियंत्रण - 2 स्प्रे की रणनीति
सफेद मक्खी को एक स्प्रे से कंट्रोल करना मुश्किल है, क्योंकि वयस्क और शिशु दोनों एक साथ होते हैं। इसलिए वैज्ञानिक तरीका है - पहला स्प्रे वयस्क के लिए और दूसरा स्प्रे अंडे-बच्चों के लिए।
5.1. पहला स्प्रे: वयस्क (Adult) सफेद मक्खी को मारने के लिए
इसका उद्देश्य उड़ने वाली मक्खी को तुरंत खत्म करना है। इसके लिए बाजार में ये प्रभावी विकल्प हैं:
• Diafenthiuron 50% WP: 200 ग्राम प्रति एकड़ • Dinotefuran 20% SG: 60 से 80 ग्राम प्रति एकड़ • Pyriproxyfen 10% EC + Diafenthiuron का Combination: 400 मिली प्रति एकड़
कैसे छिड़काव करें: ऊपर बताई गई किसी एक दवा को 200 से 250 लीटर साफ पानी में प्रति एकड़ के हिसाब से अच्छी तरह घोल बनाकर छिड़काव करें। ध्यान रहे, दवा पत्तियों की निचली सतह पर जरूर पहुंचे।
5.2. दूसरा स्प्रे: अंडे और शिशु (Nymphs) को खत्म करने के लिए
पहले स्प्रे के 5-7 दिन बाद, पत्तियों के नीचे देखें। अगर छोटे-छोटे पीले अंडे और शिशु अभी भी दिख रहे हैं, तो यह स्प्रे जरूरी है। इसके लिए Insect Growth Regulator (IGR) ग्रुप सबसे अच्छा है। ये शिशुओं की बढ़ोतरी को रोक देते हैं।
• Pyriproxyfen 10% EC: 400 से 500 मिली प्रति एकड़ • Spiromesifen 22.9% SC: 240 मिली प्रति एकड़ • Buprofezin 25% SC: 400 मिली प्रति एकड़
इसका भी 200-250 लीटर पानी प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।
6. भविष्य में बचाव के लिए 3 अतिरिक्त उपाय 1. पीले स्टिकी ट्रैप: खेत में 15-20 पीले चिपचिपे ट्रैप प्रति एकड़ लगाएं। इससे आपको पता चलता रहेगा कि मक्खी कितनी है। 2. खेत की साफ-सफाई: खेत के आस-पास की खरपतवार, खासकर कांग्रेस घास को खत्म करें, यह सफेद मक्खी का घर है। 3. तेज धार से पानी: अगर प्रकोप कम है तो सिर्फ तेज धार से पानी का छिड़काव भी कई शिशुओं को नीचे गिरा देता है। 7. अंतिम सलाह किसान भाइयों के लिए
किसान भाइयों, दवा हमेशा शाम के समय (4 बजे के बाद) ही छिड़कें, जब मक्खी पत्तियों पर बैठी होती है। एक ही दवा को बार-बार न दोहराएं।

जरूरी डिस्क्लेमर: यहाँ बताई गई दवाओं की मात्रा एक सामान्य जानकारी है। दवा खरीदने से पहले अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें और दवा के लेबल पर लिखे निर्देशों का पालन करें।

अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो इसे अन्य किसान भाइयों के साथ भी शेयर करें ताकि सभी की फसल सुरक्षित रह सके।


Tuesday, 2 January 2018

तरबूज की खेती

तरबूज की खेती (farming of watermelon)


https://smartkhet.blogspot.com/2018/01/farming-of-watermelon.html



भूमि एवं जलवायु-

तरबूज की खेती कई तरह की मिट्टी में की जाती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है। खेत तैयार करने के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद की जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करते हैं। खेत को समतल कर ले तो पूरे खेत में पानी की खपत एक समान रहेगी। अगर खेत नदियों के किनारे है तो नालियों और थालों को पानी की उपलब्धता के हिसाब से बनवाए। इन नालियों और थालों में सड़ी हुई गोबर की खाद और मिट्टी के मिश्रण से भर देते हैं। गर्म एवं औसत आद्र्रता वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए सबसे अच्छे रहते हैं। बीज के जमाव व पौधें के बढ़वार के लिए 25-32 सेन्टीग्रेड तापक्रम उपयुक्त होता है।

किस्म-

शुगर बेबी-

इसकी बेलें औसत लम्बाई की होती हैं और फलों का औसत वजन दो से पांच किलोग्राम तक होता है। फल का ऊपरी छिलका गहरे हरे रंग और उन पर धूमिल सी धारियां होती हैं। फल का आकार गोल तथा गूदे का रंग गहरा लाल होता है। यह शीघ्र पकने वाली प्रजाति है। औसत पैदावार 200-300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म लगभग 85 दिन पककर तैयार हो जाती है।

दुर्गापुर केसर-

यह देर से पकने वाली किस्म है, तना तीन मीटर लम्बा, फलों का औसत वजन छह से आठ किलोग्राम, गूदे का रंग पीला तथा छिलका हरे रंग व धारीदार होता है। इसकी औसत उपज 350-450 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है।

अर्का मानिक-

इस किस्म के फल गोल, अण्डाकार व छिलका हरा जिस पर गहरी हरी धारियां होती हैं तथा गुलाबी रंग का होता है। औसत फल वजन छह किलोग्राम होता है। इसकी भण्डारण एवं परिवहन क्षमता अच्छी है। औसत उपज 500 कुन्तल प्रति हेक्टेयर 110-115 दिन में प्राप्त की जा सकती है।

दुर्गापुर मीठा-

इस किस्म का फल गोल हल्का हरा होता है। फल का औसत वजन आठ से नौ किलोग्राम तथा इसकी औसत उपज 400-500 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है। यह लगभग 125 दिन में तैयार हो जाती है।

खाद एवं उर्वरक-

कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद दो किलोग्राम प्रत्येक नाली या थाले में डालते हैं। इसके अतिरिक्त 50 किलोग्राम यूरिया, 47 किलोग्राम डीएपी तथा 67 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति एकड़ की दर से देना। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियां या थाले बनाते समय देते हैं। नत्रजन की आधी मात्रा को दो बराबर भागों में बांट कर खड़ी फसल में जड़ों से 30-40 सेमी दूर गुड़ाई के समय तथा फिर 45 दिन बाद देना चाहिए।

बुआई का समय-

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में तरबूज की बुआई फरवरी से अप्रैल के बीच एवं नदियों के किनारे इसकी बुआई नवम्बर से जनवरी के बीच में की जाती है।

बीज की मात्रा-

एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 25.4 किलोग्राम पर्याप्त होता है।

बुआई की विधि-

तरबूज की बुआई के लिए 2.5 से 3.0 मीटर की दूरी पर 40 से 50 सेमी चौड़ी नाली बना लेते है। इन नालियों के दोनों किनारों पर 60 सेमी की दूरी पर बीज बोते हैं। यह दूरी मृदा की उर्वरता एवं प्रजाति के अनुसार घट बढ़ सकती है। नदियों के किनारे 60 गुणा 60 गुणा 60 सेमी क्षेत्रफल वाले गड्ढïे बनाकर उसमें 1:1:1 के अनुपात में मिट्टी, गोबर की खाद तथा बालू का मिश्रण भर कर थालें को भर देते है उसके बाद प्रत्येक थाले में तीन से चार बीज लगते है।

सिंचाई-

यदि तरबूज की खेती नदियों के कछारों में की जाती है तो सिंचाई की कम आवश्यकता नहीं पड़ती है। जब मैदानी भागों में इसकी खेती की जाती है, तो सिंचाई 7 से 10 दिन के अन्तराल पर करते हैं। जब तरबूज आकार में पूरी तरह से बढ़ जाते हैं तो सिंचाई बन्द कर देते हैं जिससे फल में मिठास हो जाती है और फल नहीं फटते हैं।

खरपतवार नियंत्रण एवं निराई-गुड़ाई -


तरबूज के जमाव से लेकर प्रथम 30-35 दिनों तक निराई गुड़ाई करके खरपतवार को निकाल देते हैं। इससे फसल की वृद्वि अच्छी होती है तथा पौधे की बढ़वार रुक जाती है। रासायनिक खरपतवारनाशी के रुप में बूटाक्लोर रसायन 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव करते हैं।

अंगूर की खेती

अंगूर की खेती (farming of grapes)


https://smartkhet.blogspot.com/2018/01/farming-of-grapes.html



भारत में अंगूर की खेती अनूठी है क्योंकि यह, उष्ण शीतोष्ण,सभी प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। हालांकि अंगूर की अधिकांशतः व्यावसायिक 
खेती (85प्रतिशत क्षेत्र में) उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में 
(महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं। अतः उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिससे जून माह में भी अंगूर मिलते हैं।

उपयोग-

अंगूर एक स्वादिष्ट फल है. भारत में अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है वैसे अंगूर के कई उपयोग हैं. इससे किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है.

मिट्टी एवं जलवायु-

अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है. अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है. अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है. अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है. जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है. इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है. अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है. इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है. अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है.

किस्में-

उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्मों की विशेषताएं नीचे दी जा रही हैं.
1-परलेट
2-ब्यूटी सीडलेस
3-पूसा सीडलेस
4-पूसा नवरंग

प्रवर्धन-

अंगूर का प्रवर्धन मुख्यतः कटिंग कलम द्वारा होता है. जनवरी माह में काट छाँट से निकली टहनियों से कलमे ली जाती हैं. कलमे सदैव स्वस्थ एवं परिपक्व टहनियों से लिए जाने चाहिए. सामान्यतः 4 - 6 गांठों वाली 23 - 45 से.मी. लम्बी कलमें ली जाती हैं.कलम बनाते समय यह ध्यान रखें कि कलम का निचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए एवं ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए. इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा सतह से ऊँची क्यारियों में लगा देते हैं. एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकल कर खेत में रोपित कर देते हैं.

बेलों की रोपाई-

रोपाई से पूर्व मिट्टी की जाँच अवश्य करवा लें. खेत को भलीभांति तैयार कर लें. बेल की बीच की दुरी किस्म विशेष एवं साधने की पद्धति पर निर्भर करती है. इन सभी चीजों को ध्यान में रख कर 90 x 90 से.मी. आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन्हें 1/2 भाग मिट्टी, 1/2 भाग गोबर की सड़ी हुई खाद एवं 30 ग्राम क्लोरिपाईरीफास, 1 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट व 500 ग्राम पोटेशीयम सल्फेट आदि को अच्छी तरह मिलाकर भर दें. जनवरी माह में इन गड्ढों में 1 साल पुरानी जड़वाली कलमों को लगा दें. बेल लगाने के तुंरत बाद पानी आवश्यक है.

बेलों की छंटाई-

अंगूर की बेल साधने हेतु पण्डाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन एवं हैड आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं. लेकिन व्यवसायिक इतर पर पण्डाल पद्धति ही अधिक उपयोगी सिद्ध हुयी है. पण्डाल पद्धति द्वारा बेलों को साधने हेतु 2.1 - 2.5 मीटर ऊँचाई पर कंक्रीट के खंभों के सहारे लगी तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है. जाल तक पहुँचने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है. तारों के जाल पर पहुँचने पर ताने को काट दिया जाता है ताकि पार्श्व शाखाएँ उग आयें.उगी हुई प्राथमिक शाखाओं पर सभी दिशाओं में 60 सेमी दूसरी पार्श्व शाखाओं के रूप में विकसित किया जाता है. इस तरह द्वितीयक शाखाओं से 8 - 10 तृतीयक शाखाएँ विकसित होंगी इन्ही शाखाओं पर फल लगते हैं.

छंटाई-

बेलों से लगातार एवं अच्छी फसल लेने के लिए उनकी उचित समय पर काट - छाँट अति आवश्यक है. छंटाई कब करें : जब बेल सुसुप्त अवस्था में हो तो छंटाई की जा सकती है, परन्तु कोंपले फूटने से पहले प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए. सामान्यतः काट - छांट जनवरी माह में की जाती है.

सिंचाई-

नवम्बर से दिसम्बर माह तक सिंचाई की खास आवश्यकता नहीं होती क्योंकि बेल सुसुप्ता अवस्था में होती है लेकिन छंटाई के बाद सिंचाई आवश्यक होती है. फूल आने तथा पूरा फल बनने (मार्च से मई ) तक पानी की आवश्यकता होती है. क्योंकि इस दौरान पानी की कमी से उत्पादन एवं हुन्वात्ता दोनों पर बुरा असर पड़ता है. इस दौरान तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 - 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए नहीं तो फल फट एवं सड़ सकते हैं. फलों की तुडाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक-

अंगूर की बेल भूमि से काफी मात्र में पोषक तत्वों को ग्रहण करती है. अतः मिट्टी कि उर्वरता बनाये रखने के लिए एवं लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल लेने के लिए यह आवश्यक है की खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों की पूर्ति की जाये. पण्डाल पद्धति से साधी गई एवं 3 x 3 मी. की दुरी पर लगाई गयी अंगूर की 5 वर्ष की बेल में लगभग 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट एवं 50 - 60 कि.ग्रा. गोबर की खाद की आवश्यकता होती है.

खाद देने का समय-

छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए. शेष मात्र फल लगने के बाद दें. खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें. खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें.

कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार-

अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए. ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं. परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है.

फसल निर्धारण-

फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है. अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं. अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं. अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें.

छल्ला विधि-

इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है. छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है. अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए. आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौडी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए.

वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग-

बीज रहित किस्मों में जिब्बरेलिक एसिड का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है. पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम. 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में, ब्यूटी सीडलेस मने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम. एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए. जिब्बरेलिक एसिड के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है. यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी में इथेफ़ोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है. फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है. यदि जनवरी के प्रारंभ में डोरमैक्स 3 का छिडकाव कर दिया जाये तो अंगूर 1 - 2 सप्ताह जल्दी पक सकते हैं.

फल तुड़ाई एवं उत्पादन-

अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए. शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं. फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए. उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें. पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें. अंगूर के अच्छे रख - रखाव वाले बाग़ से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते हैं और 2 - 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं. परलेट किस्म के 14 - 15 साल के बगीचे से 30 - 35 टन एवं पूसा सीडलेस से 15 - 20 टन प्रति हैक्टेयर फल लिया जा सकता है.

Monday, 1 January 2018

रसभरी की खेती

रसभरी की खेती (farming of Raspberry)


रसभरी की खेती (farming of Raspberry)



रास्पबेरी एक स्वादिष्ट और पौष्टिक खाने योग्य फल है जो प्राकृतिक तौर पर ठंडे जलवायु क्षेत्र में बढ़ते हैं, हालांकि इसकी खेती अधिकांश जलवायु क्षेत्र में हो सकती है। रास्पबेरी की खेती ताजे फल बाजार और व्यावसायिक प्रोद्योगिकी के लिए होती है, जिसमे अलग-अलग तेजी से जमनेवाले फल, प्यूरी, रस या सूखे फल जैसे कई प्रकार के रसोई संबंधी उत्पाद किए जा सकते हैं। रास्पबेरी उपजाना बेहद मजेदार है और लगातार इसकी प्रसिद्धि बढ़ रही है। ऐसे फल हाथ से तोड़े जा सकते हैं और स्ट्राबेरी के ठीक बाद और ब्लूबेरी के ठीक पहले तैयार हो जाते हैं। रास्पबेरी की पूरी फसल की उम्मीद पौधारोपन के तीन साल बाद की जा सकती है और इसके पेड़ 10 से 15 साल तक फल देते रहते हैं। रास्पबेरी ”रोज” परिवार और ”रुबस” प्रजाति की है। रास्पबेरी को बर्तन, गमला और घर के पीछे आंगन में भी लगा सकते हैं। बागवानी और खेतीबाड़ी के उपयुक्त तौर-तरीके अपना कर कोई भी अच्छे मुनाफे की उम्मीद कर सकता है। अगर रास्पबेरी की खेती व्यावसायिक मकसद से करना है तो इसके लिए अच्छे तरीके से मिट्टी की जांच और दूसरे उपाय अपनाने चाहिए। रास्पबेरी का फल पोषण और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य फायदों के लिए बेहतरीन श्रोत है।

रसभरी के स्वास्थ्य संबंधी लाभ-

रसभरी या रास्पबेरी के स्वास्थ्य संबंधी फायदे निम्न हैं-
वजन प्रबंधन में मददगार
झुर्रियां कम करने में सहायक
दाग-धब्बे की विकृति को रोकने में मदद
संक्रमण और कुछ तरह के कैंसर को रोकता है
प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाने में सहायक
स्त्री स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है
उच्च पोषक तत्वों से भरपूर
बुढ़ापे को रोकने वाले तत्व
त्वचा के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद

रसभरी के प्रकार-

मूल रुप से रास्पबेरी समर बीयरर्स यानी गर्मी बर्दाश्त करनेवाला और एवर बीयरर्स यानी हमेशा बर्दाश्त करने वाला, दो प्रजातियों में पाया जाता है। सामान्य तौर पर समर बीयरर्स एक मौसम में एक फसल देता है और वो गर्मी के मौसम में भी, जबकि एवर बीयरर्स प्रत्येक साल दो फसल देता है, एक गर्मी में और दूसरा शरद ऋतु में। पूरी दुनिया में रास्पबेरी की कुछ और मुख्य किस्में उगाई जाती है, वो है- समर रेड रास्पबेरीज, ब्लैक रास्पबेरीज, एवर बियरिंग रेड रास्पबेरीज, पर्पल रास्पबेरीज और गोल्डन रास्पबेरीज। भारत में अधिकांश जगहों पर मैसूर रास्पबेरीज किस्म की खेती होती है।

रसभरी की खेती के लिए आवश्यक जलवायु-

रास्पबेरी को कई तरह की जलवायु या मौसम में लगाया जा सकता है। हालांकि यह सबसे अच्छा ठंडे मौसम में फलता-फूलता है। रसभरी कुछ हद तक छाया को बर्दाश्त कर लेती है लेकिन सूर्य की पर्याप्त रोशनी में अच्छी बढ़त होती है। अधिकांश रसभरी की किस्में समशीतोष्ण और हल्की ठंड के मौसम वाले क्षेत्र में अच्छी तरह बढ़ते हैं।

रसभरी के लिए आवश्यक मिट्टी-

रसभरी की फसल सबसे बेहतर चिकनी बलुई मिट्टी से लेकर तलछट मिट्टी (पानी के बहाव से लायी हुई मिट्टी या रेत), जिसमें पानी निकासी की अच्छी व्यवस्था हो, में होती है। खराब पानी निकासी वाली भारी चिकनी मिट्टी वाली भूमि पर इसकी खेती करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे कुछ ही दिनों में जड़ में सड़न शुरू हो जाती है। रसभरी के पौधे के लिए 6.0 से 7.0 पीएच वाली मिट्टी अनुकूल है और जिसमे अच्छी गुणवत्ता युक्त भारी मात्रा में फसल पैदा होती है। अम्लीय गुणों वाली मिट्टी को चूना डालकर ठीक किया जा सकता है। मिट्टी जांच के परिणाम के आधार पर सूक्ष्म पोषण तत्वों की कमी को दूर किया जाना चाहिए। जमीन की तैयारी के सिलसिले में मिट्टी को और ऊर्वर बनाने के लिए जैविक खाद मिलाना चाहिए।

रसभरी की खेती का मौसम-

सामान्यतौर पर नर्सरी के डिब्बे में उगाये गए रसभरी के पौधे को ठंड या पाला का मौसम बीत जाने के बाद लगाना चाहिए। इन पौधों को नर्सरी के पौधे की तुलना में एक ईंच ज्यादा गहरा लगाना चाहिए।

रसभरी की खेती के लिए जमीन की तैयारी-

रसभरी की खेती में जमीन या खेत की तैयारी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रसभरी की खेती में मिट्टी से पानी की निकासी बहुत अहम होता है। रसभरी की खेती में ऊपरी मिट्टी में जैविक खाद की अच्छी आपूर्ति होनी चाहिए और नीचे की मिट्टी गहरी और अच्छी तरह से सूखी होनी चाहिए। ऐसे क्षेत्र जहां 2 से 3 साल से टमाटर, आलू, बैगन, किसी भी तरह की मिर्च की खेती या ऐसी फसल जो मुरझा देने वाले फफूंद के संपर्क में आसानी से आ जाती है,वहां रसभरी या रास्पबेरी की खेती की सलाह या अनुशंसा नहीं की जाती है। रसभरी या रास्पबेरी के पौधारोपन से पहले, जमीन की तैयारी के सिलसिले में पिछली फसल के सारे खर-पतवार को खत्म करना सुनिश्चित कर लें। मिट्टी अच्छी तरह मिल जाये इसके लिए एक-दो बार खेत की जुताई कर लें।

रसभरी या रास्पबेरी की उत्पत्ति और पौधारोपन-

आमतौर पर, रसभरी या रास्पबेरी की उत्पत्ति जड़ से अंकुरण द्वारा होता है। इन पौधों के जड़ का विभाजन तेज धार कुदाल और हाथ से किया जाता है। अच्छी नर्सरी से मान्यता प्राप्त रोगमुक्त रास्पबेरी पौधा खरीदना सबसे अच्छा होता है। पारंपरिक तौर पर, रास्पबेरी का पौधा जड़ समेत अच्छी तरह बड़ा और जड़ समेत बिकता है। रास्पबेरी नर्सरी का एक साल पुराना पौधा या डिब्बे में लगे पौधे के तने की लंबाई जब 20 से 30 सेमी का हो जाए तो उसे खेत में लगाया जा सकता है। अक्सर, रसभरी या रास्पबेरी के पौधों के बीच दूरी एक लाइन के बीच 60सेमी और गलियारे के बीच 2.75मी होती है। आमतौर पर 15से 18 तना प्रति मीटर होता है।

रसभरी या रास्पबेरी खेती में सिंचाई-

सिंचाई पूरी तरह मिट्टी के प्रकार और मौसम की स्थिति पर निर्भर करता है। हालांकि, सूखे क्षेत्र में रास्पबेरी की फसल को बार-बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है। अगर साप्ताहिक बारिश एक ईंच से कम हो तो पर्याप्त सिंचाई की जरूरत होती है। आमतौर पर रास्पबेरी को सप्ताह में एक बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है। यह सुनिश्चित करें कि फसल कटाई के बाद पर्याप्त सिंचाई की जाए। पानी की कमी की स्थिति में, ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल किया जा सकता है। ड्रिप(बूंद-बूंद) और स्प्रिंकलर(फव्वारा) सिंचाई के लिए स्थानीय प्रशासन की ओर से सब्सिडी या छूट की कुछ योजनाएं हैं। ड्रिप और स्प्रिंकलर व्यवस्था की पूरी जानकारी के लिए स्थानीय बागबानी विभाग या कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क करें।

रसभरी या रास्पबेरी की खेती में खाद और ऊर्वरक-

रसभरी की फसल जैविक खाद और ऊर्वरक के इस्तेमाल पर बहुत अच्छा परिणाम देती है। पौधे की अच्छी बढ़त के लिए ऊर्वरक के बेहतर इस्तेमाल की एक वार्षिक योजना चलाई जानी चाहिए। प्रति वर्ष, प्रत्येक 10 फीट की लाइन पर 60 से 90 ग्राम नाइट्रोजन का इस्तेमाल होना चाहिए। जैसे ही प्राइमोकेन बढ़ने लगता है तब पूरे का एक तिहाई इस्तेमाल करें। एक तिहाई मई के अंत में और एक तिहाई जून के अंत में इस्तेमाल करना चाहिए। ऊर्वरक के इस्तेमाल के बाद ब्रोडकास्टिंग मेथड यानी छिड़काव पद्धति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मिट्टी में ऊर्वरक के इस्तेमाल के ठीक बाद हल्की सिंचाई की जरूरत पड़ती है। मिट्टी की जांच के बाद अगर पोषक तत्वों की कमी पाई जाती है तो उसे दूर किया जाना चाहिए। जमीन की तैयारी के वक्त पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद के इस्तेमाल से अच्छी फसल पैदा होती है।

रास्पबेरी की खेती की अंतरसांस्कृतिक कार्यप्रणाली-

टीला और क्यारियों (गलियारे) के बीच पनपने वाले खर-पतवार और प्राइमोकेन्स पर नियंत्रण के लिए हल्की जुताई की जरूरत होती है। जड़ को नुकसान पहुंचने से रोकने के लिए एक से डेढ़ ईंच से ज्यादा गहरी जुताई नहीं करें। मल्चिंग यानी गीली घास रखने से नमी को प्राप्त रखने और खर-पतवार के बढ़ने पर रोक लगाने में सहायक होता है। पौधे के बढ़ने के दौरान प्राइमोकेन्स की छंटाई नहीं करें। गर्मी के अंतिम दिनों में या फिर पतझड़ के मौसम में पुराने और मृत फ्लोरिकेंन्स को हटा देना चाहिए। पौधे से सभी फलों को तोड़ने के बाद फ्लोरिकेंस की कटाई-छंटाई करनी चाहिए।

रास्पबेरी की खेती में लगनेवाले रोग और कीट-पतंग-

रास्पबेरी की फसल कई कीट-पतंगों, परोपजीवी और रोगों के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। ये पौधे की वृद्धि और फसल की पैदावार को बुरी तरह से प्रभावित करता है। रास्पबेरी की फसल में पाये जाने वाले कुछ सामान्य घातक कीट और बीमारी हैं– रुट वीविल्स, लीफ रोलर लार्वा, स्पाइडर माइट्स, एफीड्स,पाउडर जैसा फफूंद, एंथ्रेकनोज, वर्टीसिलियम विल्ट, और फाइटोफ्थोरा रुट रॉट। इनके लक्षणों और इन पर नियंत्रण के तरीके जानने के लिए अपने स्थानीय बागबानी विभाग या कृषि विश्वविद्यालय में संपर्क करें।

नोट-

उपर उल्लेखित बीमारियां और उस पर नियंत्रण के लिए अपने स्थानीय बागबानी या कृषि विभाग या कृषि विश्वविद्यालय रिसर्च सेंटर में संपर्क करें। इन बीमारियों के लक्षण और उन पर नियंत्रण करने के लिए ये सबसे बेहतरीन श्रोत हैं।

रसभरी की कटाई-

रास्पबेरी का फल बहुत जल्द नष्ट होने वाला होता है इसलिए वक्त पर इसकी कटाई बेहद जरूरी है। बाद में होने वाली कटाई फल की जिंदगी को तय करता है। रास्पबेरी फल की कटाई रोज की जा सकती है। लगभग 60 से 65 फीसदी फल की मार्केटिंग बतौर ताजे फल के रुप में की जा सकती है और 35 से 40फीसदी की मार्केटिंग फ्रोजन फ्रूट के तौर पर।

रसभरी की पैदावार-

फसल की पैदावार कई तत्वों पर निर्भर करती है, जैसे कि मिट्टी का प्रकार, अलग प्रजाति और उद्यान प्रबंधन। दूसरे साल से प्रति 60 पंक्तिरुप सेमी से तीन से चार किलोग्राम पैदावार होती है।

रसभरी का बाजार-

बतौर ताजा फसल के तौर पर इसे स्थानीय बाजार में बेचा जा सकता है। और दूसरे रुप प्यूरी और फ्रोजन (जमा हुआ) फल के तौर पर इसे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में निर्यात कर दिया जाता है।

Monday, 25 September 2017

अमरूद की उन्नत खेती

अमरूद की उन्नत खेती (Advanced cultivation of guava)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/Advanced-cultivation-of-guava.html अमरूद की उन्नत खेती (Advanced cultivation of guava) / amrud (guava) tree photos , fruits





अमरूद भारत का एक लोकप्रिय फल है। क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से देश में उगाये जाने वाले फलों में अमरूद का चौथा स्थान है। यह विटामिन-सी का मुख्य स्त्रोत है। यह असिंचित एंव सिंचित क्षेत्रों में सभी प्रकार की ज़मीन में उगाया जा सकता है।

भूमि एवं जलवायु:

अमरूद को लगभग प्रत्येक प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है, परन्तु अच्छे उत्पादन के लिये उपजाऊ बलुई दुमट भूमि अच्छी पाई गई है। इसके उत्पादन हेतु 6 से 7.5 पी.एच. मान की मृदा उपयुक्त होती है किन्तु 7.5 से अधिक पी.एच. मान की मृदा में उकठा रोग के प्रकोप की संभावना होती है। अमरूद को उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में सफलता पूर्वक पैदा किया जा सकता है, परन्तु अधिक वर्षा वाले क्षेत्र, अमरूद की खेती के लिये उपयुक्त नहीं होते हैं। अमरूद की खेती के लिये 15 डिग्री. से. 30 डिग्री से. तापमान अनुकूल होता है। यह सूखे को भी भली-भाँति सहन कर लेता है। तापमान के अधिक उतार चढ़ाव, गर्म हवा, कम वर्षा, जलक्रान्ति का फलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता है। अमरूद को मध्यप्रदेश के सभी जि़लों में उगाया जा सकता है ।

उन्नत किस्में:

 अमरूद की व्यावयायिक स्तर पर उगाई जाने वाली किस्मों में से इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ-49, चित्तीदार, ग्वालियर-27, एपिल-गुवावा एवं धारीदार प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त अर्का-मृदुला, श्वेता, ललित एवं पंत-प्रभात किस्में व्यवसायिक उत्पादन हेतु उपयोग में लाई जा सकती हैं। कोहीर, सफेदा एवं सफेद जाम नामक संकर प्रजातियाँ भी उपयोग में लाई जा सकती हैं।

 इलाहाबाद-सफेदा:

 इस किस्म के पेड़ सीधे बढ़ने वाले एवं मध्यम ऊँचाई वाले होते हैं । फल का आकार मध्यम, गोलाकार एंव औसत वजन 180 ग्राम होता है। फल की सतह चिकनी, छिल्का पीला, गूदा मुलायम, रंग सफेद, सुविकसित और स्वाद मीठा होता है। बीज बड़े एवं कड़े होते हैं। इस किस्म की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।

लखनऊ-49 (सरदार अमरूद):

 इस किस्म के पेड़ मध्यम ऊँचाई के, फलने वाले तथा अधिक शाखाओं वाले होते हैं। फल मध्यम से बडे़, गोल, अंडाकार, खुरदुरी सतह वाले एवं पीले रंग के होते हैं। गूदा मूलायम, सफेद तथा स्वाद खटास लिये हुये मीठा होता है। इसकी भंडारण क्षमता अन्य जातियों की तुलना में अच्छी होती है तथा इसमें उकठा रोग का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है।

चित्तीदार:

यह किस्म सफेदा के समान होती है। परन्तु फलों की सतह पर लाल रंग के धब्बे पाये जाते हैं। इसके बीज मुलायम तथा छोटे होते हैं । फल मध्यम, अंडाकार, चिकने एवं हल्के पीले रंग के होते हैं। गूदा मुलायम, सफेद, सुवास युक्त मीठा होता है।

एप्पल-कलर:

 इस किस्म के भी पौधे मध्यम ऊँचाई के एवं फैले हुये होते हैं। फल गोल एवं चिकने होते हैं। छिल्का गुलाबी या हरे लाल रंग का होता है। फलों का गूदा मुलायम, सफेद एवं सुवास युक्त होता है। बीज मध्यम आकार के होते हैं तथा फलों की भंडारण क्षमता मध्यम होती है।

अर्का-मृदुला:

 यह जाति इलाहाबाद सफेदा से पौधे चुनाव विधि के द्वारा विकसित की गई है। फल चिकने, मध्यम आकार, मुलायम बीज, गूदा सफेद एवं मीठा होता है। इस किस्म में प्रचुर मात्रा में विटामिन-सी पाई जाती है। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।

ललित:

 यह किस्म सी.आई.एस.एच. लखनऊ द्वारा विकसित की गई है। फल मध्यम आकार एवं केशरनुमा आकर्षक पीले रंग के होते हैं। गूदा गुलाबी रंग का होता है। जिसके कारण यह किस्म संरक्षित पदार्थों को बनाने हेतु उपयुक्त होती है। यह किस्म इलाहाबाद सफेदा की अपेक्षा 24 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन देती है। फल का वजन 250 से 300 ग्राम तक होता है ।

संकर जातियाँ अमरूद की संकर जातियाँ इस प्रकार हैं:

अर्का-अमूल्या:

 यह जाति सीडलेस एंव इलाहाबाद सफेदा के संकरण से तैयार की गई है। इसके वृक्ष मध्यम आकार के एवं अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। फल मध्यम आकार (180-200 ग्राम), सफेद रंग, गूदा मीठा, मुलायम एवं बीज छोटे होते हैं। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती है।

प्रसारण तथा प्रवर्धन:

 अमरूद का प्रसार व्यवसायिक स्तर पर वानस्पतिक विधियों द्वारा किया जा सकता है अतः अमरूद का बाग लगाने के लिये वानस्पतिक विधियों द्वारा तैयार पौधों का ही उपयोग करें। इसके व्यावसायिक प्रसार के लिये पेंच कलिकायन एवं उपरोपण विधि का उपयोग किया जाना उत्तम पाया गया है ।

पादप रोपणः

 पादप रोपण द्वारा अमरूद के पौधे लगाने का मुख्य समय जुलाई से अगस्त तक है लेकिन जिन स्थानों में सिंचाई की सुविधा हो वहाँ पर पौधे फरवरी-मार्च में भी लगाये जा सकते हैं। बाग लगाने के लिये खेत को समतल करने के पश्चात् रेखांकन कर पौधे लगाने के लिये निश्चित दूरी पर 60 सें.मी X 60 सें.मी. X 60 सें.मी. आकार के गड्ढे तैयार करें। इन गड्ढों को 15-20 कि.ग्रा. अच्छी तैयार हुई गोबर की खाद, 500 ग्राम सुपर फॉस्फेट, 250 ग्राम पोटाश तथा 100 ग्राम मिथाईल पैराथियॉन पाऊडर को अच्छी तरह से मिट्टी में मिला कर पौधे लगाने के 15-20 दिन पहले भर दें। बाग में पौधे लगाने की दूरी मृदा की उर्वरता, किस्म विशेष एवं जलवायु पर निर्भर करती है। इस प्रकार कम उपजाऊ भूमि में 6 मी. X 6 मी. एवं 6.5 मी. X 6.5 मी. की दूरी पर पौधे लगायें।

सघन बागवानी/रोपण:

अमरूद की सघन बागवानी के बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं। सघन रोपण में प्रति हैक्टेयर 500 से 5000 पौधे तक लगाये जा सकते हैं तथा समय-समय पर कटाई-छँटाई करके एवं वृद्धि नियंत्रकों का प्रयोग करके पौधों का आकार छोटा रखा जाता है। इस तरह की बागवानी से 30 टन से 50 टन तक उत्पादन/है. लिया जा सकता है। जबकि पारम्परिक विधि से लगाये गये बगीचों का उत्पादन 15-20 टन/है. होता है।

 (अ) 3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 1.5 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 2222 पौधे/हैक्टेयर।

 (ब) 3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 3 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 1111 पौधे/हैक्टेयर।

 (स) 6 मीटर (पंक्ति से पंक्ति) 1.5 मीटर (पौधे से पौधे) कुल 555 पौधे/हैक्टेयर।

खाद एवं उर्वरक:

 अमरूद की संतोषजनक वृद्धि एवं उत्पादन के लिये पर्याप्त मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। अमरूद को मुख्य एवं सूक्ष्म तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश युक्त तत्वों की काफी मात्रा में आवश्यकता होती है। जस्ते एवं बोरॉन तत्वों की कम मात्रा में अवश्यकता पड़ती है। अमरूद के कुछ बागों/पौधों में जस्ते की कमी देखी गई है। इसकी कमी से पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है, बहुत सी छोटी व नुकीली पत्तियाँ गुच्छों के रूप में निकलती हैं और पत्तियों के नसों का रंग हल्का पीला हो जाता है। बहुत अधिक कमी होने पर पेड़ों की शाखायें ऊपर की तरफ से सूखना प्रारंभ कर देती हैं । पौधों में फूल कम आते हैं एवं जो फल लगते हैं, फटकर सूख जाते हैं। बोरॉन की कमी से फलों के अन्दर, बीजों के पास एक धब्बा बन जाता है जो गूदे की तरफ बढ़ कर गूदे को भूरे या काले रंग का कर देता है जिससे प्रभावित भाग कड़ा हो जाता है तथा फलों का आकार छोटा हो जाता है।

अतः पौधों की उत्तम वृद्धि एवं उत्पादन के लिये खाद एवं उर्वरकों की निम्नलिखित मात्रा का प्रयोग करें -

अमरूद के लिये खाद एवं उर्वरक की मात्रा

क्र.      पौधों की आयु (वर्षों में)        गोबर खाद(कि.ग्रा.)      नत्रजन(ग्राम)       स्फुर(ग्राम)        पोटाश  (ग्राम)
1.        1                                             10                   50                     30                50
2.        2                                              20                  100                   60              100
3.        3                                               30                 150                   90              150
4.        4                                               40                  200                 120             200
5.        5                                               50                  250                 150             250
6.            6 वर्ष एवं ऊपर                          60                   300                 180             300

उपरोक्त खाद एवं उर्वरकों के अतिरिक्त 0.5 प्रतिशत ज़िंक सल्फेट, 0.4 प्रतिशत बोरिक ऐसिड एवं 0.4 प्रतिशत कॉपर सल्फेट का छिड़काव फूल आने के पहले करने से पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन बढ़ाने में सफलता मिलेगी।

जैविक खाद:

 अमरूद में नीम की खली 6 कि.ग्रा. प्रति पौधा डालने से उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ उत्तम गुण वाले फल प्राप्त करें। गोबर की खाद 40 कि.ग्रा. अथवा 4 कि.ग्रा. वर्मी कम्पोस्ट के साथ 100 ग्राम जैविक खाद जैसे एज़ोस्पाईरिलम, व्ही.ए.एम. एवं पी.एस.एम. के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि एवं अच्छी गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन होगा।

खाद देने का समय एवं विधि:

अमरूद में पोषक तत्व खींचने वाली जड़ें तने के आस-पास एवं 30 सें.मी. की गहराई में होती है। इसलिये खाद देते समय इस बात का ध्यान रखें कि खाद, पेड़ के फैलाव में 15-20 सें.मी. की गहराई में थाला बनाकर दें । गोबर की खाद, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा जून-जुलाई में तथा शेष नत्रजन की मात्रा सितम्बर-अक्टूबर में वर्षा समाप्त होने से पहले दें।

सिंचाई:

 अमरूद के एक से दो वर्ष पुराने पौधों की सिंचाई, भारी भूमि में 10-15 दिन के अन्तर से तथा हल्की भूमि में 5-7 दिन के अन्तर से करें। गर्मियों में सिंचाई का अंतराल कम करें व सिंचाई जल्दी-जल्दी करें। दो वर्ष से अधिक उम्र के पौधों को भारी भूमि में 20 दिन तथा हल्की भूमि में 10 दिन के अन्तर से थाला बनाकर पानी दें। पुराने एवं फलदार पेड़ों की सिंचाई, वर्षा के बाद 20-25 दिन के अंतर से, जब तक फसल बढ़ती है, करते रहें तथा फसल तोड़ने के बाद सिंचाई बंद कर दें।

मल्चिंग/बिछावन:

 असिंचित क्षेत्रों में वर्षा के जल को अमरूद के पौधो के चारों ओर थाला बना कर सिंचित करें तथा सितम्बर माह में घास एवं पत्तियाँ बिछा कर नमी को संरक्षित करें। इससे उत्पादन में वृद्धि होकर उत्तम गुण वाले फल प्राप्त होंगे ।

कटाई-छँटाईः

 प्रारंभिक वर्ष में कटाई-छँटाई का कार्य कर पौधों को आकार दें। पौधों को साधने के लिये सबसे पहले उन्हें 60-90 सें.मी. तक सीधा बढ़ने दें। फिर इस ऊँचाई के बाद 15-20 से.मी. के अंतर पर 3-4 शाखायें चुन लें। इसके पश्चात् मुख्य तने के शीर्ष एवं किनारे की शाखाओं की कटाई एवं छँटाई करें जिससे पेड़ का आकार नियंत्रित रहे। बड़े पेड़ों से सूखी तथा रोगग्रस्त टहनियों को अलग करें। तने के आस-पास भूमि की सतह से निकलने वाले कल्लों को निकालते रहें। पुराने पौधे जिनकी उत्पादन क्षमता घट गई हो उनकी मुख्य एवं द्वितीयक शाखाओं की कटाई करें जिससे नई शाखायें आयेंगी तथा पुराने पौधों की उत्पादन क्षमता बढे़गी।

अन्तरवर्तीय फसलें:

 प्रारंभिक दो-तीन वर्षों में बगीचों के रिक्त स्थानों में रबी में मटर,फ्रैंचबीन, गोभी एवं मेथी, खरीफ में लोबिया, ज्वार, उर्द, मूँग एवं सोयाबीन तथा ज़ायद (गर्मी की फसल) में कद्दू वर्गीय सब्ज़ियाँ उगायें।

फलन उपचार (बहार ट्रीटमैंट):

 अमरूद में आमतौर पर वर्ष में एक मुख्य शीतकालीन फसल (हस्त बहार) लेने का सुझाव दिया जाता है जबकि अमरूद में वर्ष में तीन बार फूल आते हैं । अतः गर्मी एवं वर्षा ऋतु में आने वाले फूलों को सिंचाई रोककर प्रतिबंधित करना उचित होता है। वर्षाकालीन फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप अधिक होता है। जबकि सर्दी की फसल के फल उत्तम गुण वाले होते हैं तथा फलों में विटामिन-सी की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। वर्षाकालीन फसल को बाज़ार में अच्छा मूल्य नहीं मिल पाता है। अतः ठंड की फसल लेने की सिफारिश की जाती है।

वर्षाकालीन फसल को रोक कर ठंड की फसल लेने के लिये निम्नलिखित उपाय करें –

 1. अप्रैल से जून तक पौधों को पानी नहीं दें। पानी रोकने की यह क्रिया 4 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में ही करें। जिससे बसंत ऋतु में फूल एवं पत्तियाँ गिर जाती हैं तथा वर्षान्त में फूल काफी संख्या में आते हैं। इस कार्य हेतु स्थानीय अनुभव अनुसार पानी रोकने की समय सीमा तय करे।

 2. यूरिया का 10 प्रतिशत घोल का छिड़काव एक बार या 100-200 पी.पी.एम नेफ्थलीन ऐसेटिक एसिड के घोल का छिड़काव 20 दिन के अंतराल से दो बार करें । जिससे अनचाहे फल/पत्तियाँ गिराये जा सकते हैं ।

रोग नियंत्रण

 यद्यपि अमरूद में कई प्रकार के रोग बीमारियाँ जैसे उकठा, एन्थ्रेक्नोज़, पौध अंगमारी, तना कैन्कर, फल चित्ती एवं स्कैब आदि से नुकसान होता है लेकिन सर्वाधिक नुकसान उकठा से होता हैं।

अमरूद के पेड़ को प्रभावित करने वाले रोग एवं उनके नियंत्रण निम्नानुसार है –

उकठा:

यह अमरूद का सबसे विनाशकारी रोग है। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम वर्षांत में दिखाई देते हैं। रोगी पेड़ों की पत्तियाँ भूरे रंग की होती हैं एवं पेड़ मुरझा जाता है। प्रभावित पेड़ों की डालियाँ एक-एक करके सूखने लगती हैं। यह रोग उन क्षेत्रों में अधिक तीव्र गति से फैलता है जहाँ कि मृदा का पी.एच. मान 7.5 से अधिक होता है। भूमि की नमी भी रोग को फैलने में सहायक होती है। मृदा आर्द्रता (60-80 प्रतिशत) पर रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। यह रोग लाल लैटराईट एवं एल्यूवियल भूमि में तीव्रता से फैलता है।

नियंत्रण:

इस रोग से ग्रसित पौधों / पेड़ों के गड्ढों की मिट्टी को एक ग्राम बेनलेट या कार्बेन्डाज़िम प्रति लीटर पानी में घोल कर (20 लीटर प्रति गड्ढा) उपचारित करें। भूमि में चूना, जिप्सम तथा कार्बनिक खाद मिलाकर रोग के प्रकोप को कम करें। अमरूद की लखनऊ-49 किस्म में यह रोग कम लगता है। अतः इस जाति का प्रयोग करें। चायनीज़ जाति के अमरूद इस रोग से काफी हद तक प्रतिरोधी पाये गये हैं। अतः इसे मूलवृन्त के रूप में प्रयोग करें। कीट नियंत्रण अमरूद में तना छेदक, फल की मक्खी, मिली बग, स्केल कीट आदि से नुकसान होता है।
अमरूद के पेड़ को प्रभावित करने वाले कीट एवं उनके नियंत्रण निम्नानुसार हैं –

 छाल भक्षक इल्ली:

अमरूद में सबसे ज्यादा नुकसान इस इल्ली के द्वारा होता है, जो कि अमरूद के अतिरिक्त आम, बेर, अनार तथा नींबू जाति के फलों पर भी आक्रमण करती है। इस कीट की इल्ली तने का छाल खाती है तथा तने में छेद कर देती है। छाल खाने के बाद एक प्रकार का काला अवशेष छोड़ती है जो कि प्रभावित हिस्सों पर चिपका रहता है।

नियंत्रण:

इसकी रोकथाम के लिये छिद्रों में मिट्टी के तेल या पेट्रोल या न्यूवॉन से भीगी रूई छेद में डालें एवं ऊपर से छेद के मुँह को गीली मिट्टी से बन्द कर दें।