Thursday, 20 August 2026

अगस्त महीने में करें इन 5 अगेती सब्जियों की खेती, 40 दिन में होगी बंपर कमाई! (August Vegetable Farming Guide)

 भूमिका (Introduction)

भारतीय कृषि में अगस्त का महीना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समय मानसून की बारिश के कारण मिट्टी में प्राकृतिक नमी होती है, जो पौधों के शुरुआती विकास के लिए अमृत समान है। यदि आप पारंपरिक खेती से हटकर इस महीने अगेती (Early Season) सब्जियों की खेती शुरू करते हैं, तो आपकी फसल त्योहारों के सीजन (नवरात्रि और दिवाली) तक बाजार में आ जाएगी। इस समय मार्केट में ताजी सब्जियों की आवक कम होती है, जिसके कारण किसानों को आम दिनों की तुलना में दोगुना तक मंडी भाव (Market Price) मिलता है।
आइए जानते हैं अगस्त महीने में सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली टॉप 5 सब्जियों की विस्तृत खेती, उनकी बीज दर और सटीक खाद प्रबंधन के बारे में।

1. अगेती फूलगोभी की खेती (Early Cauliflower)


दिवाली और सर्दियों के शुरुआती महीनों में फूलगोभी की मांग आसमान छूती है। अगस्त में इसकी अगेती खेती करना सबसे ज्यादा मुनाफे का सौदा है।
• नर्सरी और रोपाई: अगस्त के पहले या दूसरे सप्ताह में इसकी नर्सरी (पौध) तैयार कर लें। जब पौधे 20-25 दिन के हो जाएं, तो उन्हें मुख्य खेत में मेढ़ (Raised Beds) बनाकर रोपें।

उन्नत किस्में: पूसा कतकी, पूसा दीपाली, पंत गोभी-2, या हाइब्रिड किस्में जैसे 'स्नो पर्ल' और 'धवल'।

कमाई का मौका: अक्टूबर के अंत और नवंबर की शुरुआत में अगेती फूलगोभी ₹60 से ₹80 प्रति किलो तक के थोक भाव में बिकती है।

2. अगेती मूली की खेती (Radish - 40 Days Crop)



अगर आप बहुत कम समय में खेत से कमाई शुरू करना चाहते हैं, तो मूली से बेहतर कोई विकल्प नहीं है।

खेती की विधि:
मूली की बुवाई हमेशा मेढ़ (बेड) पर करें। इससे जड़ें लंबी, सफेद और चमकदार बनती हैं, जिससे बाजार में उनका अच्छा दाम मिलता है।
तैयार होने का समय: यह अगस्त महीने की सबसे तेज बढ़ने वाली फसल है, जो बुवाई के मात्र 35 से 45 दिनों के भीतर उखाड़ने के लिए तैयार हो जाती है।
उन्नत किस्में: पूसा चेतकी, काशी हंस, या जापानी व्हाइट।

3. उन्नत टमाटर की खेती (Tomato Cultivation)




टमाटर एक ऐसी नकदी फसल (Cash Crop) है जिसकी मांग साल के 12 महीने बनी रहती है, लेकिन अगस्त की बुवाई आपको बंपर मुनाफा दे सकती है।
• जल निकासी का ध्यान: मानसून के कारण इस मौसम में जलभराव का खतरा रहता है। इसलिए टमाटर के पौधों को हमेशा उठी हुई क्यारियों पर लगाएं और सहारा देने के लिए स्टेकिंग (लकड़ी या बांस से बांधना) का प्रयोग करें।

उन्नत किस्में:  पूसा हाइब्रिड-2, अर्का रक्षक, या अभिलाष।


4. धनिया और पालक की खेती (Leafy Greens)





हरी पत्तेदार सब्जियों की खेती कम लागत में हर हफ्ते कमाई देने वाली फसल है। होम गार्डनर्स और बड़े किसान दोनों ही इसे काफी पसंद करते हैं।
• बाजार की मांग: अगस्त और सितंबर के दौरान बारिश के कारण मंडियों में हरी पत्तेदार सब्जियों की भारी कमी हो जाती है। इस समय धनिया और पालक ₹100 किलो तक का भाव भी छू लेते हैं।
कटाई: पालक बुवाई के 25-30 दिन बाद पहली कटाई के लिए तैयार हो जाता है और आप इसकी 4 से 5 बार तक कटाई कर सकते हैं।


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अगस्त की फसलों के लिए बीज दर (Seed Rate) और खाद प्रबंधन (Fertilizer Management) की तालिका
आपके ब्लॉग रीडर्स के लिए नीचे एक पूरी गाइड टेबल दी गई है। इसे अपने खेत की तैयारी के समय ध्यान में रखें (नोट: खाद की मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से है):




सब्जी का नाम
प्रति एकड़ बीज की मात्रा (Seed Rate)
आवश्यक गोबर की खाद / वर्मीकंपोस्ट
रासायनिक खाद प्रबंधन (NPK - प्रति एकड़)
बुवाई/रोपाई की विधि

1. अगेती फूलगोभी
200 से 250 ग्राम (नर्सरी के लिए)
8-10 टन सड़ी गोबर की खाद
40 किग्रा नाइट्रोजन, 30 किग्रा फास्फोरस, 30 किग्रा पोटाश
पहले नर्सरी तैयार करें, फिर 25 दिन बाद बेड पर रोपाई करें।

2. अगेती मूली
4 से 5 किलोग्राम
5-6 टन गोबर की खाद
25 किग्रा नाइट्रोजन, 20 किग्रा फास्फोरस, 20 किग्रा पोटाश
मेढ़ (बेड विधि) पर सीधी बुवाई करें। लाइन से लाइन की दूरी 30 सेमी रखें।

3. टमाटर
100 से 150 ग्राम (हाइब्रिड बीज)
10 टन गोबर की खाद
50 किग्रा नाइट्रोजन, 40 किग्रा फास्फोरस, 40 किग्रा पोटाश
नर्सरी तैयार करके उठी हुई क्यारियों पर 60×45 सेमी की दूरी पर रोपाई करें।

4. हरी धनिया
6 से 8 किलोग्राम
4-5 टन गोबर की खाद या वर्मीकंपोस्ट
20 किग्रा नाइट्रोजन, 15 किग्रा फास्फोरस
खेत को समतल कर हल्की क्यारियाँ बनाकर छिड़काव या लाइन विधि से बोएं।

5. अगेती पालक
8 से 10 किलोग्राम
5 टन सड़ी गोबर की खाद
25 किग्रा नाइट्रोजन, 15 किग्रा फास्फोरस
खेत में नमी होने पर बीजों को समान रूप से बिखेर कर हल्की मिट्टी से ढक दें।

विशेष नोट: नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा खेत की आखिरी जुताई के समय बेसेंट डोज के रूप में दें। बची हुई नाइट्रोजन की मात्रा फसल की बढ़त के अनुसार टॉप ड्रेसिंग के रूप में दें।)


अगस्त में खेती करते समय 3 सबसे जरूरी सावधानियां

1. जलभराव से बचाव (Water Logging): इस महीने कभी भी भारी बारिश हो सकती है। सब्जियों के खेतों में पानी बिल्कुल नहीं रुकना चाहिए, नहीं तो जड़ गलन (Root Rot) की समस्या हो जाएगी। खेत में जल निकासी (Drainage System) का रास्ता पहले से तैयार रखें।
2.मल्चिंग और ड्रिप इरिगेशन (Mulching): यदि बजट अनुमति दे, तो टमाटर और गोभी जैसी फसलों के लिए प्लास्टिक मल्चिंग पेपर का उपयोग करें। इससे खरपतवार (Weeds) नहीं उगते और बारिश का सीधा पानी जड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाता।कीट और रोग नियंत्रण: इस मौसम में अधिक नमी और गर्मी के कारण कीटों (जैसे सफेद मक्खी, एफिड्स) और फंगस का हमला बढ़ जाता है। बुवाई से पहले बीजों का 
3.बीजोपचार (Seed Treatment) बाविस्टिन या ट्राइकोडेर्मा से जरूर करें।

निष्कर्ष (Conclusion)
अगस्त में की गई सब्जियों की स्मार्ट खेती पारंपरिक फसलों (जैसे धान या बाजरा) की तुलना में 3 से 4 गुना अधिक मुनाफा दे सकती है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि आप उन्नत बीजों का चयन करें, समय पर सही खाद दें और अपने खेतों को जलभराव से बचाएं। आज ही अपने खेत की तैयारी शुरू करें और आने वाले त्योहारी सीजन में अपनी आमदनी को दोगुना करें।


Wednesday, 19 August 2026

धान में कल्ले कैसे बढ़ाएं और रोगों से रक्षा: जानिए बंपर पैदावार के वैज्ञानिक तरीके

 किसान भाइयों, उत्तर भारत में धान की फसल इस समय बहुत ही महत्वपूर्ण अवस्था में है। इस समय यदि फसल की सही देखभाल न की जाए, तो पैदावार में भारी कमी आ सकती है। आज के इस लेख में हम जानेंगे कि धान में कल्ले (Tillers) कैसे बढ़ाएं और फसल को विभिन्न रोगों व कीटों से कैसे बचाएं।

धान में कल्ले बढ़ाने के उपाय


धान की फसल में जितने ज्यादा कल्ले निकलेंगे, बालियां उतनी ही अधिक बनेंगी और पैदावार भी बंपर होगी। कल्ले बढ़ाने के लिए नीचे दिए गए तरीकों को अपनाएं:


• यूरिया की सही मात्रा और टॉप-ड्रेसिंग

धान की रोपाई के 20 से 40 दिनों के भीतर यूरिया का उपयोग बहुत जरूरी है। प्रति एकड़ 30 से 40 किलोग्राम यूरिया का छिड़काव करें।
जिंक सल्फेट के फायदे: यदि पत्तियों का रंग हल्का पीला या भूरा हो रहा है, तो यूरिया के साथ 5 किलोग्राम जिंक सल्फेट (33%) प्रति एकड़ जरूर मिलाएं।

ग्रोथ प्रमोटर का उपयोग: कल्लों की संख्या तेजी से बढ़ाने के लिए आप इफको की सागरिका (Sagarika) या बायोविटा दानेदार की 8 से 10 किलोग्राम मात्रा प्रति एकड़ डाल सकते हैं


धान के प्रमुख रोग और उनका इलाज

अगस्त और सितंबर के महीनों में हवा में नमी होने के कारण धान में बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा होता है।


धान का बाकानी रोग और इसका सटीक इलाज



धान का बाकानी रोग, जिसे किसान भाई 'पैर सड़न रोग' या 'लम्बा होने वाला रोग' भी कहते हैं, एक फंगस के कारण फैलता है। इस रोग में धान के पौधे अचानक सामान्य से बहुत ज्यादा लम्बे और पतले हो जाते हैं, और बाद में पीले पड़कर सूख जाते हैं।


• उपचार: खेत में लक्षण दिखते ही प्रभावित पौधों को जड़ से उखाड़कर नष्ट कर दें। इसके बाद कार्बेन्डाजिम 50% डब्ल्यूपी (Carbendazim 50% WP) की 250 ग्राम मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें।

धान में हल्दी रोग (False Smut) की रोकथाम )


इसे कंडुआ या लक्ष्मी रोग भी कहा जाता है। इसमें धान की बालियों के दानों पर पीले-हरे रंग के पाउडर के गोले बन जाते हैं।
• उपचार: बालियां निकलने (गोभ की अवस्था) से ठीक पहले कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्ल्यूपी की 500 ग्राम मात्रा का प्रति एकड़ स्प्रे करें।


धान में तना छेदक (Stem Borer) कीट का नियंत्रण


यह कीट धान के तने के भीतर घुसकर उसे अंदर से कुतर देता है, जिससे पौधे की मुख्य गोभ सूख जाती है और बालियां सफेद निकलती हैं (जिसे सफेद बाली या डेड हार्ट कहते हैं)।
• उपचार (दानेदार दवा): यदि शुरुआती लक्षण दिखें, तो फर्टेरा (Chlorantraniliprole 0.4% G) की 4 किलोग्राम मात्रा को प्रति एकड़ यूरिया में मिलाकर खेत में डालें।उपचार (स्प्रे दवा): प्रकोप ज्यादा होने पर कोराजन (Chlorantraniliprole 18.5% SC) की 60 मिलीलीटर मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ समान रूप से स्प्रे करें।

निष्कर्ष
किसान भाइयों, धान की फसल में समय पर यूरिया, जिंक और सही कीटनाशकों का प्रयोग करके आप अपनी लागत कम कर सकते हैं और बंपर पैदावार ले सकते हैं। अपने खेतों की नियमित निगरानी करें और बीमारी के लक्षण दिखते ही सही कदम उठाएं।

Tuesday, 18 August 2026

ग्वार में जीवाणु धब्बा रोग (#Bacterial Leaf Spot) - पहचान एवं संपूर्ण प्रबंधन

ग्वार राजस्थान और हरियाणा की एक प्रमुख नकदी फसल है। इसकी खेती गोंद और पशु चारे के लिए की जाती है। पिछले कुछ सालों में ग्वार में जीवाणु धब्बा रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ा है, जिससे किसानों को उपज में 30-40% तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। समय पर पहचान और सही प्रबंधन से इस रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

1. रोग की पहचान

इस रोग को शुरुआती अवस्था में पहचानना सबसे जरूरी है।


प्रारंभिक लक्षण: पत्तियों पर छोटे-छोटे, गोल या अनियमित आकार के पानी भरे धब्बे दिखाई देते हैं। ये धब्बे देखने में गीले जैसे लगते हैं, जैसे पत्ती पर पानी की बूंद लगी हो।




विकसित लक्षण: कुछ दिनों बाद यही धब्बे भूरे रंग के हो जाते हैं। इन धब्बों के बीच का हिस्सा हल्का भूरा या सफेद हो जाता है और किनारा गहरा भूरा रहता है। यही इस रोग की मुख्य पहचान है।



गंभीर अवस्था: धीरे-धीरे कई धब्बे आपस में मिलकर बड़े हो जाते हैं। इससे पत्ती झुलस जाती है, सूखकर नीचे गिर जाती है। पौधे में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया रुक जाती है।




फली पर प्रभाव: यह रोग सिर्फ पत्तियों तक सीमित नहीं है। फलियों पर भी छोटे काले या भूरे धब्बे बनते हैं जो बाद में बड़े और अनियमित आकार के हो जाते हैं। तेज आक्रमण की स्थिति में पौधे की बढ़वार पूरी तरह रुक जाती है, फली और दाना भराव कम हो जाता है और अंत में उपज में भारी कमी आती है।

2. रोग के अनुकूल परिस्थितियाँ

यह जीवाणु कुछ खास मौसम में तेजी से फैलता है:

• अधिक नमी और तापमान: 70-90% आर्द्रता और 25-30°C तापमान इस रोग के लिए सबसे अनुकूल है। • बार-बार बारिश: लगातार वर्षा, ओलावृष्टि या पत्तियों पर लंबे समय तक ओस या नमी बने रहना। • अधिक नाइट्रोजन: खेत में नाइट्रोजन युक्त उर्वरक का जरूरत से ज्यादा प्रयोग। • संक्रमित बीज: पिछले साल के रोगग्रस्त पौधे से लिया गया बीज। • फसल अवशेष: खेत में पड़े पुराने संक्रमित पौधों के अवशेषों से भी रोग अगले साल फैलता है।  3. रोग का कारण और फैलाव

रोग का कारण: यह रोग Xanthomonas citri pv. cyamopsidis नामक जीवाणु के कारण होता है।


रोग कैसे फैलता है: इस जीवाणु का फैलाव बहुत तेजी से होता है। वर्षा की बौछारों के छींटों से, सिंचाई के पानी से, हवा से और कीटों जैसे थ्रिप्स और माहू (Aphid) के माध्यम से यह एक पौधे से दूसरे पौधे तक जाता है। संक्रमित बीज इसके फैलाव का सबसे बड़ा कारण है। इसके अलावा खेत में काम करने वाले उपकरणों और मनुष्यों के कपड़ों के माध्यम से भी यह पूरे खेत में फैल जाता है।

4. एकीकृत प्रबंधन उपाय (IPM)

इस रोग के नियंत्रण के लिए सिर्फ दवा पर निर्भर न रहकर एकीकृत उपाय अपनाने चाहिए।


1. स्वस्थ बीज का उपयोग: हमेशा रोगमुक्त और प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें। अगर आप अपना खुद का बीज रख रहे हैं तो स्वस्थ खेत से ही बीज चुनें।


2. बीजोपचार: बुवाई से पहले बीजोपचार अवश्य करें। स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 100ppm की दर से, यानी 1 ग्राम दवा को 10 लीटर पानी में घोलकर बीज को 30 मिनट तक भिगोएं और फिर छाया में सुखाकर बुवाई करें। इससे बीज के अंदर मौजूद जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।


3. फसल चक्रीकरण: एक ही खेत में लगातार ग्वार की खेती न करें। ग्वार के बाद गेहूं, चना या सरसों जैसी फसलें उगाएं। इससे मिट्टी में मौजूद जीवाणु का जीवन-चक्र टूट जाता है।


4. स्वच्छता उपाय: खेत में दिख रहे संक्रमित पौधों और कटाई के बाद बचे फसल अवशेषों को इकट्ठा करके जला दें या नष्ट कर दें। खेत और खेती के उपकरणों की साफ-सफाई रखें और हमेशा रोगमुक्त क्षेत्र से ही बीज लें।


5. रासायनिक प्रबंधन (आवश्यकतानुसार): जब रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखें तभी छिड़काव शुरू करें।

• पहला विकल्प: कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% WP, 2.5 से 3.0 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से। • दूसरा विकल्प: स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 100ppm, 1 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी।

पहला छिड़काव रोग के लक्षण दिखते ही करें और 10-12 दिन के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करें।  5. अतिरिक्त सावधानियां जो उपज बचाएंगी • संतुलित उर्वरक N:P:K = 20:40:20 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से ही प्रयोग करें, नाइट्रोजन का अंधाधुंध प्रयोग न करें। • खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें, पानी खेत में भरा न रहने दें। • थ्रिप्स और माहू जैसे कीटों का प्रबंधन समय पर करें क्योंकि ये रोग को फैलाते हैं। • वर्षा के बाद फसल की नियमित निगरानी जरूर करें। 

याद रखें - समय पर पहचान और उचित प्रबंधन से ही ग्वार की उपज को सुरक्षित रखा जा सकता है। स्वस्थ बीज, स्वस्थ फसल और अधिक उपज - यही सफल खेती का मंत्र है।



Monday, 17 August 2026

नरमा कपास में सफेद मक्खी का अटैक - अगस्त में बचाव के आसान उपाय

 हनुमानगढ़, सिरसा और गंगानगर बेल्ट में नरमा कपास की फसल अभी फूल और टिंडे बनने की स्टेज पर है। इस समय दो सबसे बड़ी दिक्कत आती है - सफेद मक्खी और गुलाबी सुंडी।


1. सफेद मक्खी की पहचान:

पत्ते के नीचे छोटे सफेद कीड़े दिखेंगे, पत्ता काला और चिपचिपा होने लगता है।


बचाव: खेत में ज्यादा पानी न रोकें, नीम के तेल 1 लीटर प्रति एकड़ का छिड़काव शाम को करें। ज्यादा प्रकोप पर कृषि अधिकारी से सलाह लेकर दवाई लें।



2. गुलाबी सुंडी:

टिंडा अंदर से खराब और फूल झड़ने लगते हैं।


बचाव: खेत के आसपास बिखरे हुए टिंडे और फूल इकट्ठा करके नष्ट कर दें। फेरोमोन ट्रैप लगाना बहुत फायदेमंद है।


खाद-पानी: इस समय यूरिया ज्यादा न डालें, पोटाश की हल्की मात्रा टिंडे को मजबूत बनाती है।


किसान भाइयों, अपने खेत की फोटो और समस्या कमेंट में बताइए, मैं अगली पोस्ट में उसका हल बताऊंगा।

Tuesday, 5 June 2018

लहसुन की खेती


लहसुन की खेती (farming of garlic)


https://smartkhet.blogspot.com/2018/06/farming-of-garlic.html


लहसुन (Garlic) का वैज्ञानिक नाम एलियम सैटिवुम एल है। लहसुन में रासायनिक तौर पर गंधक की अधिकता होती है। इसे पीसने पर ऐलिसिन नामक यौगिक प्राप्त होता है जो प्रतिजैविक विशेषताओं से भरा होता है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, एन्ज़ाइम तथा विटामिन बी, सैपोनिन, फ्लैवोनॉइड आदि पदार्थ पाये जाते हैं।

भूमि तथा जलवायु:

लहसुन की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है लेकिन इसके लिये प्रचुर जीवांश और अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी सर्वोतम है। लहसुन की वृद्धि के लिये तुलनात्मक दृष्टि से ठंडा व नम जलवायु उपयुक्त रहता है। गर्म व बड़े दिन पौधे की वृद्धि पर विपरित प्रभाव डालते हैं। परन्तु कंद बनने क लिये लंबे व शुष्क दिन फायदेमंद हैं। परन्तु कंदों के बनने के बाद यदि तापमान कम हो जाये तो कंदों का विकास और अधिक अच्छा होगा, एवं कन्दों के विकास के लिये अधिक समय उपलब्ध होगा, अत: उनका विकास अच्छा होगा तथा उपज बढ़ेगी।

खेत की तैयारी :

लहसुन की जड़ें भूमि की ऊपरी सतह से करीब 15 सेमी गहराई तक ही सीमित रहती है अत: भूमि की अधिक गहरी जुताई की आवश्यकता नहीं है, इसलिये दो जुताई करके, हेरो चलाकर भूमि को भुरभुरा करके खरपतवार निकालकर, समतल कर देना चाहिए। जुताई के समय भूमि में उपयुक्त मात्रा में नमी आवश्यक है अन्यथा पलेवा देकर जुताई करें।

उन्नत किस्में:

लाडवा, मलेवा, एग्रीफांउड व्हाइट, आर जी एल-1, यमुना सफेद-3 एवं गारलिक 56-4 नामक किस्में अच्छी पैदावार देती है। लहसुन का चूर्ण बनाने के लिये बड़े आकार की लौंग वाली गुजरात की जामनगर व राजकोट किस्मों को उपयुक्त माना गया है।

खाद एवं उर्वरक:

खेत की तैयारी के समय 20-25 टन प्रति हेक्टर गोबर खाद खेत में मिला देनी चाहिये क्योंकि जैविक खाद का लहसुन की उपज पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा 50 किलो नत्रजन, 60 किलो फॉस्फोरस व 100 किलो पोटाश प्रति हेक्टर बुवाई के समय दें व 50 किलो नत्रजन बुवाई के 30 दिन बाद दें।

बीज व बुवाई:

लहसुन की बुवाई के लिये अच्छी किस्म के स्वस्थ बड़े आकार के आकर्षक कंदों की कलियों को अलग-अलग करके बुवाई के काम में लें। बुवाई हेतु प्रति हेक्टर 500 किलो कलियों की आवश्यकता होती है। इसकी बुवाई (रोपाई) कतारों में 15 से.मी. की दूरी पर करें व पौधे से पौधे की दूरी 7-8 से.मी. एवं गहराई 5 से.मी. ही रखें। इसकी बुवाई का उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक का है। भूमि का तापमान 300 से ज्यादा होने पर कलियों में सडऩ उत्पन्न हो सकती है।

सिंचाई एवं निराई गुड़ाई:

लहसुन की कलियों की बुवाई के बाद एक हल्की सिंचाई करनी चाहिये इसके पश्चात वानस्पतिक वृद्धि व कंद बनते समय 7-8 दिन के अन्तराल से व फसल के पकने की अवस्था में करीब 12 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें। सिंचाई के लिये क्यारी ज्यादा बड़ी नहीं बनावें। पकने पर पत्तियां सूखने लगे तब सिंचाई बंद कर देंं। जिस क्षेत्र में पानी भरता हो उसमें पैदा हुये कंद अधिक समय तक संग्रह नहीं किये जा सकते। खरपतवार नष्ट करने के लिये निराई गुडाई आवश्यक है। गुड़ाई गहरी नहीं करें। इस फसल में निराई गुड़ाई अन्य फसलों की तुलना में कठिन है क्योंकि पौधे पास-पास में होते हैं। अत: खरपतवार नाशी रसायनों का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिये अंकुरण के पूर्व प्रति हैक्टर 150 ग्राम आक्सीफ्लूरफेन (600 ग्राम गोल) अथवा पेंडिमिथालिन 1 किलो सक्रिय तत्व (3.3 लीटर स्टॉम्प) का पानी में घोल बनाकर छिड़कावव अंकुरण पश्चात ऑक्साडायाजोन 1 किलो प्रति हेक्टर का पानी में घोल बनाकर छिड़का व करें या 25 से 30 दिन पर एक गुड़ाई करें।
लहसुन के पकाव की पहचान पत्तियाँ पीली पडऩे लगे (फसल बुवाई के 4-5 माह बाद), कंद दबाने से नहीं दबे एवं कंद में 80 प्रतिशत कलियां बनी हुई दिखाई पड़े तब समझें लहसुन पक गया है। कुछ कंद जमीन से निकालकर 2-3 दिन छाया में रखें अगर वह नीला पड़ जाय तो समझेंअभी वह नहीं पका है, दो-चार दिन खेत में लहसुन खड़ा रहने देें।

खुदाई एवं उपज :

लहसुन खुदाई के वक्त भूमि में थोड़ी नमी रहनी चाहिये जिससे कंद आसानीसे बिना क्षति पहुंचाये निकाले जा सकें। कंदों को पत्तियों सहित निकालने के तुरन्त बाद कंद पर लगी मिट्टी उतार दें तथा छोटे-छोटे बंडल बनावें एवं छाया में सुखा देना चाहिये तथा सूखी पत्तियाँ अलग कर देनी चाहिये। यदि फर्श पर सुखाना पड़े तो कंदों कोसमय-समय पर पलटना चाहिये।
यदि कंदों को उनकी पत्तियों द्वारा गुच्छों में बांध कर किन्हीं अवलंबों पर लटका कर सुखाया जाय तो उत्तम रहेगा। इससे लगभग 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

Wednesday, 3 January 2018

मक्का की खेती

मक्का की खेती (Maize cultivation)


https://smartkhet.blogspot.com/2018/01/Maize-cultivation.html



मक्का खरीफ ऋतु की फसल है, परन्तु जहां सिचाई के साधन हैं वहां रबी और खरीफ की अगेती फसल के रूप मे मक्का की खेती की जा सकती है। लगभग 65 प्रतिशत मक्का का उपयोग मुर्गी एवं पशु आहार के रूप मे किया जाता है। साथ ही साथ इससे पौष्टिक रूचिकर चारा प्राप्त होता है। भुट्टे काटने के बाद बची हुई कडवी पशुओं को चारे के रूप मे खिलाते हैं। औद्योगिक दृष्टि से मक्का मे प्रोटिनेक्स, चॉक्लेट पेन्ट्स स्याही लोशन स्टार्च कोका-कोला के लिए कॉर्न सिरप आदि बनने लगा है। बेबीकार्न मक्का से प्राप्त होने वाले बिना परागित भुट्टों को ही कहा जाता है। बेबीकार्न का पौष्टिक मूल्य अन्य सब्जियों से अधिक है।

जलवायु एवं भूमि:-

मक्का उष्ण एवं आर्द जलवायु की फसल है। इसके लिए ऐसी भूमि जहां पानी का निकास अच्छा हो उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी:-

खेत की तैयारी के लिए पहला पानी गिरने के बाद जून माह मे हेरो करने के बाद पाटा चला देना चाहिए। यदि गोबर के खाद का प्रयोग करना हो तो पूर्ण रूप से सड़ी हुई खाद अन्तिम जुताई के समय जमीन मे मिला दें। रबी के मौसम मे कल्टीवेटर से दो बार जुताई करने के उपरांत दो बार हैरो करना चाहिए।

मक्का बुवाई का समय:-

1. खरीफ :- जून से जुलाई तक।
2. रबी :- अक्टूबर से नवम्बर तक।
3. जायद :- फरवरी से मार्च तक।

मक्का की किस्म :-
क्र.
संकर किस्म

अवधि (दिन मे)

उत्पादन (क्ंवि/हे.)

1

गंगा-5

100-105

50-80

2

डेक्कन-101

105-115

60-65

3

गंगा सफेद-2

105-110

50-55

4

गंगा-11

100-105

60-70

5

डेक्कन-103

110-115

60-65

 कम्पोजिट जातियां :-

सामान्य अवधि वाली- चंदन मक्का-1
जल्दी पकने वाली- चंदन मक्का-3
अत्यंत जल्दी पकने वाली- चंदन सफेद मक्का-2

बीज की मात्रा :-

संकर जातियां :- 12 से 15 किलो/हे.
कम्पोजिट जातियां :- 15 से 20 किलो/हे.
हरे चारे के लिए :- 40 से 45 किलो/हे.
     (छोटे या बड़े दानो के अनुसार भी बीज की मात्रा कम या अधिक होती है।) 

बीजोपचार :-

बीज को बोने से पूर्व किसी फंफूदनाशक दवा जैसे थायरम या एग्रोसेन जी.एन. 2.5-3 ग्रा./कि. बीज का दर से उपचारीत करके बोना चाहिए। एजोस्पाइरिलम या पी.एस.बी.कल्चर 5-10 ग्राम प्रति किलो बीज का उपचार करें।

मक्का पौध अंतरण :-

शीघ्र पकने वाली:- कतार से कतार-60 से.मी. पौधे से पौधे-20 से.मी.
मध्यम/देरी से पकने वाली :- कतार से कतार-75 से.मी. पौधे से पौधे-25 से.मी.
हरे चारे के लिए :- कतार से कतार:- 40 से.मी. पौधे से पौधे-25 से.मी.

मक्का बुवाई का तरीका :-

वर्षा प्रारंभ होने पर मक्का बोना चाहिए। सिंचाई का साधन हो तो 10 से 15 दिन पूर्व ही बोनी करनी चाहिये इससे पैदावार मे वृध्दि होती है। बीज की बुवाई मेंड़ के किनारे व उपर 3-5 से.मी. की गहराई पर करनी चाहिए। बुवाई के एक माह पश्चात मिट्टी चढ़ाने का कार्य करना चाहिए। बुवाई किसी भी विधी से की जाय परन्तु खेत मे पौधों की संख्या 55-80 हजार/हेक्टेयर रखना चाहिए। 

खाद एवं उर्वरक की मात्रा :-

शीघ्र पकने वाली :- 80 : 50 : 30 (N:P:K)
मध्यम पकने वाली :- 120 : 60 : 40 (N:P:K)
देरी से पकने वाली :- 120 : 75 : 50 (N:P:K)
 भूमि की तैयारी करते समय 5 से 8 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद खेत मे मिलाना चाहिए तथा भूमि परीक्षण उपरांत जहां जस्ते की कमी हो वहां 25 कि.ग्रा./हे जिंक सल्फेट वर्षा से पूर्व डालना चाहिए। 

खाद एवं उर्वरक देने की विधी :-

1. नत्रजन :-

1/3 मात्रा बुवाई के समय, (आधार खाद के रूप मे)
1/3 मात्रा लगभग एक माह बाद, (साइड ड्रेसिंग के रूप में)
1/3 मात्रा नरपुष्प (मंझरी) आने से पहले

2. फास्फोरस व पोटाश :-

इनकी पुरी मात्रा बुवाई के समय बीज से 5 से.मी. नीचे डालना चाहिए। चुकी मिट्टी मे इनकी गतिशीलता कम होती है, अत: इनका निवेशन ऐसी जगह पर करना आवश्यक होता है जहां पौधो की जड़ें हो। 

मक्का में निराई-गुड़ाई :-

बोने के 15-20 दिन बाद डोरा चलाकर निंदाई-गुड़ाई करनी चाहिए या रासायनिक निंदानाशक मे एट्राजीन नामक निंदानाशक का प्रयोग करना चाहिए। एट्राजीन का उपयोग हेतु अंकुरण पूर्व 600-800 ग्रा./एकड़ की दर से छिड़काव करें। इसके उपरांत लगभग 25-30 दिन बाद मिट्टी चढावें।

मक्का की अन्तरवर्ती फसलें :-

मक्का के मुख्य फसल के बीच निम्नानुसार अन्तरवर्ती फसलें लीं जा सकती है :-
मक्का           :                उड़द, बरबटी, ग्वार, मूंग (दलहन)
मक्का           :                सोयाबीन, तिल (तिलहन)
मक्का           :                सेम, भिण्डी, हरा धनिया (सब्जी)
मक्का           :                बरबटी, ग्वार (चारा)

सिंचाई :-

मक्का के फसल को पुरे फसल अवधि मे लगभग 400-600 mm पानी की आवश्यकता होती है तथा इसकी सिंचाई की महत्वपूर्ण अवस्था (Critical stages of irrigation) पुष्पन और दाने भरने का समय (Silking and cob development) है। इसके अलावा खेत मे पानी का निकासी भी अतिआवश्यक है। 

पौध संरक्षण :-

(क) कीट प्रबन्धन :

1. मक्का का धब्बेदार तनाबेधक कीट :-
     इस कीट की इल्ली पौधे की जड़ को छोड़कर समस्त भागों को प्रभावित करती है। सर्वप्रथम इल्ली तने को छेद करती है तथा प्रभावित पौधे की पत्ती एवं दानों को भी नुकसान करती है। इसके नुकसान से पौधा बौना हो जाता है एवं प्रभावित पौधों में दाने नहीं बनते है। प्रारंभिक अवस्था में डैड हार्ट (सूखा तना) बनता है एवं इसे पौधे के निचले स्थान के दुर्गध से पहचाना जा सकता है।
2. गुलाबी तनाबेधक कीट :-
     इस कीट की इल्ली तने के मध्य भाग को नुकसान पहुंचाती है फलस्वरूप मध्य तने से डैड हार्ट का निर्माण होता है जिस पर दाने नहीं आते है।
उक्त कीट प्रबंधन हेतु निम्न उपाय है :-
फसल कटाई के समय खेत में गहरी जुताई करनी चाहिये जिससे पौधे के अवशेष व 
कीट के प्यूपा अवस्था नष्ट हो जाये।
मक्का की कीट प्रतिरोधी प्रजाति का उपयोग करना चाहिए।
मक्का की बुआई मानसुन की पहली बारिश के बाद करना चाहिए।
एक ही कीटनाशक का उपयोग बार-बार नहीं करना चाहिए।
प्रकाश प्रपंच का उपयोग सायं 6.30 बजे से रात्रि 10.30 बजे तक करना चाहिए।
मक्का फसल के बाद ऐसी फसल लगानी चाहिए जिसमें कीटव्याधि मक्का की फसल से भिन्न हो।
जिन खेतों पर तना मक्खी, सफेद भृंग, दीमक एवं कटुवा इल्ली का प्रकोप प्रत्येक वर्ष दिखता है, वहाँ दानेदार दवा फोरेट 10 जी. को 10 कि.ग्रा./हे. की दर से बुवाई के समय बीज के नीचे डालें।
तनाछेदक के नियंत्रण के लिये अंकुरण के 15 दिनों बाद फसल पर क्विनालफास 25 ई.सी. का 800 मि.ली./हे. अथवा कार्बोरिल 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. का 1.2 कि.ग्रा./हे. की दर से छिड़काव करना चाहिए। इसके 15 दिनों बाद 8 कि.ग्रा. क्विनालफास 5 जी. अथवा फोरेट 10 जी. को 12 कि.ग्रा. रेत में मिलाकर एक हेक्टेयर खेत में पत्तों के गुच्छों में डालें।

(ख) मक्का के प्रमुख रोग :-

1. डाउनी मिल्डयू :- 
        बोने के 2-3 सप्ताह पश्चात यह रोग लगता है सर्वप्रथम पर्णहरिम का ह्रास होने से पत्तियों पर धारियां पड़ जाती है, प्रभावित हिस्से सफेद रूई जैसे नजर आने लगते है, पौधे की बढ़वार रूक जाती है।
उपचार :-  
        डायथेन एम-45 दवा आवश्यक पानी में घोलकर 3-4 छिड़काव करना चाहिए।
2. पत्तियों का झुलसा रोग :- 
        पत्तियों पर लम्बे नाव के आकार के भूरे धब्बे बनते हैं। रोग नीचे की पत्तियों से बढ़कर ऊपर की पत्तियों पर फैलता हैं। नीचे की पत्तियां रोग द्वारा पूरी तरह सूख जाती है।
उपचार :-
        रोग के लक्षण दिखते ही जिनेब का 0.12% के घोल का छिड़काव करना चाहिए।
3. तना सड़न :-
        पौधों की निचली गांठ से रोग संक्रमण प्रारंभ होता हैं तथा विगलन की स्थिति निर्मित होती हैं एवं पौधे के सड़े भाग से गंध आने लगती है। पौधों की पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं व पौधे कमजोर होकर गिर जाते है।
उपचार :-
        150 ग्रा. केप्टान को 100 ली. पानी मे घोलकर जड़ों पर डालना चाहिये।

मक्का की उपज :-

1. शीघ्र पकने वाली :- 50-60 क्ंविटल/हेक्टेयर
2. मध्यम पकने वाली :- 60-65 क्ंविटल/हेक्टेयर
3. देरी से पकने वाली :- 65-70 क्ंविटल/हेक्टेयर

फसल की कटाई व गहाई :-

फसल अवधि पूर्ण होने के पश्चात अर्थात् चारे वाली फसल बोने के 60-65 दिन बाद, दाने वाली देशी किस्म बोने के 75-85 दिन बाद, व संकर एवं संकुल किस्म बोने के 90-115 दिन बाद तथा दाने मे लगभग 25 प्रतिशत् तक नमी हाने पर कटाई करनी चाहिए।
कटाई के बाद मक्का फसल में सबसे महत्वपूर्ण कार्य गहाई है इसमें दाने निकालने के लिये सेलर का उपयोग किया जाता है। सेलर नहीं होने की अवस्था में साधारण थ्रेशर में सुधार कर मक्का की गहाई की जा सकती है इसमें मक्के के भुट्टे के छिलके निकालने की आवश्यकता नहीं है। सीधे भुट्टे सुखे होने पर थ्रेशर में डालकर गहाई की जा सकती है साथ ही दाने का कटाव भी नहीं होता।

भण्डारण :-

कटाई व गहाई के पश्चात प्राप्त दानों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर भण्डारित करना चाहिए। यदि दानों का उपयोग बीज के लिये करना हो तो इन्हें इतना सुखा लें कि आर्द्रता करीब 12 प्रतिशत रहे। खाने के लिये दानों को बॉस से बने बण्डों में या टीन से बने ड्रमों में रखना चाहिए तथा 3 ग्राम वाली एक क्विकफास की गोली प्रति क्विंटल दानों के हिसाब से ड्रम या बण्डों में रखें। रखते समय क्विकफास की गोली को किसी पतले कपडे में बॉधकर दानों के अन्दर डालें या एक ई.डी.बी. इंजेक्शन प्रति क्विंटल दानों के हिसाब से डालें। इंजेक्शन को चिमटी की सहायता से ड्रम में या बण्डों में आधी गहराई तक ले जाकर छोड़ दें और ढक्कन बन्द कर दें।

Tuesday, 2 January 2018

तरबूज की खेती

तरबूज की खेती (farming of watermelon)


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भूमि एवं जलवायु-

तरबूज की खेती कई तरह की मिट्टी में की जाती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त रहती है। खेत तैयार करने के लिए पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और बाद की जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करते हैं। खेत को समतल कर ले तो पूरे खेत में पानी की खपत एक समान रहेगी। अगर खेत नदियों के किनारे है तो नालियों और थालों को पानी की उपलब्धता के हिसाब से बनवाए। इन नालियों और थालों में सड़ी हुई गोबर की खाद और मिट्टी के मिश्रण से भर देते हैं। गर्म एवं औसत आद्र्रता वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए सबसे अच्छे रहते हैं। बीज के जमाव व पौधें के बढ़वार के लिए 25-32 सेन्टीग्रेड तापक्रम उपयुक्त होता है।

किस्म-

शुगर बेबी-

इसकी बेलें औसत लम्बाई की होती हैं और फलों का औसत वजन दो से पांच किलोग्राम तक होता है। फल का ऊपरी छिलका गहरे हरे रंग और उन पर धूमिल सी धारियां होती हैं। फल का आकार गोल तथा गूदे का रंग गहरा लाल होता है। यह शीघ्र पकने वाली प्रजाति है। औसत पैदावार 200-300 कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म लगभग 85 दिन पककर तैयार हो जाती है।

दुर्गापुर केसर-

यह देर से पकने वाली किस्म है, तना तीन मीटर लम्बा, फलों का औसत वजन छह से आठ किलोग्राम, गूदे का रंग पीला तथा छिलका हरे रंग व धारीदार होता है। इसकी औसत उपज 350-450 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है।

अर्का मानिक-

इस किस्म के फल गोल, अण्डाकार व छिलका हरा जिस पर गहरी हरी धारियां होती हैं तथा गुलाबी रंग का होता है। औसत फल वजन छह किलोग्राम होता है। इसकी भण्डारण एवं परिवहन क्षमता अच्छी है। औसत उपज 500 कुन्तल प्रति हेक्टेयर 110-115 दिन में प्राप्त की जा सकती है।

दुर्गापुर मीठा-

इस किस्म का फल गोल हल्का हरा होता है। फल का औसत वजन आठ से नौ किलोग्राम तथा इसकी औसत उपज 400-500 कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है। यह लगभग 125 दिन में तैयार हो जाती है।

खाद एवं उर्वरक-

कम्पोस्ट या सड़ी गोबर की खाद दो किलोग्राम प्रत्येक नाली या थाले में डालते हैं। इसके अतिरिक्त 50 किलोग्राम यूरिया, 47 किलोग्राम डीएपी तथा 67 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति एकड़ की दर से देना। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा खेत में नालियां या थाले बनाते समय देते हैं। नत्रजन की आधी मात्रा को दो बराबर भागों में बांट कर खड़ी फसल में जड़ों से 30-40 सेमी दूर गुड़ाई के समय तथा फिर 45 दिन बाद देना चाहिए।

बुआई का समय-

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में तरबूज की बुआई फरवरी से अप्रैल के बीच एवं नदियों के किनारे इसकी बुआई नवम्बर से जनवरी के बीच में की जाती है।

बीज की मात्रा-

एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 25.4 किलोग्राम पर्याप्त होता है।

बुआई की विधि-

तरबूज की बुआई के लिए 2.5 से 3.0 मीटर की दूरी पर 40 से 50 सेमी चौड़ी नाली बना लेते है। इन नालियों के दोनों किनारों पर 60 सेमी की दूरी पर बीज बोते हैं। यह दूरी मृदा की उर्वरता एवं प्रजाति के अनुसार घट बढ़ सकती है। नदियों के किनारे 60 गुणा 60 गुणा 60 सेमी क्षेत्रफल वाले गड्ढïे बनाकर उसमें 1:1:1 के अनुपात में मिट्टी, गोबर की खाद तथा बालू का मिश्रण भर कर थालें को भर देते है उसके बाद प्रत्येक थाले में तीन से चार बीज लगते है।

सिंचाई-

यदि तरबूज की खेती नदियों के कछारों में की जाती है तो सिंचाई की कम आवश्यकता नहीं पड़ती है। जब मैदानी भागों में इसकी खेती की जाती है, तो सिंचाई 7 से 10 दिन के अन्तराल पर करते हैं। जब तरबूज आकार में पूरी तरह से बढ़ जाते हैं तो सिंचाई बन्द कर देते हैं जिससे फल में मिठास हो जाती है और फल नहीं फटते हैं।

खरपतवार नियंत्रण एवं निराई-गुड़ाई -


तरबूज के जमाव से लेकर प्रथम 30-35 दिनों तक निराई गुड़ाई करके खरपतवार को निकाल देते हैं। इससे फसल की वृद्वि अच्छी होती है तथा पौधे की बढ़वार रुक जाती है। रासायनिक खरपतवारनाशी के रुप में बूटाक्लोर रसायन 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज बुआई के तुरन्त बाद छिड़काव करते हैं।

अंगूर की खेती

अंगूर की खेती (farming of grapes)


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भारत में अंगूर की खेती अनूठी है क्योंकि यह, उष्ण शीतोष्ण,सभी प्रकार की जलवायु में पैदा किया जा सकता है। हालांकि अंगूर की अधिकांशतः व्यावसायिक 
खेती (85प्रतिशत क्षेत्र में) उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्रों में 
(महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु) तथा उपोष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं। अतः उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश तथा दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिससे जून माह में भी अंगूर मिलते हैं।

उपयोग-

अंगूर एक स्वादिष्ट फल है. भारत में अंगूर अधिकतर ताजा ही खाया जाता है वैसे अंगूर के कई उपयोग हैं. इससे किशमिश, रस एवं मदिरा भी बनाई जाती है.

मिट्टी एवं जलवायु-

अंगूर की जड़ की संरचना काफी मजबूत होती है. अतः यह कंकरीली,रेतीली से चिकनी तथा उथली से लेकर गहरी मिट्टियों में सफलतापूर्वक पनपता है लेकिन रेतीली, दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास अच्छा हो अंगूर की खेती के लिए उचित पाई गयी है. अधिक चिकनी मिट्टी में इसकी खेती न करे तो बेहतर है. अंगूर लवणता के प्रति कुछ हद तक सहिष्णु है. जलवायु का फल के विकास तथा पके हुए अंगूर की बनावट और गुणों पर काफी असर पड़ता है. इसकी खेती के लिए गर्म, शुष्क, तथा दीर्घ ग्रीष्म ऋतू अनुकूल रहती है. अंगूर के पकते समय वर्षा या बादल का होना बहुत ही हानिकारक है. इससे दाने फट जाते हैं और फलों की गुणवत्ता पर बहुत बुरा असर पड़ता है. अतः उत्तर भारत में शीघ्र पकने वाली किस्मों की सिफारिश की जाती है.

किस्में-

उत्तर भारत में लगाई जाने वाली कुछ किस्मों की विशेषताएं नीचे दी जा रही हैं.
1-परलेट
2-ब्यूटी सीडलेस
3-पूसा सीडलेस
4-पूसा नवरंग

प्रवर्धन-

अंगूर का प्रवर्धन मुख्यतः कटिंग कलम द्वारा होता है. जनवरी माह में काट छाँट से निकली टहनियों से कलमे ली जाती हैं. कलमे सदैव स्वस्थ एवं परिपक्व टहनियों से लिए जाने चाहिए. सामान्यतः 4 - 6 गांठों वाली 23 - 45 से.मी. लम्बी कलमें ली जाती हैं.कलम बनाते समय यह ध्यान रखें कि कलम का निचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए एवं ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए. इन कलमों को अच्छी प्रकार से तैयार की गयी तथा सतह से ऊँची क्यारियों में लगा देते हैं. एक वर्ष पुरानी जड़युक्त कलमों को जनवरी माह में नर्सरी से निकल कर खेत में रोपित कर देते हैं.

बेलों की रोपाई-

रोपाई से पूर्व मिट्टी की जाँच अवश्य करवा लें. खेत को भलीभांति तैयार कर लें. बेल की बीच की दुरी किस्म विशेष एवं साधने की पद्धति पर निर्भर करती है. इन सभी चीजों को ध्यान में रख कर 90 x 90 से.मी. आकर के गड्ढे खोदने के बाद उन्हें 1/2 भाग मिट्टी, 1/2 भाग गोबर की सड़ी हुई खाद एवं 30 ग्राम क्लोरिपाईरीफास, 1 कि.ग्रा. सुपर फास्फेट व 500 ग्राम पोटेशीयम सल्फेट आदि को अच्छी तरह मिलाकर भर दें. जनवरी माह में इन गड्ढों में 1 साल पुरानी जड़वाली कलमों को लगा दें. बेल लगाने के तुंरत बाद पानी आवश्यक है.

बेलों की छंटाई-

अंगूर की बेल साधने हेतु पण्डाल, बाबर, टेलीफोन, निफिन एवं हैड आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं. लेकिन व्यवसायिक इतर पर पण्डाल पद्धति ही अधिक उपयोगी सिद्ध हुयी है. पण्डाल पद्धति द्वारा बेलों को साधने हेतु 2.1 - 2.5 मीटर ऊँचाई पर कंक्रीट के खंभों के सहारे लगी तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है. जाल तक पहुँचने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है. तारों के जाल पर पहुँचने पर ताने को काट दिया जाता है ताकि पार्श्व शाखाएँ उग आयें.उगी हुई प्राथमिक शाखाओं पर सभी दिशाओं में 60 सेमी दूसरी पार्श्व शाखाओं के रूप में विकसित किया जाता है. इस तरह द्वितीयक शाखाओं से 8 - 10 तृतीयक शाखाएँ विकसित होंगी इन्ही शाखाओं पर फल लगते हैं.

छंटाई-

बेलों से लगातार एवं अच्छी फसल लेने के लिए उनकी उचित समय पर काट - छाँट अति आवश्यक है. छंटाई कब करें : जब बेल सुसुप्त अवस्था में हो तो छंटाई की जा सकती है, परन्तु कोंपले फूटने से पहले प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए. सामान्यतः काट - छांट जनवरी माह में की जाती है.

सिंचाई-

नवम्बर से दिसम्बर माह तक सिंचाई की खास आवश्यकता नहीं होती क्योंकि बेल सुसुप्ता अवस्था में होती है लेकिन छंटाई के बाद सिंचाई आवश्यक होती है. फूल आने तथा पूरा फल बनने (मार्च से मई ) तक पानी की आवश्यकता होती है. क्योंकि इस दौरान पानी की कमी से उत्पादन एवं हुन्वात्ता दोनों पर बुरा असर पड़ता है. इस दौरान तापमान तथा पर्यावरण स्थितियों को ध्यान में रखते हुए 7 - 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए नहीं तो फल फट एवं सड़ सकते हैं. फलों की तुडाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक-

अंगूर की बेल भूमि से काफी मात्र में पोषक तत्वों को ग्रहण करती है. अतः मिट्टी कि उर्वरता बनाये रखने के लिए एवं लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली फसल लेने के लिए यह आवश्यक है की खाद और उर्वरकों द्वारा पोषक तत्वों की पूर्ति की जाये. पण्डाल पद्धति से साधी गई एवं 3 x 3 मी. की दुरी पर लगाई गयी अंगूर की 5 वर्ष की बेल में लगभग 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश, 700 ग्राम पोटेशियम सल्फेट एवं 50 - 60 कि.ग्रा. गोबर की खाद की आवश्यकता होती है.

खाद देने का समय-

छंटाई के तुंरत बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में नाइट्रोजन एवं पोटाश की आधी मात्र एवं फास्फोरस की सारी मात्र दाल देनी चाहिए. शेष मात्र फल लगने के बाद दें. खाद एवं उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुंरत सिंचाई करें. खाद को मुख्य तने से दूर १५-२० सेमी गहराई पर डालें.

कैसे करें फल गुणवत्ता में सुधार-

अच्छी किस्म के खाने वाले अंगूर के गुच्छे मध्यम आकर, मध्यम से बड़े आकर के बीजरहित दाने, विशिष्ट रंग, खुशबू, स्वाद व बनावट वाले होने चाहिए. ये विशेषताएं सामान्यतः किस्म विशेष पर निर्भर करती हैं. परन्तु निम्नलिखित विधियों द्वारा भी अंगूर की गुणवत्ता में अपेक्षा से अधिक सुधार किया जा सकता है.

फसल निर्धारण-

फसल निर्धारण के छंटाई सर्वाधिक सस्ता एवं सरल साधन है. अधिक फल, गुणवत्ता एवं पकने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव छोड़ते हैं. अतः बेहतर हो यदि बाबर पद्धति साधित बेलों पर 60 - 70 एवं हैड पद्धति पर साधित बेलों पर 12 - 15 गुच्छे छोड़े जाएं. अतः फल लगने के तुंरत बाद संख्या से अधिक गुच्छों को निकाल दें.

छल्ला विधि-

इस तकनीक में बेल के किसी भाग, शाखा, लता, उपशाखा या तना से 0.5 से.मी. चौडाई की छाल छल्ले के रूप में उतार ली जाती है. छाल कब उतारी जाये यह उद्देश्य पर निर्भर करता है. अधिक फल लेने के लिए फूल खिलने के एक सप्ताह पूर्व, फल के आकर में सुधार लाने के लिए फल लगने के तुंरत बाद और बेहतर आकर्षक रंग के लिए फल पकना शुरू होने के समय छाल उतारनी चाहिए. आमतौर पर छाल मुख्य तने पर 0.5 से.मी चौडी फल लगते ही तुंरत उतारनी चाहिए.

वृद्धि नियंत्रकों का उपयोग-

बीज रहित किस्मों में जिब्बरेलिक एसिड का प्रयोग करने से दानो का आकर दो गुना होता है. पूसा सीडलेस किस्म में पुरे फूल आने पर 45 पी.पी.एम. 450 मि.ग्रा. प्रति 10 ली. पानी में, ब्यूटी सीडलेस मने आधा फूल खिलने पर 45 पी.पी.एम. एवं परलेट किस्म में भी आधे फूल खिलने पर 30 पी.पी.एम का प्रयोग करना चाहिए. जिब्बरेलिक एसिड के घोल का या तो छिडकाव किया जाता है या फिर गुच्छों को आधे मिनट तक इस घोल में डुबाया जाता है. यदि गुच्छों को 500 पी.पी.एम 5 मिली. प्रति 10 लीटर पानी में इथेफ़ोन में डुबाया जाये तो फलों में अम्लता की कमी आती है. फल जल्दी पकते हैं एवं रंगीन किस्मों में दानों पर रंग में सुधार आता है. यदि जनवरी के प्रारंभ में डोरमैक्स 3 का छिडकाव कर दिया जाये तो अंगूर 1 - 2 सप्ताह जल्दी पक सकते हैं.

फल तुड़ाई एवं उत्पादन-

अंगूर तोड़ने के पश्चात् पकते नहीं हैं, अतः जब खाने योग्य हो जाये अथवा बाजार में बेचना हो तो उसी समय तोड़ना चाहिए. शर्करा में वृद्धि एवं तथा अम्लता में कमी होना फल पकने के लक्षण हैं. फलों की तुडाई प्रातः काल या सायंकाल में करनी चाहिए. उचित कीमत लेने के लिए गुच्छों का वर्गीकरण करें. पैकिंग के पूर्व गुच्छों से टूटे एवं गले सड़े दानों को निकाल दें. अंगूर के अच्छे रख - रखाव वाले बाग़ से तीन वर्ष पश्चात् फल मिलना शुरू हो जाते हैं और 2 - 3 दशक तक फल प्राप्त किये जा सकते हैं. परलेट किस्म के 14 - 15 साल के बगीचे से 30 - 35 टन एवं पूसा सीडलेस से 15 - 20 टन प्रति हैक्टेयर फल लिया जा सकता है.