Monday, 2 October 2017

वैज्ञानिक विधि से भिंडी की खेती कैसे करें

वैज्ञानिक विधि से भिंडी की खेती कैसे करें (How to grow ladyfinger by scientific method)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/farming-of-bhindi.html         , Bhindi (ladyfinger) plant photos



भिंडी एक महत्वपूर्ण फल वाली उष्ण भागों और शीतोष्ण प्रदेश्‍ो के गर्म स्‍थानों पर उगाया जाने वाली सब्जि है। इसकी फसल उन स्‍थानों पर प्रमुखता से उगाई जा सकती है जहां दिन का तापमान 25-40 ड़िग्री सेग़्रे क़े बीच मे रहता है तथा रात्रि का तापमान 22 ड़िग्री सेग़्रे से नीचे नहीं आता है। भिंडी को इसके हरे, मुलायम स्वादिष्ट फलों के लिए उगाया जाता है।

भारत में मुख्य रूप से भिंडी की दो फसलें ली जाती है, एक गर्मी में व दूसरी बरसात के मौसम में पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी एक ही फसल ली जाती है। जिसकी बुवाई मार्च-अप्रेल में की जाती है। ग्रीष्मकालीन भिंडी की फसल लेने के कुछ अतिरिक्त फायदे है, इस मौसम में आमतौर पर दूसरी सब्जियां कम उपलब्ध होने के कारण बाजार मूल्य अच्छा मिलता है तथा दूसरा इस मौसम मे मोजेक रोग का प्रकोप बहुत ही कम होता है अत: इस मौसम में भिंडी की वे किस्मे भी बो सकते है जो कि मोजेक के प्रति सवेदनशील होती है। इस प्रकार ग्रीष्मकालीन भिंडी के उत्पादन की उन्नत तकनीकी को अपनाकर अधिक लाभ्‍ प्राप्त कर सकते है।

भिंडी के खेत का चयन व तैयारी:-

भिंडी की फसल को लगभग सभी प्रकार की भूमियों मे उगाया जा सकता है। लेकिन गर्मियों की फसल के लिए भारी दोमट मिटटी अधिक उपयुक्त रहती है। क्योकि इस भूमि मे नमी अधिक समय तक बनी रहती है। बरसात वाली फसल के लिए बलुई दोमट भूमि का चुनाव करना चाहिए जिसमें जल निकास अच्छा हो। खेत की एक बार मिटटी पलटने वाले हल से तथा तीन चार बार हैरो या देशी हल से जुताई करके मिटटी को भूरभूरा बनाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। बुवाई के समय खेत में उपयुक्त नमी होनी अति आव5यक है, यदि भूमि में नमी की कमी हो तो खेत की तैयारी से पूर्व एक सिंचाई अवय कर लेनी चाहिए।

भिंडी की उन्नत किस्में:-

हमारे देश में भिंडी की बहुत सी उन्नत एवं रोग अवरोधी किस्मो का विकास किया गया है जिनमे से प्रमुख किस्मे इस प्रकार है।

पुसा सावनी:-

 यह किस्म पहले पीला मोजेक रोग के प्रति अवरोधी थी लेकिन अब यह सुग्र्राही बन चुकी है। यह एक अच्छी किस्म है और आज भी इसे उत्तर भारत के मेदानी क्षेत्रो में ग्रीष्म ऋतु में उगाया जाता है। जायद में बुवाई के 40-45 दिन बाद फूल व फल प्राप्त होने लगते है।

पूसा मखमली:-

 यह एक अगेती किस्म है। इसके फल मुलायम, सीधे हलके हरे रंग के, लम्बे नुकीले पतले होते है। ग्रीष्मकाल में उत्तरी भारत के मैदानों में अच्छी पैदावार देती है। इस किस्म की ओसत उपज 80-100 क्विटल प्रति हैक्टर हैं

पंजाब पदमनी:-

 यह किस्म उत्तर भारत के मैदानी क्षैत्रो में ग्रीष्म तथा बरसात दोनों मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म पीला मोजेक रोग के प्रति अवरोधी है तथा इस पर जैसिड और कपास कीट का प्रकोप कम होता है इसकी औसत उपज 100-125 क्विटल प्रति हैक्टर होती है।

परभनी क्रांति:-

 यह किस्म पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी है। इस किस्म में बुवाई के 40 - 45 दिन बाद फूल आना प्ररम्भ हो जाता है इसकी औसत उपज ग्रीष्म ऋतु में 85 - 90 क्विंटल प्रति हैक्टर तथा बरसात में 120 -130 क्विंटल प्रति हैक्टर पायी गयी है।

पंजाब-7:-

 यह पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी किस्म है ग्रीष्म ऋतु में इसकी उपज 50 क्विंटल प्रति हैक्टर तथा बरसात के मौसम में 95 क्विंटल प्रति हैक्टर पायी गयी है।

अर्का अनामिका:-

 यह एक पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी किस्म है इस किस्म में बुवाई के 45 दिन बाद फल आना प्रारम्भ होता है तथा पहली तुडाई 55 दिन में की जा सकती है। यह एक अच्छी पैदावार देने वाली किस्म है। जिसके हरे फलों की उपज 115 क्विटल प्रति हैक्टर होती है।

भिंडी की बुवाई का समय:-

जायद वाली फसल की बुवाई फरवरी के द्वितीय सप्ताह से मार्च के अन्त तक की जा सकती है।

भिंडी की बीज दर:-

जायद के मौसम में अंकुरण कम होने के कारण अधिक बीज की आवश्‍यकता होती है। अत: एक हैक्टयेर के लिए 18 - 20 किग़्रा बीज की आवश्‍यकता होती है।

भिंडी के लि‍ए भूमि उपचार:-

खेत की तैयारी के समय अन्तिम जुताई के साथ कटुआ कीट के नियंत्रण के लिए भूमि मे दानेदार फयूराडान 25 किग़्रा अथवा थिमेट (10 जी) 10-15 किग़्रा प्रति हैक्टर की दर से मिला लेना चाहिए।

भिंडी बीज उपचार-

बुवाई के पहले बीज को 24 घंटे पानी मे भिगो लें तत्पश्‍चात बीजो को निकाल कर कपडे की थेली में बाधकर गर्म स्‍थान पर रख दे तथा अंकुरण होने लगे तभी बुवाई करें बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए बुवाई से पूर्व थायरम या कैप्टान (2 से 3 ग्राम दवा प्रति किग़्रा) से बीज को उपचारित कर लेना चाहिए।

भिंडी की बुवाई:-

गर्मी या जायद की फसल के लिए कतार से कता की दूरी 30 सेमी व पौधे से पौधे दूरी 15 सेमी रखना चाहिए। वर्षा ऋतु की फसल हेतु कतार की दूरी 45-60 सेमी व पौधे से पौधे की दूरी 30-45 सेमी रखना चाहिए।

भिंडी मे खाद व उर्वरक:-

खाद व उर्वरक की मात्रा भूमि में उपस्थित पौषक तत्वों की निर्भर करती है। 15 से 20 टन सडी गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के 25 से 30 दिन पूर्व खेत मे मिला लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त 40 किग्रा नत्रजन, 40 किग़्रा फ़ॉस्फोरस व 40 किग़्रा पोटाश्‍ा को प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई के समय देना चाहिए तथा खडी फसल में 40 से 60 किग़्रा नत्रजन को दो बराबर भागो मे बांटकर पहली मात्रा बुवाई के 3-4 सप्ताह बाद पहली निराई गुडाई के समय तथा दूसरी मात्रा फसल में फूल बनने की अवस्था मे देना लाभप्रद है।

भिंडी मे सिंचाई:-

गर्मी के मौसम में आवश्यकतानुसार 6-7 दिनो के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए अन्यथा नमी के अभाव में पौधे सूखने लगते है।

भिंडी मे निराई गुडाइ:-

फसल में 2-3 बार निराई गुडाई करके खरपतवारों को निकाल देना चाहिए। जिससे खरपतवार नियंत्रण के साथ भूमि मे वायु संचार भी ठीक रहेगा।

भिंडी मे फसल सुरक्षा-

पीला मौजेक:-

 ये रोग सफेद मक्खी द्वारा फेलाया जाता है। इसका प्रकोप होने पर पत्तियों की शिराएं पीली हो जाती है। बाद में फल सहित पूरा पौधा पीला हो जाता है सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए रोगार या मैटासिस्टाकस (01 प्रतिशत) का छिडकाव पौधे उगने के बाद से ही 10-12 दिन के अन्तराल पर करते रहना चाहिए।

चूर्णी फफूदी रोग:-

 रोगग्रस्त पौधों पर सफेद पाउडर जैसी हल्की पर्त जमा हो जाती है। पत्तियां पीली पड जाती है तथा धीरे धीरे गिरने लगती है। पौधों पर कैराथेन (006 प्रतिशत) का छिडकाव 10-15 दिन के अन्तराल पर दो से तीन बार करना चाहिए।

फल छेदक कीट:-

 यह कीट बढते हुए फलों में छेद करके फलों को हानि पहुंचाता है। इसका लार्वा फलों में छेद करता है पौधों पर थायोडान (02 प्रतिशत) का छिडकाव 10-12 दिन के अन्राल पर दो तीन बार करना लाभकारी होता है।

कटुआ कीट:-

 यह कीट पौधें के उगने के समय पौधे को नीचे से काट देता है, जिससे पौधा सूख जाता है इससे बचाव के लिए दानेदार फयूराडान 25 किग़्रा अथवा थिमेट (10 जी) 10 से 15 किग़्रा मात्रा प्रति हैक्टयेर की दर से खेत की तैयारी के समय मिटटी में मिला देना चाहिए।

फलो की तुडाई:-

इस फसल में तुडाई के समय का बहुत महत्व है। फल अधिक समय तक पौधों पर रहने या तुडाई मे देरी से फलों में रेश्‍ो की मात्रा बढ़ जाती है तथा फलों की कोमलता कम हो जाती है। जिससे फलों का स्वाद कम हो जाता है। अत: फलो को एक दिन के अन्तराल पर तुडाई करते रहना चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण:-

खरपतवार नियंत्रण हेतु बेसालीन 25 लीटर रसायन को बुवाई के 4 दिन पूर्व या लासों 5 लीटर रसायन को बुवाई के बाद प्रति हैक्टेयर की दर से पानी में घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।

उपज:-

वैज्ञानिक विधि से भिंडी की खेती करने से 100-120 क्विटल प्रति हैक्टर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

उड़द की उन्नत खेती

उड़द की उन्नत खेती (Improved cultivation of Blackgram (Urad))


https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Farming-of-urad.html              , urad (blackgram) plant photos



हमारे देश में उड़द का उपयोग मुख्य रूप से दाल के लिये किया जाता है। इसकी दाल अत्याधिक पोषक होती है। विशेष तौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसे लोग अधिक पसन्द करते है। उड़द को दाल के साथ-साथ भारत में भारतीय व्यंजनों को बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है तथा इसकी हरी फलियाँ से सब्जी भी बनायी जाती है।

उड़द का दैनिक आहार में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर कैल्शियम व विटामिन बी काम्पलेक्स तथा खनिज लवण भी बहुतायत पाये जाते है। इसके साथ - साथ अन्य दालो की तुलना में 8 गुणा ज्यादा फास्फोरस अम्ल के अलावा आरजिनीन, ल्यूसीन, लाइसीन, आइसोल्यूसीन आदि एमिनो एसिड के पूरक सम्बन्ध के कारण जैव वैज्ञानिक मान अत्याधिक बढ़ जाता है।

उड़द की जड़ो में गाठो के अन्दर राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधे का नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। इसलिए उड़द की फसल से हरी खाद भी बनायी जाती है, जिसमें लगभग 40-50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन प्राप्त होती है। 

उड़द, देश की एक मुख्य दलहनी फसल है इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ में की जाती है लेकिन जायद मे समय से बुवाई सघन पध्दतियो को अपनाकर भारत में उड़द मैदानी भाग उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाण, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, बिहार तथा राजस्थान में मुख्य रूप से की जाती है। कार्य सांख्यिकी प्रभाग अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय के अनुसार 2004-2005 में भारत में कुल उड़द का उत्पादन 1.47 मिलियन टन था जो 2015-16 में बढ़कर 2.15 मिलियन टन हो गया है तथा 2016-17 के अग्रिम अनुसार 2.93 मिलियन टन कुल उड़द का उत्पादन रखा गया है।

उड़द की फसल के लि‍ए जलवायु :-

उड़द एक उष्ण कटिबन्धीय पौधा है इसलिए इसे आर्द्र एवं गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है उड़द की खेती के लिये फसल पकाते समय शुष्क जलवायु की आवश्यकता पड़ती है, जहाँ तक भूमि का सवाल है समुचित जल निकास वाली बुलई दोमट भूमि इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है लेकिन जायद में उड़द की खेती में सिंचाई की जरूरत पड़ती है।

उडद के खेत की तैयारी :-

खेत में पहले जुताई हैरो से करने के बाद दो-तीन जुताई कल्टीवेटर से पता लगाकर खेत तैयार कर लेते है। खेत की तैयारी करते समय एक कुन्तल जिप्सम का प्रयोग करने पर अलग से सल्फर देने की जरूरत नहीं पड़ती है जिप्सम का प्रयोग करने पर मिट्टी मूलायम हो जाती है। भूमि की दशाओं में सुधार होता है।

उडद की उन्नत किस्में


उन्नतशील प्रजातियां / किस्म
अवधि (दिन में)
उपयुक्त क्षैत्र
विवरण 
उपज (क्वि./हे.)


टी.-9


70 - 75

उ.प्र., म.प्र., महा., उड़ीसा, आसाम, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, हि.प्र.

सभी ऋतुओ के लिए उपयुक्त


10 - 12

पंत यु- 19

80 - 85

राज., आसाम, बिहार, उ.प्र., ज. ओर क., पं. बंगाल

पीला मोजैक रोग रोधी

10 - 12

पंत यु- 30

80 - 85

आ.प्र., दादरा एवं न हे, गुजरात, उड़िसा, उ.प्र.

पीला मोजैक रोग रोधी

10 - 12

जे. वाई. पी.

80 - 90

उ.प्र.

खरीफ व रबी दोनो मौसम के लिए उपयुक्त

10 - 12

यु. जी. - 218

78

उ.प्र., पंजाब, हरियाणा, दिल्ली

पीला मोजैक रोग रोधी

15


उड़द बुवाई के लिए बीज दर :-

उड़द अकेले बोने पर 15 से 20 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर तथा मिश्रित फसल के रूप में बोने पर 8-10 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर काम में लेना चाहिए।

उडद बोने की विधि और समय :-

बसन्त ऋतु की फसल फरवरी-मार्च में तथा खरीफ ऋतु की फसल जून के अन्तिम सप्ताह या जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक बुवाई कर देते है। चारे के लिए बोई गई फसल छिड़कवाँ विधि से बुवाई की जाती है तथा बीज उत्पादन हेतु पक्तियाँ में बुवाई अधिक लाभदायक होती है।
प्रमाणित बीज को कैप्टान या थायरम आदि फफूदनाशक दवाओं से उपचारित करने के बाद , राइजोबियम कल्चर द्वारा उपचारित करके बुआई करने से 15 प्रतिशत उपज बढ़ जाती है।

उडद बीज का राइजोबियम उपचार :-

उड़द दलहनी फसल होने के कारण अच्छे जमाव पैदावार व जड़ो में जीवाणुधारी गाँठो की सही बढ़ोतरी के लिए राइजोबियम कल्चर से बीजों को उपचारित करना जरूरी होता है। 1 पैकेट (200 ग्राम) कल्चर 10 किलोग्राम बीज के लिए सही रहता है। उपचारित करने से पहले आधा लीटर पानी का 50 ग्राम गुड़ या चीनी के साथ घोल बना ले उस के बाद में कल्चर को मिला कर घोल तैयार कर ले। अब इस घोल को बीजों में अच्छी तरह से मिला कर सुखा दे। ऐसा बुवाई से 7-8 घण्टे पहले करना चाहिए।

उडद की फसल में खाद एवं उर्वरक :-

उड़द दलहनी फसल होने के कारण अधिक नत्रजन की जरूरत नहीं होती है क्याेंकि उड़द की जड़ में उपस्थित राजोबियम जीवाणु वायुमण्डल की स्वतन्त्र नत्रजन को ग्रहण करते है और पौधो को प्रदान करते है। पौधे की प्रारम्भिक अवस्था में जब तक जड़ो में नत्रजन इकट्ठा करने वाले जीवाणु क्रियाशील हो तब तक के लिए 15-20 किग्रा नत्रजन 40-50 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय खेत में मिला देते है।

उर्वरक उपयोग एवं संयोग (कि./हे.) :-



नत्रजन

फास्फोरस


पोटाश


संयोग - 1


संयोग - 2


संयोग - 3

20

50

40

डि.ए.पी. - 108.7

एस.एस.पी. - 312.5

टि.एस.पी. - 104.17

युरिया - 0.95

युरिया - 43.48

युरिया - 43.48

एम.ओ.पी. - 66.66

एस.ओ.पी. - 80

एम.ओ.पी. - 66.66


उडद की फसल में सिंचाई :-

ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 10-15 दिन में आवश्यकतानुसार सिंचाई की जाती है। तथा वर्षा ऋतु में सुखा पड़ने की स्थिति में 2-3 बार कुल सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।

उडद में खरपतवार नियन्त्रण :-

वर्षा कालीन उड़द की फसल में खरपतवार का प्रकोप अधिक होता है जिससे उपज में 40-50 प्रतिशत हानि हो सकती है। रसायनिक विधि द्वारा खरपतवार नियन्त्रण के लिए वासालिन 1 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी के घोल का बुवाई के पूर्व खेत में छिड़काव करे। फसल की बुवाई के बाद परन्तु बीजों के अंकुरण के पूर्व पेन्डिमिथालीन 1.25 किग्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। अगर खरपतवार फसल में उग जाते है तो फसल बुवाई 15-20 दिन की अवस्था पर पहली निराई तथा गुड़ाई खुरपी की सहायता से कर देनी चाहिए तथा पुन: खरपतवार उग जाने पर 15 दिन बाद निंदाई करनी चाहिए।

उडद के फसल चक्र एवं मिश्रित खेती :-

उड़द की वर्षा ऋतु में उड़द की फसल प्राय: मिश्रित रूप  में मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास व अरहर आदि के साथ उगते है।
उड़द के साथ अपनाये जाने वाले साधन फसल चक्र निम्नलिखित है-

सिंचित क्षेत्र:

 उड़द - सरसों   , उड़द - गेहूँ  

असिंचित क्षेत्र:

  उड़द-पड़त-मक्का  ,   उड़द-पड़त-ज्वार

कीट और कीट की रोकथाम :-

सफेद मक्खी :-

 यह उड़द का प्रमुख कीट है जो पीला मोजेक वायरस का वाहक के रूप में कार्य करती है।

देखभाल :-

ट्रायसजोफॉस 40 ई.सी. का 1 लीटर का 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
इमिडाक्लोप्रिड की 100 मिलीलीटर या 51 इमेथोएट की 25 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

अर्ध कुंडलक (सेमी लुपर) :-

 यह मुख्यत: कोमल पत्तियों को खाकर पत्तियों को छलनी कर देती है।

देखभाल :-

प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. 1 लीटर का 500 लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करते है।

फली छेदक कीट :-

 इस कीट की सूडियां फलियों में छेद कर दानो को खाती है। जिससे उपज में भारी नुकशान होता है

देखभाल :-

मोनोक्रोटोफास का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

एफिड :-

 यह मुलांकूर के रस को चुसता है जिससे पौधे की वृध्दि रूक जाती है।

देखभाल :-

क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. 500 मिलीलीटर 1000 लीटर पानी के घोल में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

रोग और उनकी रोकथाम :-

पीला मोजेक विषाणु रोग :-

 यह रोग वायरस द्वारा फैलता है तथा यह उड़द का सामान्य रोग है तथा इसका प्रभाव 4-5 सप्ताह बाद ही दिखाई देने लगते है। रोग के सबसे पहले लक्षण पत्तियों पर गोलाकार पीले रंग के धब्बे दाने के आकार दिखाई देते हैं ।  कुछ ही दिनों में पत्तियाँ पूरी पीली हो जाती है अंत में ये पत्तियाँ सफेद सी होकर सूख जाती है।

देखभाल :-

सफेद मक्खी की रोकथाम से रोग नियंत्रण सम्भव है। उड़द की पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी किस्म पंत यु-19, पंत  यु-30, यु जी-218, टी.पी.यू.-4, पंतउड़द-30, बरखा, के.यू.-96-3 की बुवाई करनी चाहिए।

पत्ती मोड़न रोग :-

 नई पत्तियो पर हरिमाहीनता के रूप में पत्ती की मध्य शिराओं पर दिखाई देते हें। इस रोग में पत्तियां मध्य शिराओं से उपर की और मुड़ जाती हैं। तथा निचें की पत्तिया अंदर की और मुड़ जाती हैं। तथा पत्तियों की वृध्दि रूक जाती हैं। और पौधे मर जाते हैं।

देखभाल :-

यह विषाणु जनित रोग हैं। जिसका संचरण थ्रीप्स द्वारा होता हैं। थ्रीप्स के लिए ऐसीफेट 75 प्रतिशत एस.पी. या 2 मि.ली. डाईमैथोएट प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए तथा फसल की बुआई समय पर करनी चाहिए।

पत्ती धब्बा रोग :-

 यह रोग फफँद द्वारा फैलता है, इसके लक्षण पत्तियाँ पर छोटे-छोटे धब्बों के रूप में दिखाई देते है।

देखभाल :-

कार्बेन्डाजिम 1किग्रा 1000 लीटर पानी के घोंल में मिलाकर स्प्रे कर दिया जाता है।                 

उडद की फसल की कटाई और मड़ाई :-

उड़द लगभग 85-90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है इसलिए ग्रीष्म ऋतु की कटाई मई-जुन में तथा वर्षा ऋतु की कटाई सित.-अक्टु. में फलियो का रंग काला पड़ जाने पर हसियाँ से कटाई करके खलियानो में फसल को सुखाते है बाद में बेल या, डण्डो या थ्रेसर से फलियों से दानों निकाल लिया जाता है।

उडद की उपज :-

10-15 कुन्टल प्रति हेक्टेयर शुध्द फसल में तथा मिश्रित फसल में 6-8 कुन्टल प्रतिहेक्टेयर उपज हो जाती है।

भण्डारण :-


दानो को धुप में सुखाकर 10-12 प्रतिशत नमी हो जाए, तब दानों को बोरीयाँ में भरकर गोदाम में संग्रहित कर लिया जाता है।

Sunday, 1 October 2017

मसूर की खेती

मसूर की खेती (Farming of lentil)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Farming-of-lentil.html             , lentil (masoor) plant photos



रबी की दलहनी फसलों में मसूर का प्रमुख स्थान है। यह यहाँ की एक बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दलहनी फसल है जिसकी खेती प्रायः हर राज्य में की जाती है। कृषि वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि धान के कटोरे में दलहन की खेती की भी अपार संभावनाएं हैं।इसकी खेती प्रायः असिंचित क्षेत्रों में धान के फसल के बाद की जाती है । रबी मौसम में सरसों एवं गन्ने के साथ अंततः फसल के रूप में लगाया जाता है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने में भी मसूर की खेती बहुत सहायक होती है। उन्नतशील उत्पादन तकनीको का प्रयोग करके मसूर की उपज में बढ़ोतरी की जा सकती है।

जलवायु 

मसूर के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है,ऊष्ण-कटिबंधीय व उपोष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों में मसूर शरद ऋतू की फसल के रूप में उगाई है जाती,विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार की जलवायु में मसूर की फसल समुद्री सतह से लगभग 3500 मीटर की ऊंचाई तक उगाई जाती है.पौधों की वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत अधिक ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है , अतः भारत में मसूर की फसल रबी की ऋतू में उगाई जाती है . उन सभी स्थानों पर 80-100 सेमी तक वार्षिक वर्षा होती है मसूर की फसल बिना वर्षा के भी उगाई जा सकती है जहाँ , परन्तु कम वर्षा वाले स्थानों पर सिंचाइयों की सुविधा उपलब्ध होना अति आवश्यक है , अधिक वर्षा फसल के लिए हानिकारक है होती . पौधों की वृद्धि के लिए अधिक ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है परन्तु पाले का फसल पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है , पौधों की वानस्पतिक वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत उच्च तापक्रम आवश्यक होता है , इस प्रकार फसल वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं 65-85 डिग्री फारेन्हाईट तापक्रम अनुकूल में होता है

भूमि का चयन

मसूर की खेती के लिए दोमट मिट्टी काफी उपयोगी होती है। नमीयुक्त मटियार खेत में धान की अगैती फसल के बाद या फिर खाली पड़े खेत में मसूर की खेतीबारी आसानी पूर्वक की जा सकती है।

खेत की तैयारी

मसूर की खेती के लिए खेत को 2-3 बार देशी हल अथवा कल्टीवेटर से जुताईकर मिट्टी को भूरभूरी बना देते है। बीज की बोआई जीरो टिलेज मशीन से करने के बाद कल्टीवेटर या रोटावेटर से जोताई कर खेत भुरभुरा करना पड़ता है।

मसूर बोने का समय

दलहन की बोआई के लिए वैसे तो असिंचित क्षेत्र में 15 से 31 अक्टूबर के बीच का समय उपयुक्त माना गया है। किन्तु सिंचित इलाकों में इसकी बोआई का समय 15 नवम्बर तक निर्धारित किया गया है। मसूर की उन्नत प्रजातियां को 15 अक्टूबर से 25 नवम्बर के बीज बुवाई कर देनी चाहिए।

मसूर की खेती के लिए अनुसंसित उन्नत प्रजातियाँ

छोटे दाने की प्रजातियाँ

पंत के 639 - यह प्रजाति 135-140 दिन में तैयार हो जाती है। यह जड़ सड़न एवं उकठा रोग के लिए प्रतिरोधी मानी जाजी है।
पी0एल0 406 - यह प्रभेद 140-145 दिन में तैयार होती है। इसमें रस्ट, बिल्ट एवं अट रोग से लड़ने की क्षमता होती है।
एच0यू0एल0 57 - यह प्रजाति 120-125 दिन में परिपक्व हो जाती है तथा इसमंे भी जड़ सड़न एवं उकठा रोग से लड़ने की क्षमता है।
के0एल0एस0 218 - यह प्रजाति 120-125 दिन में तैयार हो जाती है।
 


बडे़ दाने वाली प्रजातियाँ

पी0एल077-12 (अरूण) - यह प्रभेद 115-120 दिन में परिपक्व हो जाती है रस्ट एवं इकठा रोग से लड़ने की क्षमता होती है।
मसूर की बुवाई की जाने वाली प्रमुख प्रजातियाँ जैसे की पूसा वैभव, आई पी एल८१, नरेन्द्र मसूर 1, पन्त मसूर 5, डी पी एल 15 ,के 75 तथा आई पी एल 406 इत्यादि प्रजातियाँ हैंI 
के-75 (मल्लिका) - यह जाति 115-120 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 10-12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना छोटा होता है, जिसके 100 दानों का वजन 2.6 ग्राम है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र अर्थात सीहोर, भोपाल, विदिशा, नरसिंहपुर, सागर, दमोह एवं रायसेन आदि जिलों के लिये उपयुक्‍त है।
2. जे.एल.-1 -  इस जाति की पकने की अवधि 112-118 दिन है तथा औसत उपज 11-13 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है तथा 100 दानों का वजन 2.8 ग्राम होता है। यह जाति भी संपूर्ण विश्‍व क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
3.एल-4076 - यह जाति 115-125 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी औसत उपज 10-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। यह उकठा रोग निरोधक है। इसका दाना अपेक्षाकृत बड़े आकार का होता है। 100 दानों का वजन 3.0 ग्राम होता है। यह जाति प्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिये उपयुक्‍त है।
4. जे.एल.-3 - मध्‍यम अवधि की नई विकसित यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा 14-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर उपज देती है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है। इसके 100 दानों का वजन लगभग 3.0 ग्राम होता है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
5. आई.पी.एल.-18 (नूरी): यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा औसत उत्‍पादन 12-14 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। मध्‍यम आकार के दानों वाली इस जाति का वजन 3.0 ग्राम है।
6. एल. 9-2: देरी से पकने वाली यह किस्‍म 135-140 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 8-10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसके दाने छोटे आकार के होते हैं। यह जाति भिण्‍ड तथा ग्‍वालियर क्षेत्रों के लिये अधिक उपयुक्‍त है।

बीज की मात्रा एवं बोने की बिधि

छोट दानो वाले प्रभेदो के लिए एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में बुबाई के लिए 35-40 किलोग्राम बीच की जरूरत पड़ती है। जबकी बड़ेे दानों वालेे किस्मों के लिए 50-55 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बुबाई के समय किस्मों के आधार पर कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी क्रमशः 25 से0मी0 ग् 10 से0मी रखनी चाहिए।

बीजोपचार

प्रारम्भिक अवस्था के रोगों से बचाने के लिए बुवाई से पहले मसूर के बीजों को सही उपचार करना जरूरी होता है। इसके लिए ट्राइकोडर्मा विरीडी 5 ग्राम प्रति किलों बीज या कार्बेन्डाजिन 2.0 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। बीजोपचार में सबसे पहले कवकनाशी तत्पश्चात् कीटनाशी एवं सबसे बाद में राजोबियम कल्चर से उपचारित करने का क्रम अनिवार्य होता है।

उर्वरकों का प्रयोग

मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग आवश्यतानुसार करना चाहिए। सामान्य परिस्थिति में 20 किलो नेत्रजन, 40 किलोग्राम स्फूर एवं 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर उपयोग करना चाहिए। प्रायः असिंचित क्षेत्रों में स्फूर की उपलब्धता घट जाती है। इसके लिए पी एस बी का भी प्रयोग कर सकते है। 4 किलो पी एस बी (जैविक उर्वरक) को 50 किलोग्राम कम्पोस्ट में मिलाकर खेतों मंे बुवाई पूर्व व्यवहार करें। जिन क्षेत्रों में जिंक एवं बोरान की कमी पाई जाती है उन खेतों में 25-30 किलोग्राम जिंक सल्फेट एवं 10 किलोग्राम बोरेक्स पाउडर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय प्रयोग करना चाहिए।

सिंचाई

जिन खेतों के नमी कमी पाई जाती है वहा एक सिंचाई (बुबाई के 45 दिन बाद) अधिक लाभकारी होती है। खेतों में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। इससे फसल प्रभावित हो जाती है। प्रायः टाल क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती है।

खरपतवार नियत्रण

मसूर के खेत में प्रायः मोथा, दूब, बथुआ, मिसिया, आक्टा वनप्याजी, बनगाजर आदि खरपतवार का प्रकोप ज्यादा होता है। इसके नियत्रण के लिए 2 लीटर फ्लूक्लोरिन को 600-700 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जूताई के बाद छिटकर मिला दे अथवा पेण्डीमेथीलीन एक किलोग्राम को 1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 48 घंटे के अन्दर छिड़काव करना चाहिए।

फसल सुरक्षा प्रबंधन

रोग प्रबंधनः

मसूर के प्रमुख रोग उकठा, ब्लाइट, बिल्ट एवं ग्रे मोल्ड है। इससे बचाने के लिए फसलों में मेंकोजेब 2 ग्राम लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

कीट प्रबंधन –


  मसूर के पौधे के उगने के बाद फसल को हमेशा निगरानी रखनी चाहिए जिससे कीड़े का आक्रमण होने पर उचित प्रबंध तकनीक अपनाकर फसल को नुकसान से बचाया जा सके। कजरा पिल्लू, कटवर्म, सूड़ी तथा एफिड कीड़ों को प्रकोप मसूर के पौधे पर ज्यादा होता है।

कीट नियंत्रण

5 लीटर देशी गाय का मठा लेकर उसमे 15 चने के बराबर हींग पीसकर घोल दें , इस घोल को बीजों पर डालकर भिगो दें तथा 2 घंटे तक रखा रहने दें उसके बाद बोवाई करें . यह 1 एकड़ घोल की बोवनी के बीजों के लिए पर्याप्त है .
5 देशी गाय के गौमूत्र में बीज भिगोकर उनकी बोवाई करें , ओगरा और दीमक से पौधा सुरक्षित रहेगा लीटर . इन कीटो को आर्थिक क्षतिस्तर से नीचे रखने के लिए बुवाई के 25-30 दिन बाद एजैडिरैक्टीन (नीम तेल) 0.03 प्रतिशत 2.5-3.0 मि0ली0 प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।

कटाई एंव भण्डारण


जब 80 प्रतिशत फलिया पक जाऐ तो कटाई करके झड़ाई कर लेना चाहिए। भण्डारण से पूर्ण दानों को अच्छी तरह से सुखा लेना याहिए। अगर किसान लोग उन्नत विधि से मसूर की खेती करे तो लगभग 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर सकते है।

गन्ना की खेती

गन्ना की खेती (Farming of sugarcane)



https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Farming-of-sugarcane.html            , sugarcane (ganna) plant photos


ईंख की व्यावसायिक खेती गुड़ बनाने एवं इसका रस पीने के लिए की जाती है। ईंख एक नकदी फसल है, इसे एक वर्ष रोपकर दो खूँटी फसल के साथ लगातार तीन वर्षों तक उपज लिया जा सकता है। झारखण्ड राज्य के करीब 500 हेक्टेयर में गन्ना की खेती होती है। प्रमुख जिलों जैसे राँची, गुमला, गोड्डा, गढ़वा, कोडरमा, लोहरदगा आदि में इसकी खेती ज्यादातर की जाती है।
मिट्टी एवं खेत की तैयारीः ईंख की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जाती है परन्तु दोमट मिट्टी तथा ऊँची या मध्यम जमीन, जहाँ जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो अधिक उपयुक्त है। ईंख की जड़े मिट्टी में काफी गहराई तक जाती है इसके लिए खेत की गहरी जुताई आवश्यक है। साधारणतया दो जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या ट्रैक्टर से करनी चाहिए। उसके बाद देशी हल से जुताई कर पाटा चला देना चाहिए जिससे मिट्टी भुरभुरी होकर उसमें अच्छा वायु संचार हो जाय।

रोपाई का समयः

 रोपाई का समय तापमान पर निर्भर करता है, इसके लिए औसत तापक्रम 24 डिग्री से 32 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त पाया जाता है। इस आधार पर दो मौसमों यानी शरदकालीन में 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक एवं बसंतकालीन में 15 फरवरी से 15 मार्च तक इसकी बुवाई की जाती है। शरदकालीन रोपाई में ईख की उपज बसंतकालीन रोप की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अधिक होती है।

अनुशंसित प्रभेद:

 अनुशंसित प्रभेद की ही बुवाई करनी चाहिए जिसकी उपज क्षमता अच्छी हो, एवं उसमें रस की प्रचूर मात्रा के साथ-साथ खूटी फसल भी ली जा सके। BO 147 एक मुख्यकालीन प्रभेद है जिसे विश्वविद्यालय ने अनुसंधान के बाद अनुशंसित किया है। यह 12 महीने में तैयार हो जाती है, इसकी उपज क्षमता एवं रस में सुक्रोज की मात्रा अधिक है।

कुछ उन्नत प्रभेद:

जलदी पकने वाली किस्में

बी.ओ. 90: यह एक मध्य मोटाई एवं जल्दी पकने वाली लाल विगलन रोग रोधी तथा 850 क्विं हे.उपज देने वाली प्रजाति है। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत है।
सी.ओ.पी.-2: इस प्रजाति में ज्यादा कल्ले निकलतें हैं। यह लाल विगलन रोधी हैं तथा उपज क्षमता 600 क्विंटल/ हेक्टेयर। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत है।

मध्यम तथा देर से पकने वाली किस्में

बी.ओ. 70: लाल विगलन रोग रोधी । उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में कटने योगय तैयार हो जाती है। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत।
बी.ओ. 90: मध्यम मोटाई, हरा रंग, लम्बा व अधिक कल्ले पैदा करने वाली प्रजाति ।रोग रोधी उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। शर्करा की मात्रा 10.7 प्रतिशत।
सी.ओ.पी.-1: जलमग्न अवस्था के लिये उपयुक्त, अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 600 क्विंटल/ हेक्टेयर।
बी.ओ.-1: जलमग्न अवस्था के लिये उपयुक्त, अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। पेड़ी के के लिये उपयुक्त।
बी.ओ.-88: लाल विगलन रोग रोधी । अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 1000 क्विंटल/ हेक्टेयर। शर्करा की मात्रा 10.7 प्रतिशत होती है।
सी.ओ. 1158 : लाल विगलन रोग रोधी । उपज क्षमता 950 क्विंटल/ हेक्टेयर। अधिक कल्ले, सी.ओ. 1148 औसत शर्करा की मात्रा 10.3 प्रतिशत होती है।

बीज का चुनाव:

 ऐसे बीज का चुनाव करें जिसकी आँख स्वस्थ हो एवं रोग कीट रहित हो। दस महीने की फसल बीज के लिए उपयुक्त होती है। जहाँ तक संभव हो पौधे के उपरी दो-तिहाई हिस्से को ही बीज के रूप में लेना चाहिए एवं कोशिश यह करनी चाहिए कि खूटी फसल से बीज नहीं लें।

रोपाई का समय:

 शरदकालीन गन्ना – अक्टूबर
बसन्तकालीन गन्ना – फरवरी
गन्ने की फसल की बोआई में गन्ना के तीन आँख वाला टुकड़ा अच्छा रहता है। बीज टुकड़ों को कवक आदि से बचाने के लिये 1 ग्राम थिरम व 1 ग्राम बैविस्टीन प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर दो घंटो के लिये डुबो दिया जाता है। बीज टुकड़ों को विषाणु मुक्त करने के लिये 540 से.ग्रे. तापमान वाले पानी में 2 घंटे उपचारित करना आवश्यक है।

बीज की मात्राः

 करीब 40,000 से 45,000 तीन आँखों वाले गुल्ले एक हेक्टर के लिए उपयुक्त है, जो करीब 60 क्विंटल गन्ने से प्राप्त होते हैं।

रोपनी की दूरी :

 पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सेन्टी मीटर तक रखते हैं एवं बीज को 30 सें.मी. की गहराई पर डालते हैं।

बीजोपचार:

 बीज (गुल्लों) को 0.2% कार्बेन्डाजिम (दो ग्राम प्रति लीटर पानी में) आधा घंटा तक डुबोकर उपचारित करना चाहिए। दीमक,जड़ छेदक एवं धड़ छेदक के रोकथाम के लिए क्लोरपाईरीफास 20 EC का 3 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 500 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से नालियों में बिछाई गई गेड़ियों पर छिड़काव कर मिट्टी से ढक दें।

रोपाई की विधिः

 ईंख रोप की दो अनुशंसित विधियाँ है : सिराउर विधि तथा ट्रेंच विधि।

 सिराउर विधि में 90 सें.मी. की दूरी पर खोले गये सिराउर (Furrow) के अनुशंसित खाद की मात्रा डालकर देसी हल से मिट्टी में मिला दें एवं उपचारित गुल्लियों को आँख से आँख मिलाकर बिछा देना चाहिए। उसके बाद शीघ्र ही सिराउर को ढ़क कर पाटा चला देना चाहिए। ट्रेंच विधि में भी 90 सें.मी. की दूरी पर रीजर द्वारा सिराउर खोला जाता है। इसके बाद कुदाली से 30 सें.मी. चौड़ी तथा 30 सें.मी. गहरी ट्रेंच या नाली बनाई जाती है एवं गुल्लियों को बिछा कर ढक दी जाती है।

खाद एवं उर्वरक:

 10 टन कम्पोस्ट या सड़े हुए गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में एक माह पहले डालकर अच्छी तरह मिला दें। रासायनिक खाद यानि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस की क्रमशः 170 किलो, 85 किलो एवं 60 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए। रोपाई के समय फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा डाल देनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची मात्रा को दो बराबर भागों में बाँटकर देना चाहिए। पहली टॉपड्रेसिंग 60 किलो नेत्रजन शरदकालीन गन्ने में बुवाई के दो महीने बाद तथा बंसत कालीन गन्ने में बुआई के 45 दिनों बाद करनी चाहिये। टॉपड्रेसिंग से पहले खरपतवार निकालकर पहले सिचाई करें फिर उसके दो दिन बाद यूरिया द्वारा टॉपड्रेसिंग करें। दूसरी टॉपड्रेसिंग (60 किलो नेत्रजन) जून माह के दूसरे पखवाड़े में वर्षांत के बाद खरपतवार निकालकर यूरिया द्वारा टॉपड्रेसिंग करें तथा मिट्टी चढ़ा दें।

निराई-गुड़ाई:

 साधारणतया ईंख में दो कमौनी, एक 45-50 दिनों के बाद एवं दूसरा 65-70 दिनों के बाद फसल के लिए उपयुक्त है। खरपतवार नष्ट करने के लिए रसायन एट्राजीन का ढाई से 3 किलो ग्राम 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के तीन दिनों के अन्दर छिड़काव करना चाहिए। पुनः 60 दिनों के बाद 2-4D तृण नाशक दवा 1.25 किलो ग्राम 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से काफी लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त मई के मध्य में एक गुड़ाई से खरपतवार नियंत्रण रहता है।

सिंचाई:

 रोपाई के लगभग 25 दिनों के बाद सिंचाई करें एवं 20 दिनों के अन्तराल पर बराबर पानी डालें। शरदकालीन रोप में 6-7 सिंचाई एवं बसंतकालीन में 4-5 सिंचाई की आवश्यकता मानसून के पहले तक होती है।

मिट्टी चढ़ाना:

 मानसून की पहली वर्षा में यूरिया का टॉपड्रेसिंग कर मिट्टी चढ़ा दी जाती है एवं बरसात का पानी निकलने की नाली बना दी जाती है।
सूखी पत्तियों को हटानाः सूखी पत्तियों को पाँचवे से सातवें महीने में धीरे से पौधे से अलग कर देना चाहिए।

स्तम्भनः

 फसल को बरसात के दिनों में तेज हवा एवं आँधी के कारण गिरने से बचाने के लिए अगस्त से मध्य सितम्बर तक पत्ती रस्सी विधि से स्तम्भन कर दें। इसके लिए ईख की आमने- सामने की पत्तियों को एक दूसरे तक झुकाकर उसी की कुछ सूखी एवं पत्तियों से बाँध दें।

पौधा संरक्षण:

 स्वस्थ बीज एवं रोगरोधी प्रभेद को ही लगावें। रोग का सर्वेक्षण खड़ी फसल में करते रहना चाहिए। यदि कोई झुड़, लालसड़न या कलिका रोग से ग्रसित दिखें तो शुरू में ही सावधानी से उखाड़कर नष्ट कर दें। लाल सड़न रोग में रोगी तने के गूदे लाल रंग के हो जाते हैं। पत्तियों की मध्य शिराओं में भी लाल धब्बे बनते हैं।

कीट:

 कीटों में शीर्ष छेदक, पायरीला तथा श्वेत मक्खी आदि का प्रकोप ईंख फसल पर पाया जाता है। कल्ला, मूल एवं शीर्ष छिद्रक के प्रकोप के कारण बीच की पत्तियाँ सूख जाती है जिसे पिहका कहते हैं। निजात के लिए इमिडाक्लोप्रीड तरल (17.8%) या मोनोक्रोटोफाँस (368% तरल) या मिथाईल डिमेटान (25 EC) का एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव जून के अंतिम सप्ताह में तथा दूसरा अगस्त के प्रथम सप्ताह में अवश्य कर दें जिससे सभी कीटों का नियंत्रण हो जायेगा।

कटाई:

 मुख्यतया 12 महीनों में फसल तैयार हो जाती है। मुख्यकालीन प्रभेदो की कटाई 15 जनवरी से करें।

खूटी :

 मुख्य फसल की कटाई के सप्ताह भर के अन्दर खूटियों को तेज धार वाले यंत्र से काट देना चाहिए। मेड़ों को तोड़ देना चाहिए, इस प्रकिया से खूटी में कल्ले स्वस्थ तथा एक साथ निकलते हैं। खेत की खाली जगहों को अंकुरित टुकड़ों की रोपाई से भर देना चाहिए एवं उर्वरक का उपयोग करना चाहिए।

उपज:


 शरद रोप से करीब 100 टन एवं वसंत रोप से 75 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती