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Tuesday, 5 June 2018

लहसुन की खेती


लहसुन की खेती (farming of garlic)


https://smartkhet.blogspot.com/2018/06/farming-of-garlic.html


लहसुन (Garlic) का वैज्ञानिक नाम एलियम सैटिवुम एल है। लहसुन में रासायनिक तौर पर गंधक की अधिकता होती है। इसे पीसने पर ऐलिसिन नामक यौगिक प्राप्त होता है जो प्रतिजैविक विशेषताओं से भरा होता है। इसके अलावा इसमें प्रोटीन, एन्ज़ाइम तथा विटामिन बी, सैपोनिन, फ्लैवोनॉइड आदि पदार्थ पाये जाते हैं।

भूमि तथा जलवायु:

लहसुन की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है लेकिन इसके लिये प्रचुर जीवांश और अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी सर्वोतम है। लहसुन की वृद्धि के लिये तुलनात्मक दृष्टि से ठंडा व नम जलवायु उपयुक्त रहता है। गर्म व बड़े दिन पौधे की वृद्धि पर विपरित प्रभाव डालते हैं। परन्तु कंद बनने क लिये लंबे व शुष्क दिन फायदेमंद हैं। परन्तु कंदों के बनने के बाद यदि तापमान कम हो जाये तो कंदों का विकास और अधिक अच्छा होगा, एवं कन्दों के विकास के लिये अधिक समय उपलब्ध होगा, अत: उनका विकास अच्छा होगा तथा उपज बढ़ेगी।

खेत की तैयारी :

लहसुन की जड़ें भूमि की ऊपरी सतह से करीब 15 सेमी गहराई तक ही सीमित रहती है अत: भूमि की अधिक गहरी जुताई की आवश्यकता नहीं है, इसलिये दो जुताई करके, हेरो चलाकर भूमि को भुरभुरा करके खरपतवार निकालकर, समतल कर देना चाहिए। जुताई के समय भूमि में उपयुक्त मात्रा में नमी आवश्यक है अन्यथा पलेवा देकर जुताई करें।

उन्नत किस्में:

लाडवा, मलेवा, एग्रीफांउड व्हाइट, आर जी एल-1, यमुना सफेद-3 एवं गारलिक 56-4 नामक किस्में अच्छी पैदावार देती है। लहसुन का चूर्ण बनाने के लिये बड़े आकार की लौंग वाली गुजरात की जामनगर व राजकोट किस्मों को उपयुक्त माना गया है।

खाद एवं उर्वरक:

खेत की तैयारी के समय 20-25 टन प्रति हेक्टर गोबर खाद खेत में मिला देनी चाहिये क्योंकि जैविक खाद का लहसुन की उपज पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा 50 किलो नत्रजन, 60 किलो फॉस्फोरस व 100 किलो पोटाश प्रति हेक्टर बुवाई के समय दें व 50 किलो नत्रजन बुवाई के 30 दिन बाद दें।

बीज व बुवाई:

लहसुन की बुवाई के लिये अच्छी किस्म के स्वस्थ बड़े आकार के आकर्षक कंदों की कलियों को अलग-अलग करके बुवाई के काम में लें। बुवाई हेतु प्रति हेक्टर 500 किलो कलियों की आवश्यकता होती है। इसकी बुवाई (रोपाई) कतारों में 15 से.मी. की दूरी पर करें व पौधे से पौधे की दूरी 7-8 से.मी. एवं गहराई 5 से.मी. ही रखें। इसकी बुवाई का उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक का है। भूमि का तापमान 300 से ज्यादा होने पर कलियों में सडऩ उत्पन्न हो सकती है।

सिंचाई एवं निराई गुड़ाई:

लहसुन की कलियों की बुवाई के बाद एक हल्की सिंचाई करनी चाहिये इसके पश्चात वानस्पतिक वृद्धि व कंद बनते समय 7-8 दिन के अन्तराल से व फसल के पकने की अवस्था में करीब 12 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें। सिंचाई के लिये क्यारी ज्यादा बड़ी नहीं बनावें। पकने पर पत्तियां सूखने लगे तब सिंचाई बंद कर देंं। जिस क्षेत्र में पानी भरता हो उसमें पैदा हुये कंद अधिक समय तक संग्रह नहीं किये जा सकते। खरपतवार नष्ट करने के लिये निराई गुडाई आवश्यक है। गुड़ाई गहरी नहीं करें। इस फसल में निराई गुड़ाई अन्य फसलों की तुलना में कठिन है क्योंकि पौधे पास-पास में होते हैं। अत: खरपतवार नाशी रसायनों का उपयोग किया जा सकता है। इसके लिये अंकुरण के पूर्व प्रति हैक्टर 150 ग्राम आक्सीफ्लूरफेन (600 ग्राम गोल) अथवा पेंडिमिथालिन 1 किलो सक्रिय तत्व (3.3 लीटर स्टॉम्प) का पानी में घोल बनाकर छिड़कावव अंकुरण पश्चात ऑक्साडायाजोन 1 किलो प्रति हेक्टर का पानी में घोल बनाकर छिड़का व करें या 25 से 30 दिन पर एक गुड़ाई करें।
लहसुन के पकाव की पहचान पत्तियाँ पीली पडऩे लगे (फसल बुवाई के 4-5 माह बाद), कंद दबाने से नहीं दबे एवं कंद में 80 प्रतिशत कलियां बनी हुई दिखाई पड़े तब समझें लहसुन पक गया है। कुछ कंद जमीन से निकालकर 2-3 दिन छाया में रखें अगर वह नीला पड़ जाय तो समझेंअभी वह नहीं पका है, दो-चार दिन खेत में लहसुन खड़ा रहने देें।

खुदाई एवं उपज :

लहसुन खुदाई के वक्त भूमि में थोड़ी नमी रहनी चाहिये जिससे कंद आसानीसे बिना क्षति पहुंचाये निकाले जा सकें। कंदों को पत्तियों सहित निकालने के तुरन्त बाद कंद पर लगी मिट्टी उतार दें तथा छोटे-छोटे बंडल बनावें एवं छाया में सुखा देना चाहिये तथा सूखी पत्तियाँ अलग कर देनी चाहिये। यदि फर्श पर सुखाना पड़े तो कंदों कोसमय-समय पर पलटना चाहिये।
यदि कंदों को उनकी पत्तियों द्वारा गुच्छों में बांध कर किन्हीं अवलंबों पर लटका कर सुखाया जाय तो उत्तम रहेगा। इससे लगभग 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

Tuesday, 24 October 2017

ग्वारपाठा की खेती

ग्वारपाठा की खेती (Farming of aloevera)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Farming-of-aloevera.html



ग्वारपाठा, घृतकुमारी या एलोवेरा जिसका वानस्पतिक नाम एलोवेरा बारबन्डसिस हैं तथा लिलिऐसी परिवार का सदस्य है। इसका उत्पत्ति स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है। एलोवेरा को विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है, हिन्दी में ग्वारपाठा, घृतकुमारी, घीकुंवार, संस्कृत में कुमारी, अंग्रेजी में एलोय कहा जाता है। एलोवेरा में कई औषधीय गुण पाये जाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों के उपचार में आयुर्वेदिक एंव युनानी पद्धति में प्रयोग किया जाता है जैसे पेट के कीड़ों, पेट दर्द, वात विकार, चर्म रोग, जलने पर, नेत्र रोग, चेहरे की चमक बढ़ाने वाली त्वचा क्रीम, शेम्पू एवं सौन्दर्य प्रसाधन तथा सामान्य शक्तिवर्धक टॉनिक के रूप में उपयोगी है। इसके औषधीय गुणों के कारण इसे बगीचों में तथा घर के आस पास लगाया जाता है। पहले इस पौधे का उत्पादन व्यावसायिक रूप से नहीं किया जाता था तथा यह खेतों की मेढ़ में नदी किनारे अपने आप ही उग जाता है। परन्तु अब इसकी बढ़ती मांग के कारण कृषक व्यावसायिक रूप से इसकी खेती को अपना रहे हैं, तथा समुचित लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

एलोवेरा के पौधे की सामान्य उंचाई 60-90 सेमी. होती है। इसके पत्तों की लंबाई 30-45 सेमी. तथा चौड़ाई 2.5 से 7.5 सेमी. और मोटाई 1.25 सेमी. के लगभग होती है। एलोवेरा में जड़ के ऊपर जो तना होता है उसके उपर से पत्ते निकलते हैं, शुरूआत में पत्ते सफेद रंग के होते हैं। एलोवेरा के पत्ते आगे से नुकीले एवं किनारों पर कटीले होते हैं। पौधे के बीचो बीच एक दण्ड पर लाल पुष्प लगते हैं। हमारे देश में कई स्थानों पर एलोवेरा की अलग- अलग प्रजातियां पाई जाती हैं। जिसका उपयोग कई प्रकार के रोगों के उपचार के लिये किया जाता है। इसकी खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसान भाई निम्न बातें ध्यान में रखे:-

जलवायु एवं मृदा

यह उष्ण तथा समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। कम वर्षा तथा अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जा सकती है। इसकी खेती किसी भी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। इसे चट्टानी, पथरीली, रेतीली भूमि में भी उगाया जा सकता है, किन्तु जलमग्न भूमि में नहीं उगाया जा सकता है। बलुई दोमट भूमि जिसका पी.एच. मान 6.5 से 8.0 के मध्य हो तथा उचित जल निकास की व्यवस्था हो उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी

ग्रीष्मकाल में अच्छी तरह से खेत को तैयार करके जल निकास की नालियां बना लेना चाहिये तथा वर्षा ऋतु में उपयुक्त नमी की अवस्था में इसके पौधें को 50 & 50 सेमी. की दूरी पर मेढ़ अथवा समतल खेत में लगाया जाता है। कम उर्वर भूमि में पौधों के बीच की दूरी को 40 सेमी. रख सकते हैं। जिससे प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या लगभग 40,000 से 50,000 की आवश्यकता होती है। इसकी रोपाई जून-जुलाई माह में की जाती है। परन्तु सिंचित दशा में इसकी रोपाई फरवरी में भी की जा सकती है।

निराई - गुडाई

प्रारंभिक अवस्था में इसकी बढ़वार की गति धीमी होती है। अत: प्रारंभिक तीन माह तक में 2-3 निंदाई गुड़ाई की आवश्यकता होती है। क्योंंकि इस काल मे विभिन्न खरपतवार तेजी से वृद्धि कर ऐलोवेरा की वृद्धि एवं विकास पर विपरीत असर डालते हैं। 8 माह के बाद पौधे पर मिट्टी चढ़ाएं जिससे वे गिरे नहीं ।

खाद एवं उर्वरक

सामान्यतया एलोवेरा की फसल को विशेष खाद अथवा उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु अच्छी बढ़वार एवं उपज के लिए 10-15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद को अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिला देना चाहिए । इसके अलावा 50 किग्रा. नत्रजन, 25 किग्रा. फास्फोरस एवं 25 किग्रा. पोटाश तत्व देना चाहिये । जिसमे से नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी रोपाई के समय तथा शेष नत्रजन की मात्रा 2 माह पश्चात् दो भागों में देना चाहिए अथवा नत्रजन की शेष मात्रा को दो बार छिड़काव भी कर सकते हैं।

सिंचाई

एलोवेरा असिंचित दशा में उगाया जा सकता है। परन्तु सिंचित अवस्था में उपज में काफी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकाल में 20-25 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करना उचित रहता है। सिंचाई जल की बचत करके एवं अधिक उपयोग करने के लिये स्प्रिंकलर या ड्रिप विधि का उपयोग कर सकते हैं।

पौध संरक्षण

इस फसल में साधारणतया कोई कीड़े अथवा रोग का प्रकोप नहीं होता है। परन्तु भूमिगत तनों व जड़ों को ग्रब नुकसान पहुंचाते हैं। जिसकी रोकथाम के लिये 60-70 किलोग्राम नीम की खली प्रति हेक्टर के अनुसार दें अथवा 20-25 किग्रा. क्लोरोपायरीफॉस डस्ट प्रति हेक्टर का भुरकाव करें । वर्षा ऋतु में तनों एवं पत्तियों पर सडऩ एवं धब्बे पाये जाते हैं, जो फफूंदजनित रोग है। जिसके उपचार के लिये मेन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना उपयुक्त रहता है।

अंतरवर्तीय फसल

एलोवेरा की खेती अन्य फल वृक्ष औषधीय वृक्ष या वन में रोपित पेड़ों के बीच में सफलतापूर्वक की जा सकती है।

कटाई एवं उपज

इस फसल की उत्पादन क्षमता बहुत अधिक हैं फसल की रोपाई के बाद एक वर्ष के बाद पत्तियां काटने लायक हो जाती है। इसके बाद दो माह के अन्तराल से परिपक्व पत्तियों को काटते रहना चाहिए। सिंचित क्षेत्र मे प्रथम वर्ष में 35-40 टन प्रति हेक्टर उत्पादन होता है। तथा द्वितीय वर्ष में उत्पादन 10-15 फीसदी तक बढ़ जाता है। उचित देखरेख एवं समुचित पोषक प्रबंधन के आधार पर इससे लगातार तीन वर्षों तक उपज ली जा सकती है। असिंचित अवस्था में लगभग 20 टन प्रति हेक्टर उत्पादन मिल जाता है।

प्रवर्धन विधि एवं रोपाई

इसका प्रवर्धन वानस्पतिक विधि से होता है। व्यस्क पौधों के बगल से निकलने वाले चार पांच पत्तियों युक्त छोटे पौधे उपयुक्त होते हैं, प्रारंभ में ये पौधे सफेद रंग के होते हैं, तथा बड़े होने पर हरे रंग के हो जाते हैं। इन स्टोलन/सर्कस को मातृ पौधे से अलग करके नर्सरी या सीधे खेत में रोपित करते हैं।

Tuesday, 26 September 2017

सतावर की खेती

सतावर की खेती

https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/Asparagus-farming.html         / Asparagus racemosus /  शतावर , शतावरी , सतावरी , सतमूल और सतमूली



सतावर (वानस्पतिक नाम: Asparagus racemosus / ऐस्पेरेगस रेसीमोसस) लिलिएसी कुल का एक औषधीय गुणों वाला पादप है। इसे 'शतावर', 'शतावरी', 'सतावरी', 'सतमूल' और 'सतमूली' के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत, श्री लंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। 
इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है। इसकी जड़ें गुच्छों के रूप में होतीं हैं। वर्तमान समय में इस पौधे पर लुप्त होने का खतरा है।
एक और काँटे रहित जाति हिमलाय में 4 से 9 हजार फीट की ऊँचाई तक मिलती है, जिसे एस्पेरेगस फिलिसिनस नाम से जाना जाता है।

ह 1 से 2 मीटर तक लंबी बेल होती है जो हर तरह के जंगलों और मैदानी इलाकों में पाई जाती है। 
आयुर्वेद में इसे ‘औषधियों की रानी’ माना जाता है। इसकी गांठ या कंद का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जो महत्वपूर्ण रासायनिक घटक पाए जाते हैं वे हैं ऐस्मेरेगेमीन ए नामक पॉलिसाइक्लिक एल्कालॉइड, स्टेराइडल सैपोनिन, शैटेवैरोसाइड ए, शैटेवैरोसाइड बी, फिलियास्पैरोसाइड सी और आइसोफ्लेवोंस। सतावर का इस्तेमाल दर्द कम करने, महिलाओं में स्तन्य (दूध) की मात्रा बढ़ाने, मूत्र विसर्जनं के समय होने वाली जलन को कम करने और कामोत्तेजक के रूप में किया जाता है। 
इसकी जड़ तंत्रिका प्रणाली और पाचन तंत्र की बीमारियों के इलाज, ट्यूमर, गले के संक्रमण, ब्रोंकाइटिस और कमजोरी में फायदेमंद होती है। 
यह पौधा कम भूख लगने व अनिद्रा की बीमारी में भी फायदेमंद है। अतिसक्रिय बच्चों और ऐसे लोगों को जिनका वजन कम है, उन्हें भी ऐस्पैरेगस से फायदा होता है। इसे महिलाओं के लिए एक बढ़िया टॉनिक माना जाता है। 
इसका इस्तेमाल कामोत्तेजना की कमी और पुरुषों व महिलाओं में बांझपन को दूर करने और रजोनिवृत्ति के लक्षणों के इलाज में भी होता है।

सतावर जड़ वाली एक औषधीय फसल है जिसकी मांसल जड़ों का इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण में होता है। सतावर को लोग भिन्न-भिन्न नाम से पुकारते हैं। अंग्रेज लोग इसे एस्पेरेगस कहते हैं। कहीं इसे लोग शतमली तो कहीं शतवीर्या कहते हैं। सतावर कहीं वहुसुत्ता के नाम से विख्यात है तो कहीं यह शतावरी के नाम से भी। 
यह औषधीय फसल भारत के विभिन्न प्रांतों में प्राकृतिक अवस्था में भी खूब पाई जाती है। विश्व में सतावर भारत के अतिरिक्त ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, चीन, बांग्लादेश तथा अफ्रीका में भी पाया जाता है। सतावर का प्रयोग मुख्य रूप से औषधि के रूप में किया जाता है। इसका इस्तेमाल बलवर्धक, स्तनपान करने वाली महिलाओं के लिए लाभकारी दवाइयों व शारीरिक स्फूर्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसके साथ-साथ सतावर के नियमित सेवन से ल्युकोरिया व एनीमिया जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है।

सतावर का वानस्पतिक विवरण

सतावर का पौधा झाड़ीदार, कांटेदार लता होता है। इसकी शाखाएं पतली होती हैं। पत्तियां सुई के समान होती हैं जो 1.5-2.5 सेमी तक लम्बी होती हैं। इसके कांटे टेढ़े तथा 6-8 सेंमी लम्बे होते हैं। इसकी शाखाएं चारों ओर फैली होती हैं। इसके फूल सफेद या गुलाबी रंग के सुगंधयुक्त, छोटे, अनेक शाखाओं वाले डंठल पर लगते हैं जो फरवरी और मार्च में फूलते हैं। अप्रैल में फल बढ़कर बड़े-बड़े हो जाते हैं। फल मटर के समान 1-2 बीज युक्त होते हैं। इसके बीज पकने पर काले होते हैं। इसकी जड़े कन्दवत 20-30 सेंमी लम्बी, 1-2 सेंमी मोटी तथा गुच्छे में पैदा होती हैं। जड़ों की संख्या प्रति लता में 60-100 तक होती है। ये जड़े धूसर पीले रंग की हल्की सुगंधयुक्त स्वाद में कुछ मधुर तथा कड़वी लगती हैं। मांसल जड़ों को आदिवासी लोग पूरे पकने पर चाव से खाते हैं। यह सूखने पर भी प्रयोग में लाई जाती हैं। इन्हीं श्वेत जड़ों का प्रयोग चिकित्सा कार्य हेतु होता है। सूखी जड़े बाजार में सतावर के नाम से बेची जाती है। जिसमें सतावरिन-1 तथा सतावरिन-4 में ग्लूकोसाइड रसायन प्रमुख रूप से पाया जाता है। यही रसायन इसके औषधीय गुणों का स्रोत है।

कैसे करें खेती 

सतावर की खेती के लिए मध्यम तापमान अच्छा माना जाता है। खेती के लिए उचित तापमान 10 से 50 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसकी खेती के लिए जुलाई-अगस्त में 2-3 बार खेत की पहली जुताई कर लेनी चाहिए। इसमें प्रति एकड़ के दर से 10 टन गोबर की खाद मिला देनी चाहिए। दूसरी जुताई नवंबर के शुरुआती दिनों में होती है।

 पौध की तैयारी

जोते गए खेत में 10 मीटर की क्यारियां बनाकर इसमें 4 और 2 के अनुपात में मिट्टी व गोबर की खाद मिलाकर डालनी चाहिए। प्रति एकड़ पांच किलोग्राम बीज की ज़रूरत होती है। अगस्त में ही क्यारियों में बीजों की बुआई कर देनी चाहिए सतावर के बीजों की खरीद के बारे वीरेंद्र बताते हैं, ''यूं तो सतावर की कई प्रजातियां पाई जाती हैं पर मुख्य रूप से दो प्रजातियों (पिली या नैपाली सतावर, बेल या देसी सतावर) को बोया जाता है। इसके बीच निजी दुकानों व सीमैप से आसानी से मिल जाते हैं।" एक हेक्टेयर के खेत में 3 से 4 किलो सतावर के बीज डाले जाते हैं। बाज़ार में इसका मूल्य 1000 रुपए प्रति किलो के हिसाब से है।

 सिंचाई 

सतावर की खेती में ज़्यादा पानी की ज़रुरत नहीं होती है। पौधे लगाने के एक सप्ताह के भीतर हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। यह सिंचाई पौधों के लिए पर्याप्त होती है। दूसरी हल्की सिंचाई पौधों के बड़े होने के बाद करनी चाहिए।
सतावर की खेती में सही समय पर खुदाई बेहद जरूरी होती है 'दूसरी सिंचाई के बाद जब पौध पीली पडऩे लगें तब इसकी रसदार जड़ों की खुदाई कर लेनी चाहिए। इसी समय किसान दूसरी फसल के लिए खेत तैयार कर सकता है।"

निराई-गुड़ाई

 सतावर के पौधों की जड़ों के समुचित विकास के लिए खेत को खरपतवार रहित रखना तथा मिट्टी को भुरभुरी बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए एक दो निराई-गुड़ाई आवश्यक है। निराई-गुड़ाई के दरम्यान पौधों की जड़ों पर हल्की मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

खोदी जड़ों को सुखाना जरूरी

खोदकर निकाली गई रसदार जड़ों को साफ  कर अलग-अलग करके हल्की धूप में सुखने के लिए छोड़ देना चाहिए। 

सतावर का बाज़ार

प्रति एकड़ के खेत में 300 से 350  क्विंटल गीली जड़ मिलती है जो सूखने के बाद 40 से 50 क्विंटल प्राप्त होती है । वर्तमान समय में सतावर की जड़ 250 से 300 रुपए प्रति किलो के रेट पर बिकती है।


Saturday, 23 September 2017

कैसे उगाए : हल्दी





https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/how-to-grow-turmeric.html   / turmeric plant photos / haldi photos




हल्दी जिंजिवरेंसी कुल का पौधा हैं। इसका का वानस्पतिक नाम कुर्कमा लांगा हैं। इसकी उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशिया में हुई हैं। हल्दी का उपयोग प्राचीनकाल से विभिन्न रूपों में किया जाता आ रहा हैं, क्योंकि इसमें रंग महक एवं औषधीय गुण पाये जाते हैं। हल्दी में जैव संरक्षण एवं जैव विनाश दोनों ही गुण विद्यमान हैं, क्योंकि यह तंतुओं की सुरक्षा एवं जीवाणु (वैक्टीरिया) को मारता है। इसका उपयोग औषधीय रूप में होने के साथ-साथ समाज में सभी शुभकार्यों में इसका उपयोग बहुत प्राचीनकाल से हो रहा है। वर्तमान समय में प्रसाधन के सर्वोत्तम उत्पाद हल्दी से ही बनाये जा रहे हैं। हल्दी में कुर्कमिन पाया जाता हैं तथा इससे एलियोरोजिन भी निकाला जाता हैं। हल्दी में स्टार्च की मात्रा सर्वाधिक होती हैं। इसके अतिरिक्त इसमें 13.1 प्रतिशत पानी, 6.3 प्रतिशत प्रोटीन, 5.1 प्रतिशत वसा, 69.4 प्रतिशत कार्बाेहाइड्रेट, 2.6 प्रतिशत रेशा एवं 3.5 प्रतिशत खनिज लवण पोषक तत्व पाये जाते हैं। इसमें वोनाटाइन आॅरेंज लाल तेल 1.3 से 5.5 प्रतिशत पाया जाता हैं।



भारत विश्व में सबसे बड़ा हल्दी उत्पादक देश है। भारत में हल्दी का विभिन्न रूपों में निर्यात जापान, फ्रांस यू.एस.ए., यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, नीदरलैंड, सउदी अरब एवं आस्ट्रेलिया को किया जाता है। म.प्र. में हल्दी का क्षेत्र बहुत कम है, परंतु यहां पर इसके क्षेत्र एवं उत्पादन वृद्धि की प्रबल संभावना हैं।

जलवायु:-

हल्दी एक मसाला फसल है, जिस क्षेत्र में 1200 से 1400 मि.मी. वर्षा, 100 से 120 वर्षा दिनों में प्राप्त होती
है, वहां पर इसकी अति उत्तम खेती होती है। समुद्र सतह से 1200 मीटर ऊंचाई तक के क्षेत्रों में यह पैदा की जाती है, परंतु हल्दी की खेती के लिए 450 से 900 मीटर ऊंचाई वाले क्षेत्र उत्तम होते हैं। हल्दी एक उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की फसल हैं। हल्दी के लिए 30 से 35 डिग्री से.मी. अंकुरण के समय, 25 से 30 डिग्री से.मी. कल्ले निकलने 20 से 30 डिग्री से.मी. प्रकंद बनने तथा 18 से 20 डिग्री से.मी. हल्दी की मोटाई हेतु उत्तम है।

मृदा:-

हल्दी का उत्पादन सभी प्रकार की मिट्टी में किया जा सकता हैं, परंतु जल निकास उत्तम होना चाहिए। इसका पीएच 5 से 7.5 होना चाहिए। हल्दी की खेती करने के लिए दोमट, जलोढ़, लैटेराइट मिट्टी, जिसमें जीवांश की मात्रा अधिक हो, वह इसके लिए अति उत्तम है। पानी भरी मिट्टी इसके लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त होती है।

प्रजातियां –

1. सी.एल. 326 माइडुकुर:-
लीफ स्पाॅट बीमारी की अवरोधक प्रजाति है, लम्बे पंजे वाली, चिकनी, नौ माह में तैयार होती है। उत्पादन क्षमता 200-300 क्विं./हेक्टेयर तथा सूखने पर 19.3 प्रतिशत हल्दी मिलती हैं।
2. सी.एल. 327 ठेकुरपेन्ट:-
इसके पंजे लम्बे, चिकने एवं चपटे होते हैं। परिपक्वता अवधि 5 माह तथा उत्पादन क्षमता 200-250 क्विं./हेक्टर सूखने पर 21.8 प्रतिशत हल्दी प्राप्त होती हैं।
3. कस्तूरी:-
यह शीघ्र (7 माह) में तैयार होती हैं। इसके पंजे पतले एवं सुगन्धित होते हैं। उत्पादन 150-200 क्विं./
हेक्टेयर 25 प्रतिशत सूखी हल्दी मिलती हैं।
4. पीतांबरा:-
यह राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित है, यह अधिक उत्पादन देती है। आई.सी.ए.आर. द्वारा स्थापित हाई अल्टीट्यूट अनुसंधान केन्द्र पोटांगी (उड़ीसा) द्वारा उत्पादन की गई प्रजातियां निम्नलिखित हैं जो म.प्र. के लिए उपयुक्त हैं।
रोमा:-
यह किस्म 250 दिन में परिपक्व होती हैं। उत्पादन 207 क्विंटल/हेक्टेयर शुष्क हल्दी 31.1 प्रतिशत, ओलियोरोजिन 13.2 प्रतिशत इरोन्सियल आयल 4.4 प्रतिशत सिंचित एवं असिंचित दोनों के लिए उपयुक्त होती हैं।
सूरमा:-
इसकी परिपक्वता अवधि 250 दिन एवं उत्पादन 290 क्विं./हे. शुष्क हल्दी 24.8 प्रतिशत, ओलियोरोजीन 13.5 प्रतिशत, इरोन्सियल आॅयल 4.4 प्रतिशत उपयुक्त होती हैं।
सोनाली:-
इसकी अवधि 230 दिन, उत्पादन 270 क्विंटल/हे. शुष्क हल्दी 23 प्रतिशत, ओलियोरोजिन 114 प्रतिशत
इरोन्सियल आयल 4.6 प्रतिशत होता हैं। इस वर्ग की कोयम्बटूर-1, 35 एन, पीटीएस-43, पीसीटी-8 जातियां भी हैं। इसके अतिरिक्त दवा के लिए सफेद हल्दी कर्कुमा अमाड़ा एवं प्रसाधन सामग्री हेतु कुर्कुमा एरोमोटिका की भी कई जातियां तैयार की गयी हैं।

रोपण का समय:-

हल्दी के रोपण का उचित समय अप्रैल एवं मई का होता है।

खेत की तैयारी एवं बोने की विधि एवं प्रकंद की मात्रा:-

खेत की बुआई करने से पहले उसकी 4-5 जुताई कर, उसे पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरा एवं समतल कर लिया जाना चाहिए। पूर्व फसल के अवशेषों को अलग कर दिया जाना चाहिए। हल्दी रोपण हेतु 15 से.मी. ऊंची, एक मीटर चैड़ी तथा सुविधानुसार लम्बी (3-4 मीटर) क्यारियां, 30 से.मी. की दूरी पर क्यारी से क्यारी रख कर बना लेना चाहिए। यदि खेत में नेमोटोड की समस्या हो तो प्लास्टिक सोलेराइजेशन अप्रैल के महीने में ही कर लें, तभी क्यारियां बनाएं। हल्दी का रोपण प्रकन्द (राइजोम) से होता है, जिसमें 20 से 25 क्विंटल प्रकन्द प्रति हेक्टर लगता है। प्रत्येक प्रकन्द में कम से कम 2-3 आॅंखे होना चाहिए। प्रकन्दों को 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल, एम-45 घोल में कम से कम 30 मिनिट तक डुबोकर उपचारित करें, कटे-सड़े एवं सूखे तथा अन्य रोग से ग्रसित प्रकन्दों को छांटकर पृथक कर लेना चाहिए। ध्यान रखें कि एक वजन, आकार के कंद एक कतार में लगाएं अन्यथा छोटा-बड़ा प्रकन्द लगाने पर पौधे की बढ़वार समान नहीं हो पाती है। 5 से.मी. गहरी नाली में 30 से.मी. कतार से कतार तथा 20 से.मी. प्रकंद की दूरी रखकर रोपण करें। मदर राइजोम को ही बीज के रूप में उपयोग करना चाहिए। रोपण के बाद मिट्टी से नाली को ढॅंक दें।

सिंचाई:-

हल्दी की फसल में 20-25 हल्की सिंचाई की जरूरत पड़ती हैं। गर्मी में 7 दिन के अन्तर पर तथा शीतकाल में 15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिए।

खाद, उर्वरक मल्चिंग एवं अन्तः कर्षण क्रियाएं:-

हल्दी की फसल को जीवांश खाद की काफी आवश्यकता रहती है। 25 टन कम्पोस्ट या गोबर की खूब सड़ी हुई खाद प्रति हेक्टर की दर से जमीन में मिला देना चाहिए। रासायनिक उर्वरक नत्रजन-60 किग्रा., स्फुर 30 किग्रा. एवं पोटाश 90 किग्रा. प्रति हेक्टर आवश्यक हैं। स्फुर की पूरी मात्रा एवं पोटाश आधी मात्रा रोपण के समय जमीन में मिला लें। नत्रजन की आधी मात्रा 45 दिन रोपण के बाद और शेष आधी नत्रजन एवं पोटाश की मात्रा 90 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय डालें।
हल्दी रोपण के बाद 12.5 टन/हेक्टर की दर से हरी पत्ती, सूखी घास या अन्य जैविक अवरोध परत क्यारियों के ऊपर फैला देना चाहिए। दूसरी एवं तीसरी अन्य 5 टन प्रति हेक्टर की दर से छिड़काव कर देने के बाद किसी भी अवरोध परत पदार्थ को बिछा दें। तीन-चार बार निंदाई करें, क्योंकि इसको ग्रीष्मकाल में लगाते हैं, जिससे पानी काफी देना पड़ता हैं, जिससे खरपतवार काफी उग आते हैं । अक्टूबर के बाद भी सिंचाई करते हैं, जिससे उत्पादन अच्छा होता हैं।

हल्दी की मिश्रित खेती या अन्तरवर्ती फसल:-

मैदानी क्षेत्र में मिर्च एवं अन्य फसलों के साथ मुख्यतया सब्जी वाली फसलों में इसे मिश्रित फसल के रूप में लगाया जाता हैं। इसे अरहर, सोयाबीन, मूंग, उड़द की फसल के साथ भी लगाया जा सकता है। अन्तरवर्ती फसल के रूप में बगीचों में जैसे आम, कटहल, अमरूद, चीकू, केला फसल के लाभ का अतिरिक्त आय प्राप्त की जाती है।

हल्दी फसल के प्रमुख कीट एवं व्याधियां: –

शूटबोरर:- यह कीट हल्दी के स्युडोस्टेम (तना) एवं प्रकंद में छेद कर देता हैं। इससे पौधों में भोज्य सामग्री आदि तंतुओं के नष्ट होने से सुचारू रूप से प्रवाह नहीं कर पाती है तथा कमजोर होकर झुक जाता है। इसका नियंत्रण 0.05 प्रतिशत डाइमिथोएट या फास्फोमिडान का छिड़काव करने से किया जावे।
साॅफ्टराट:-
हल्दी की यह काफी क्षति पहंुचाने वाली बीमारी है। यह बीमारी पीथियमस्पेसीन के प्रकोप से होती है। इसके
प्रकोप से प्रकन्द सड़ जाता है। नियंत्रण के लिए 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल एम-45 से मिट्टी की ड्रेंचिंग करें। रोपण के
पहले प्रकन्द का उपचार करके ही लगायें।
लीफ स्पाट:- यह बीमारी कोलिटोट्राइकम स्पेसीज फफूंद के कारण होती हैं। इसमें छोटे अण्डाकार अनियमित या नियमित भूरे रंग के धब्बे पत्तियों पर दोनों तरफ पड़ जाते हैं, जो बाद में धूमिल पीली या गहरे भूरे रंग के हो तो सावधानी बतौर बीमारी के प्रकोप के पूर्व ही 1 प्रतिशत बोर्डाे मिश्रण का छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर सितंबर के प्रथम सप्ताह में करें।

फसल की खुदाई:-

हल्दी फसल की खुदाई 7 से 10 माह में की जाती है। यह बोई गयी प्रजाति पर निर्भर करता है।
प्रायः जनवरी से मार्च के मध्य खुदाई की जाती है। जब पत्तियां पीली पड़ जाये तथा ऊपर से सूखना प्रारंभ कर दे। खुदाई के पूर्व खेत में घूमकर परीक्षण कर ले कि कौन-कौन से पौधे बीमारी युक्त है, उन्हें चिंहित कर अलग से खुदाई कर अलग कर दें तथा शेष को अलग वर्ष के बीज हेतु रखें।

बीज सामग्री का भंडारण:-

खुदाई कर उसे छाया में सुखा कर मिट्टी आदि साफ करें। प्रकंदों को 0.25 प्रतिशत इण्डोफिल एम-45 या
0.15 प्रतिशत बाविस्टीन एवं 0.05 प्रतिशत मैलाथियान के घोल में 30 मिनिट तक उपचारित करें। इसे छाया में सुखाकर रखें। हल्दी भंडारण के लिए छायादार जगह पर एक मीटर चैड़ा, 2 मीटर लम्बा तथा 30 से.मी. गहरा गड्ढा खोदें। जमीन की सतह पर धान का पुआल या रेत 5 से.मी. नीचे डाल दें। फिर उस पर हल्दी के प्रकन्द रखें इसी प्रकार रेत की दूसरी सतह बिछा कर हल्दी की तह मोड़ाई करें। गड्ढा भर जाने पर मिट्टी से ढॅंककर गोबर से लीप दें।

हल्दी की क्योरिंग:-

हल्दी के प्रकन्दों को सूखा लेना चाहिए तथा उसके ऊपर की गंदगी साफ करके कड़ाहे में उबलने के लिए डालंे। फिर उसे कड़ाहे में चूने के पानी या सोडियम बाई कार्बनेट के पानी में घोल लें। पानी की मात्रा उतनी ही डालें जिससे पानी ढॅंक जावे। उसे 45 से 60 मिनट तक उबाले जब सफेद झाग आने लगे तथा उसमें से जब विचित्र महक आने लगती है, तब उसे अलग से पृथक करें। आजकल सोलर ड्रायर भी हल्दी के लिए बनाये गये हैं। उसे पानी से निकाल कर अलग करें। हल्दी जो कि उबल कर मुलायम हो गयी है या नहीं। खुदाई के 2 दिन बाद ही उबालना चाहिए। फिर उसे 10-15 दिन सुखाएं।

हल्दी का सुखाना:-

उबली हुई हल्दी को बांस की चटाई पर रोशनी में 5-7 से.मी. मोटी तह पर सुखायें। शाम को ढॅंककर रख दें। 10-15 दिन पूर्णतया सूख जाने से ड्रायर के 60 डिग्री से. पर सुखाते हैं। सूखने के बाद तक उत्पाद प्राप्त होता हैं।
पालिशिंग:- हल्दी का बाहरी भाग खुरदरा तथा छिलके वाला दिखाई देता है। इसीलिए उसे चिकना तथा एक समान
बनाने के लिए हाथ से आदमियों द्वारा पालिश करते है। बोरियों में भरकर उसे रगड़ा जाता है। आजकल पालिशिंग
ड्रम बनाये गये हैं, उसमें भी पालिश करते हैं। हल्दी को रंगने के लिए 1 किलोग्राम हल्दी को पीस कर उससे एक क्विंटल हल्दी को रंगा जा सकता है, जिससे यह ऊपर से एक समान पीले रंग की दिखाई देती है।

हल्दी से बनने वाले उत्पाद:-

1.  हल्दी का पाउडर जो मसाले के काम आता हैं।
2.  
हल्दी का आयल:-
हल्दी में 3 से 5 प्रतिशत बोलाटाइल आयल (तेल) निकलता हैं जो स्टीम डिस्टीलेशन द्वारा निकाला जाता हैं।
यह हल्दी पाउडर से निकाला जाता हैं। तेल 8 से 10 घंटे में धीरे-धीेरे निकलता हैं।


3.   टर्मकेरिक ओलियोरोजिन:-


यह साल्वेन्टर एक्सट्रेक्शन विधि से निकाला जाता है। इसकी कीमत कर्कुमिन की मात्रा के ऊपर निर्भर करती हैं।


हल्दी का उपयोग:-



1. भोजन में सुगन्ध एवं रंग लाने में, बटर, चीज, अचार आदि भोज्य पदार्थों में इसका उपयोग करते हैं। यह भूख बढ़ाने तथा उत्तम पाचक में सहायक होता हैं।
2. यह रंगाई के काम में भी उपयोग होता हैं।
3. दवाओं में भी उपयोग किया जाता हैं।
4. कास्मेटिक सामग्री बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता हैं।



Thursday, 21 September 2017

आँवला में लगने वाली मुख्य बीमारियां एवं उनके निदान

आँवला में लगने वाली मुख्य बीमारियां एवं उनके निदान (The main diseases and their diagnosis in Amla)



https://smartkhet.blogspot.com/2017/09/main-diseases-and-their-diagnosis-in-amla.html




आँवला में लगने वाले प्रमुख रोग टहनी झुलसा, पत्ती धब्बा रोग, रतुआ, सूटी मोल्ड, लाइकेन, ब्लू मोल्ड, श्यामवर्ण, गीली सड़न, काली गीली सड़न, फोमा फल सड़न रोग, निग्रोस्पोरा फल सड़न रोग , पेस्टालोसिआ फल सड़न रोग व इंटरनल नेक्रोसिस हैं। जिसके रोकथाम क उपाय संक्षेप में इस लेख में उलेखित हैं।

यह वृक्ष हिमालय में 1350 मीटर तक आरोही उष्णकटिबंधीय क्षेत्रो में पाया जाता हैं और पुरे भारत वर्ष में उगाया जाता हैं। यह वृक्ष यूफोर्बीआयसी कुल का सदस्य हैं जिसे इंडियन ग्रूज़ वेर्री नाम से भी जाना जाता हैं। संस्कृत में इसे अमृता, अमृतफल, आमलकी, पंचरसा इत्यादि, अंग्रेजी में इण्डियन गूजबेरी तथा लैटिन में 'फ़िलैंथस एँबेलिका' कहते हैं। फल और बीज विटामिन सी बीज की समृद्ध स्रोत हैं। पारंपरिक भारतीय चिकित्सा में, सूखे और वृक्ष के ताजा फलों और पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता हैं। वृक्ष के सभी भागों दीर्घायु को बढ़ावा देने के लिए, और पारंपरिक रूप से पाचन बढ़ाने के लिए, हृदय और जिगर एनीमिया, दस्त, पेचिश, नकसीर, आंखों में सूजन, पीलिया आदि में इस्तेमाल किया जा सकता हैं। इसमें विषाणूरोधी, जीवाणुरोधी और कवक विरोधी गुण होते  हैं। एंटीऑक्सीडेंट के रूप में आंवला का उपयोग अच्छी तरह से जाना जाता रहा हैं। इसके फल का उपयोग मुरब्बा, चटनी, आचार, रस तथा चूर्ण इतयादि बनाने के लिए किया जाता हैं। इससे च्यवनप्रास, त्रिफला,तेल आदि भी तैयार किया जाता हैं। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन सी पायी जाती हैं। आयुर्वेद के अनुसार हरीतकी (हरड़) और आँवला दो सर्वोत्कृष्ट औषधियाँ हैं। इन दोनों में आँवले का महत्व अधिक  हैं। चरक के मत से शारीरिक अवनति को रोकनेवाले अवस्थास्थापक द्रव्यों में आँवला सबसे प्रधान हैं। प्राचीन ग्रंथकारों ने इसको शिवा (कल्याणकारी), वयस्था (अवस्था को बनाए रखनेवाला) तथा धात्री (माता के समान रक्षा करनेवाला) कहा हैं।

इस अमूल्य औषधि को भी कई रोग ग्रसित करते हैं। पौधों की देख रेख नर्सरी से लेकर बड़े होने तक करनी आवश्यक हैं। जिससे उपज एवं गुणयुक्त फल प्राप्त होंगे कुछ गंभीर रूप से लगने वाले रोगो का विवरण निम्न लिखित दिया गया हैं:

1 आँवले का टहनी झुलसा


लक्षण


टहनी झुलसा रोग का संक्रमण बरसात के मौसम के दौरान आंवला पर दिखाई देता हैं। टहनियों का झुलसना और उप्पर से निचे की तरफ तने का सुखना इस रोग के मुख्य लक्षण हैं। अक्सर नर्सरी में इस रोग का 50% संक्रमण देखा गया हैं।

कारण जीव: डिप्लोडिआ थिओब्रोमईडी

नियंत्रण


नर्सरी में फसल को छायांकन से बचायें। कार्बेन्डाजिम (0.1%) या मैन्कोजेब या जिनेब @ 0.25% के निरंतर छिड़काव के साथ बगीचे में साफ-सफाई का ध्यान रखें।

2 आँवले का पत्ती धब्बा रोग


लक्षण


शुरआती लक्षण पत्तो पर बरसात के दिनों में पानीनुमा धब्बों के रूप दिखाई देते हैं। यह विक्षत् सामान्यतः २-३ से० मी० व्यास के होते हैं तथा पत्तो के सिरो से जले हुई दिखाए देते हैं। बाद में, धब्बे पत्ती की सतह पर संरचनाओं की तरह बिंदी के रूप में दिखाई देते हैं।

कारण जीव: कोलेटोट्रिईकम डेमाटीसियम

नियंत्रण


कैप्टॉन (0.2%) या कार्बेन्डाजिम (0.1%) का छिड़काव बीमारी को नियंत्रित करने के लिए लाभप्रद मन गया हैं।

3 आँवले का रतुआ 


लक्षण


इस रोग में पत्तियों, पुष्प शाखाओं तथा तने पर रतुआ रोग से नारंगी रंग के फफोले दिखाई देते हैं।

कारण जीव: रवेनेलिआ एम्ब्लिकै

नियंत्रण


जुलाई-सितंबर के दौरान डाईथेन-जेड 78 (0.2%) की वेटएबल सल्फर (0.4%) के तीन छिड़काव इस रोग को रोकने के लिए आवस्यक हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए मैंकोजेब (०.२५%), कन्टाफ (०.९%) का छिदवाव भी प्रभावी होता हैं।

4 आँवले का सूटी मोल्ड


लक्षण


सूटी मोल्ड पत्ते, टहनियाँ और फूल की सतह पर काली कवक विकास की मख़मली कवरिंग बनता हैं। ये केवल सतह तक ही सीमित हैं और पत्तियों में नहीं घुसता हैं। अक्सर रस चूसने वाले कीट इस रोग को फैलाते हैं जैसे तिला, सफ़ेद मख्खी आदि। उनके दवारा छोड़े जाने से यह कवक आसानी से आकर्षित होकर ऊपरी परत पर फैलने लगती हैं और ग्रसित सतह काले रंग में परिवर्तित हो जाती हैं।  

कारण जीव: काप्नोडियम प्रजाति

नियंत्रण


स्टार्च @ 2% का छिड़काव या लैम्ब्डा कयहलोथ्रिन @ 0.05% का छिड़काव इस रोग को रोकने में मददग़ार हैं और संक्रमण अधिक हैं, तो स्टार्च में वेटएबल सल्फर @ 0.2% मिला के छिडकाव करें।   

5 आँवले का लाइकेन

लक्षण


लाइकेन बड़े हो गए पेड़ के तने की सतह पर पाए जाते हैं। यह पेड़ के मुख्य तने और शाखाओं पर अलग अलग आकार के सफेद, गुलाबी, सतही पैच के रूप में देखें जाता हैं।

कारण जीव: सट्रीगुला एलिगेंस।

नियंत्रण


जूट की बोरी के साथ रगड़ना और कास्टिक सोडा (1%) के प्रयोग द्वारा स्तंभ और 
शाखाओं पर चिपके लाइकेन को छिड़काव द्वारा नियंत्रण किया जा सकता हैं।

6 आँवले का ब्लू मोल्ड


लक्षण


यह फल की सतह पर भूरे रंग के धब्बे बनता हैं। इस रोग की प्रगति पर फल का रंग बैंगनी-भूरे, पीले और अंत में नीले रंग का हो जाता हैं। संक्रमित फल की सतह पर पीले रंग के तरल सी दिखने वाली बूंदों का रिसाव होता हैं।

नियंत्रण


फलों का से सावधानी भंडारण करें। संचयन और भंडारण के दौरान फलों की सतह पर किसी भी प्रकार की चोट से ब्लू मोल्ड का खतरा बढ़ जाता हैं। भंडारण में स्वच्छता की स्थिति को बनाए रखा जाना चाहिए। बोरेक्स या सोडियम क्लोराइड (1%) के साथ फल का उपचार नीले मोल्ड संक्रमण की जांच करता हैं।

7 आँवले का श्यामवर्ण


लक्षण


इस रोग के लक्षण हरे अधपके फलों पर जलयुक्त दबे हुए धब्बों के रूप में शुरू होते हैं। बाद में धब्बों के बीच का भाग काला हो जाता हैं। इन धब्बों के नीचे का गूदा मुलायम, बाद में पूरा फल ही सवंमित हो जाता हैं। छोटे अनियमित आकार के जलासिक्त धब्बे पत्तियों पर भी देखे जा सकते हैं। जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं।

कारण जीव: कोलेटोट्रिईकम ग्लोस्पोरिओइड्स

नियंत्रण


बाग की स्वच्छता का ध्यान रखें। संक्रमित फलों को नष्ट रखें और भण्डारण से पहले कार्बनडाज़िम (०.१%) का छिड़काव करें।

8 आँवले का गीली सड़न 


लक्षण


रोग सामान्य रूप से नवंबर और दिसंबर में दिखाई देता हैं। फल का आकार भी विकृत हो जाता भूरे और काले रंग के धब्बे सक्रमण के २-३ दिनों में पैदा हो जाते हैं। संक्रमित फल गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं। कवक दोनों अपरिपक्व और परिपक्व फलों में संक्रमण का कारण बनता हैं, लेकिन परिपक्व फल अधिक अतिसंवेदनशील होते हैं।

कारण जीव: फोमोप्सिस फाईलैन्थि

नियंत्रण


फलों को चोट से बचाये। नवंबर माह के दौरान डाइथेन एम -45 या बाविस्टिन (0.1%) के साथ फल का उपचार करें।

9 आँवले का काले गीली सड़न 


लक्षण


काली गीली सड़न तोड़े हुए और संग्रहित फलों में दिखाई देती हैं। इन फलों के उप्पर सफ़ेद रंग की कवक की परत दिखाई देती  हैं। सड़े हुए फलों के उप्पर काले रंग को बीजाणु की परत चूर्ण की तरह दिखाई देती  हैं पहले से चोटिल फलों में संकमण की ज्यादा संभावना होती हैं।

कारण जीव: सेन्सेफ्लास्ट्रम रेसमोसम

नियंत्रण


तुड़ाई के दौरान, फलों​​ को चोट से बचाये। संक्रमित फलों को नष्ट करे। फसल तुड़ान 
से पहले डाइथेन एम -45 (0.2%) या कार्बनडाज़िम (0.1%) का छिड़काव करें।

10 आँवले का फोमा फल सड़न रोग


लक्षण


सड़न छोटे गुलाबी भूरे धब्बों से शुरू होती हैं तथा फलों पर बाद में आँख के आकर का बड़ा धब्बा बनाती हैं। धब्बों के निचे की फल की कोशिकाएं सड़ना शुरू हो गई होती हैं। फल पूरी तरह से १५ दिनों के भीतर सड़ जाते हैं।

कारण जीव: फोमा पुटमीनुम

नियंत्रण


फलों ​​ को चोट से बचाये खास कर तुड़ाई के समय तथा ग्रसित फलों को नष्ट करें। फसल तुड़ान से पहले डाइथेन एम-45 (0.2%) या कार्बनडाज़िम (0.1%) का छिड़काव करें।

11 आँवले का निग्रोस्पोरा फल सड़न रोग


लक्षण


हलके भूरे रंग की कवक को फलों के उप्पर देखा जा सकता हैं। यह कवक भूरे रंग के परिगलित घाव फलों के उप्पर पैदा करती  हैं।

कारण जीव: निग्रोस्पोरा सफैरिका

नियंत्रण


तुड़ाई के दौरान, फलों ​​ को चोट से बचाना अनिवार्य हैं अन्यथा इसमें सड़न जल्द उत्पन हो जाती हैं एवं संक्रमित फलों को नष्ट करे। फसल तुड़ान से पूर्व फफुंदनाशको जैसे डाइथेन एम-45 (0.2%) या कार्बनडाज़िम (0.1%) का छिड़काव करें। जिससे रोग तुड़ाई उपरांत ज्यादा नहीं फैले।

12 आँवले का पेस्टालोसिआ फल सड़न रोग


लक्षण


फलों के उप्पर अनिमित और भूरे रंग के धब्बे होना इस बीमारी के मुख्य लक्षण  हैं। समय के साथ ये  धब्बे गहरे भूरे और  काले रंग के हो जाते  हैं। फल का आंतरिक भाग भी सूखे हुए भूरे भाग में परिवर्तित हो जाता हैं।

कारण जीव: पेस्टालोसिआ क्रुएन्ता

नियंत्रण


तुड़ाई के दौरान, फलों ​​में चोट न लगे इस बात पर गौर करने की आवश्यकता हैं। संक्रमित फलों को नष्ट करे तथा फसल पर कार्बेन्डाजिम (०.१%) का छिड़काव तुड़ाई से पूर्व करना चाहिए। फलों का संग्रहण साफ सुथरे पात्रो में करना चाहिए। भंडारण में स्वच्छता की स्थिति को बनाए रखा जाना चाहिए।

13 आँवले का इंटरनल नेक्रोसिस


लक्षण


शुरू में फल की फलेश काले भूरे रंग की दिखाई देती  हैं। जो बाद में कोरकी और गम्मी पॉकेट्स में परिवर्तित हो जाती हैं।

कारण: इंटरनल नेक्रोसिस

नियंत्रण


सितंबर-अक्टूबर के दौरान जिंक सल्फेट (0.4%)+कॉपर सल्फेट (0.4%) और बोरेक्स 
(0.4%) का संयुक्त छिड़काव करना चाहिए। बाद में 0.5-0.6% बोरेक्स का छिड़काव करना चाहिए। प्रतिरोधी किस्मे जैसे की चकैया, एनए-6 और एनए-7 को लगाया जाना चाहिए। जो इस कारक के प्रति अवरोधक पाई गई हैं।


Monday, 18 September 2017

जायफल (jabitri) की खेती

जायफल (jabitri) की खेती (Cultivation of Nutmeg)

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किस्में

Vishwashree , कोंकण सुगंधा और कोंकण Swad
आईआईएसआर से सिफारिश अभिजात वर्ग accessions में से कुछ एक 9-20 , 22, 25 , 69, 150 , 4-12 , 22, 52, A11-23 , 70 हैं


जायफल का वानस्पतिक नाम है मिरिस्टिका फ्रेग्रेंस  हिंदी में, यह 'jaiphal' के रूप में जाना जाता है।जायफल एक dioecious, बारहमासी पौधा है। जायफल के बारे में 10 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच एक सदाबहार, शंक्वाकार पेड़ है। जायफल जायफल गुठली और गदा के लिए उगाया जाता है। गदा बीज आसपास के बीजचोल सूख गया है, जबकि वाणिज्यिक जायफल, बीज के सूखे गिरी है। गर्म, आर्द्र जलवायु जायफल खेती के लिए सबसे उपयुक्त है। जायफल अच्छी तरह से ऊपर मतलब समुद्र स्तर के 1,300m अप करने के लिए और 150 सेमी या उससे अधिक की एक वार्षिक वर्षा के साथ बढ़ता है।

मिट्टी आवश्यकताएँ

मिट्टी दोमट, रेतीले दोमट और लाल लेटराइट मिट्टी जायफल खेती के लिए आदर्श होते हैं।

प्रचार

बीज प्रचार जायफल में पसंद किया जाता है। Epicotyl ग्राफ्टिंग, दृष्टिकोण ग्राफ्टिंग और पैच नवोदित जायफल में सफल साबित हुई है।
खेती प्रथाओं

पौध की स्थापना

हौसले से काटा, स्वस्थ, लेकिन स्वाभाविक रूप से विभाजित जायफल फल बीज प्रसार के लिए उपयोग किया जाता है। बीज बीज बेड पर सीधे बोया जाता है। रेतीली मिट्टी बीज किसी भी लम्बाई के बेड लेकिन ऊंचाई में चौड़ाई में 1-1.5m, और 15cm तैयार करने के लिए किया जाता है। एक प्रकाश सिंचाई बुवाई के बाद जल्द ही किया जाता है और उसके बाद सिंचाई की आवश्यकता के रूप में और जब किया जाता है। बीजों के अंकुरण बुवाई के बाद 30-90 दिनों से आरम्भ होता है।

रोपाई

: 3: 1 के अनुपात 20-25 दिन पुराने अंकुरों एक 3 में अच्छा मिट्टी, रेत और अच्छी तरह से विघटित गोबर के मिश्रण युक्त पॉलिथीन बैग में प्रत्यारोपित किया जाता है। लगभग दो साल पुराने अंकुरों मुख्य क्षेत्र में रोपाई के लिए उपयोग किया जाता है।

खेत तैयार

फील्ड मिट्टी की उर्वरता को समृद्ध करने के लिए खेत यार्ड खाद और कार्बनिक पदार्थ जोड़कर तैयार किया जाता है। 0.75m आकार × × 0.75m 0.75m के गड्ढे खोदे और रोपण के लिए 15 दिन पहले जैविक खाद और ऊपर मिट्टी से भर रहे हैं।

रोपण

मुख्य क्षेत्र में जायफल के अंकुर रोपण के लिए आदर्श समय बरसात के मौसम की शुरुआत में है।

रिक्ति

के अंकुर के लिए, 6-7m की दूरी पर्याप्त है। ग्राफ्ट के लिए, 5m × 5m रिक्ति इष्टतम है।

Aftercare

जायफल आम तौर पर युवा जायफल पौधों लंबा -growing वृक्षारोपण फसलों से स्वाभाविक रूप से छायांकित हैं जहां नारियल, लौंग, कॉफी या सुपारी बागान में एक intercrop के रूप में उगाया जाता है। जायफल एक monocrop के रूप में उगाया जाता है लेकिन, अगर स्थायी छाया पेड़ जायफल के अंकुर के रोपण की अच्छी तरह से आगे लगाया जाना चाहिए।

निषेचन अनुसूची

जैविक खाद और जैविक खाद जायफल खेती के लिए सबसे उपयुक्त हैं। अस्थि-भोजन भी जायफल उत्पादकों के बीच बहुत लोकप्रिय है। भारत में वाणिज्यिक खेती जायफल के लिए अनुशंसित उर्वरक खुराक, 20 ग्राम एन (40 ग्राम यूरिया), प्रारंभिक वर्ष के दौरान 18g P2O5 (110g अधिभास्वीय) और संयंत्र प्रति 50 ग्राम K2O (पोटाश की 80g मुरिएट) और 500 ग्राम एन (1,090g यूरिया), 250 ग्राम P2O5 हैं (1,560g अधिभास्वीय) और 100 ग्राम K2O बाद के वर्षों में प्रति वर्ष प्रति पौधे (पोटाश की मुरिएट 1,670g)

निराई और Mulching

सूखे पत्ते या किसी भी अन्य पलवार सामग्री के साथ संयंत्र की घाटियों के Mulching जायफल खेती के लिए एक अनिवार्य प्रथा है। निराई भी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक ऑपरेशन है और मुक्त क्षेत्र खरपतवार रखने के लिए आवश्यक है और जब के रूप में किया जाना चाहिए।

सिंचाई

सिंचाई जल्द ही मुख्य क्षेत्र में और भी गर्मी के मौसम के दौरान के अंकुर रोपण के बाद आवश्यक है। अन्य समय में, सिंचाई के रूप में किया जाता है और जब आवश्यक है।

संचय

छठे वर्ष से फलने महिला जायफल पेड़ शुरू होता है, पीक कटाई की अवधि 20 साल बाद तक पहुँचता है। फल कटाई फूल के बाद 9 महीनों के लिए तैयार हैं। फूल और कटाई साल भर में जारी है। लेकिन जून अगस्त शिखर अवधि है। फल पकाना और उनके फली खुला विभाजन जब फसल कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। फसल काटने वाले एक विधेयक हुक का उपयोग कर मैन्युअल रूप से किया जाता है।

Postharvest प्रबंधन

काटा फल बाहरी मांसल हिस्से को निकाल दिया जाता है, खुले विभाजित कर रहे हैं, और गदा मैन्युअल रूप से अखरोट से अलग है। नट और गदा एक सुखाने यार्ड पर अलग से सूखे, या एक रसोई घर में व्यवस्था की एक मंच पर हैं। पूरा हो गया है सुखाने जब ​​लाल रंग रंग का गदा धीरे-धीरे पीले भूरे और भंगुर हो जाता है।

जायफल के प्रसंस्कृत उत्पाद

जायफल पाउडर या भूमि जायफल

सूखे जायफल बीज जायफल का ठीक पाउडर तैयार करने के क्रम में पीसने के लिए उपयोग किया जाता है।

जायफल अचार

जायफल फल के मांसल फली अचार, जैम और जेली बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

जायफल तेल

जायफल तेल जायफल पाउडर से निकाला जाता है और यह Borneol और eugenol में समृद्ध है। जायफल आवश्यक तेल जमीन जायफल की भाप आसवन द्वारा प्राप्त की है।

जायफल के तेल का उपयोग

जायफल तेल बड़े पैमाने पर Perfumeries और दवा उद्योगों में प्रयोग किया जाता है। जायफल तेल टूथ पेस्ट, खांसी सिरप, और कई पारंपरिक औषधीय तैयारी के निर्माण में एक आवश्यक घटक है। जायफल आवश्यक तेल एक स्वादिष्ट बनाने का मसाला एजेंट के रूप में विभिन्न खाद्य तैयारी में जमीन जायफल या जायफल पाउडर के लिए एक विकल्प के रूप में प्रयोग किया जाता है।

जायफल और जायफल तेल के स्वास्थ्य लाभ

जायफल बड़े पैमाने पर की वजह से अपनी विभिन्न औषधीय गुणों के पारंपरिक औषधीय तैयारी में प्रयोग किया जाता है। यह भूख को प्रोत्साहित करती है के रूप में जायफल एक क्षुधावर्धक के रूप में प्रयोग किया जाता है। जायफल कब्ज और पित्त पथरी का इलाज करता। यह भी प्रजनन प्रणाली के लिए एक टॉनिक के रूप में आयुर्वेद में सिफारिश की है। जायफल अल्प अवधि के विनियमन के द्वारा केरातिन मासिक धर्म संबंधी विकार इलाज। जायफल ऐसी ठंडक और नपुंसकता के रूप में यौन समस्याओं के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है। जायफल संकुचन को मजबूत बनाने से भी बच्चे के जन्म के सहायता के लिए सिफारिश की है।
जायफल का तेल एक एंटीसेप्टिक, antispasmodic, एनाल्जेसिक, antirheumatic, वातहर, पाचन, emmenagogue, तुरंत ब्यानेवाला, उत्तेजक रेचक और टॉनिक के रूप में आयुर्वेदिक चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। कम मात्रा में सेवन अगर जायफल पाउडर जायफल पाउडर में मौजूद यौगिक macelignan कासीनजन बैक्टीरिया सहित विभिन्न जीवाणु संक्रमण के खिलाफ रोगाणुरोधी गतिविधि डाल रही है के रूप में कई स्वास्थ्य लाभ है। जायफल तेल आमवाती दर्द, दांत दर्द, राहत के लिए और पाचन गड़बड़ियों और खराब सांस इलाज के लिए बाहर से लागू किया जा सकता है। शहद के साथ संयोजन में जायफल तेल पुराना दस्त, उल्टी, आंत्रशोथ, और अपच के इलाज के लिए एक सबसे अच्छा पारंपरिक दवा है।

जायफल तेल और अरोमा थेरेपी

जायफल के तेल के इस्तेमाल की वजह से जायफल तेल के विभिन्न औषधीय और कॉस्मेटिक संपत्तियों की सुगंध चिकित्सा या वाष्प उपचार के लिए सिफारिश की है। जायफल का तेल दिल और रक्त परिसंचरण जायफल का तेल शरीर की सूजन लड़ता है और आमवाती दर्द से राहत मिलती है उत्तेजित करता है। एक उत्तेजक और मन के लिए एक invigorating एजेंट के रूप में शरीर की मालिश कृत्यों के लिए प्रयोग किया जाता है जब जायफल का तेल। जायफल तेल बेहोशी मंत्र से लोग जान, और पाचन प्रणाली को उत्तेजित करता है। इसके सुखद खुशबू के साथ जायफल तेल लड़ हवा, पुरानी उल्टी, मतली और दस्त में मदद करता है।

जायफल तेल और ऑरेंज तेल के मिश्रण

जायफल तेल नारंगी तेल के साथ संयोजन में मिश्रित तेल की मालिश के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस मिश्रित तेल मालिश मांसपेशियों में दर्द, गठिया, और गठिया से राहत के लिए सबसे अच्छा है। यह भी पित्त पथरी, और गठिया के इलाज।जायफल तेल और नारंगी तेल का मिश्रण भी इलाज पाचन विकार और यौन समस्याओं रक्त परिसंचरण को बढ़ाने के लिए, और।

जायफल के प्रतिकूल प्रभाव

यह बड़ी मात्रा में जायफल पाउडर लेने वाली मारिजुआना, एक ज्ञात दवा के लिए इसी तरह के परिणाम उत्पन्न हो सकता है कि सूचना दी है के रूप में जायफल पाउडर की बड़ी खुराक कुछ साइड इफेक्ट हो सकता है। जायफल पाउडर का यह मादक प्रभाव रासायनिक में methylenedioxymethamphetamine (एमडीएमए) के साथ बनाने के समान है, जो एक यौगिक myristicin की उपस्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया है। आंतरिक लिया जब तेल जायफल इस एक ही परिसर की उपस्थिति, myristicin की वजह से है जो एक hallucinogenic प्रभाव पैदा करता है।