Monday, 2 October 2017

उड़द की उन्नत खेती

उड़द की उन्नत खेती (Improved cultivation of Blackgram (Urad))


https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Farming-of-urad.html              , urad (blackgram) plant photos



हमारे देश में उड़द का उपयोग मुख्य रूप से दाल के लिये किया जाता है। इसकी दाल अत्याधिक पोषक होती है। विशेष तौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसे लोग अधिक पसन्द करते है। उड़द को दाल के साथ-साथ भारत में भारतीय व्यंजनों को बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है तथा इसकी हरी फलियाँ से सब्जी भी बनायी जाती है।

उड़द का दैनिक आहार में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर कैल्शियम व विटामिन बी काम्पलेक्स तथा खनिज लवण भी बहुतायत पाये जाते है। इसके साथ - साथ अन्य दालो की तुलना में 8 गुणा ज्यादा फास्फोरस अम्ल के अलावा आरजिनीन, ल्यूसीन, लाइसीन, आइसोल्यूसीन आदि एमिनो एसिड के पूरक सम्बन्ध के कारण जैव वैज्ञानिक मान अत्याधिक बढ़ जाता है।

उड़द की जड़ो में गाठो के अन्दर राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधे का नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है। इसलिए उड़द की फसल से हरी खाद भी बनायी जाती है, जिसमें लगभग 40-50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन प्राप्त होती है। 

उड़द, देश की एक मुख्य दलहनी फसल है इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ में की जाती है लेकिन जायद मे समय से बुवाई सघन पध्दतियो को अपनाकर भारत में उड़द मैदानी भाग उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाण, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, बिहार तथा राजस्थान में मुख्य रूप से की जाती है। कार्य सांख्यिकी प्रभाग अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय के अनुसार 2004-2005 में भारत में कुल उड़द का उत्पादन 1.47 मिलियन टन था जो 2015-16 में बढ़कर 2.15 मिलियन टन हो गया है तथा 2016-17 के अग्रिम अनुसार 2.93 मिलियन टन कुल उड़द का उत्पादन रखा गया है।

उड़द की फसल के लि‍ए जलवायु :-

उड़द एक उष्ण कटिबन्धीय पौधा है इसलिए इसे आर्द्र एवं गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है उड़द की खेती के लिये फसल पकाते समय शुष्क जलवायु की आवश्यकता पड़ती है, जहाँ तक भूमि का सवाल है समुचित जल निकास वाली बुलई दोमट भूमि इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है लेकिन जायद में उड़द की खेती में सिंचाई की जरूरत पड़ती है।

उडद के खेत की तैयारी :-

खेत में पहले जुताई हैरो से करने के बाद दो-तीन जुताई कल्टीवेटर से पता लगाकर खेत तैयार कर लेते है। खेत की तैयारी करते समय एक कुन्तल जिप्सम का प्रयोग करने पर अलग से सल्फर देने की जरूरत नहीं पड़ती है जिप्सम का प्रयोग करने पर मिट्टी मूलायम हो जाती है। भूमि की दशाओं में सुधार होता है।

उडद की उन्नत किस्में


उन्नतशील प्रजातियां / किस्म
अवधि (दिन में)
उपयुक्त क्षैत्र
विवरण 
उपज (क्वि./हे.)


टी.-9


70 - 75

उ.प्र., म.प्र., महा., उड़ीसा, आसाम, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, हि.प्र.

सभी ऋतुओ के लिए उपयुक्त


10 - 12

पंत यु- 19

80 - 85

राज., आसाम, बिहार, उ.प्र., ज. ओर क., पं. बंगाल

पीला मोजैक रोग रोधी

10 - 12

पंत यु- 30

80 - 85

आ.प्र., दादरा एवं न हे, गुजरात, उड़िसा, उ.प्र.

पीला मोजैक रोग रोधी

10 - 12

जे. वाई. पी.

80 - 90

उ.प्र.

खरीफ व रबी दोनो मौसम के लिए उपयुक्त

10 - 12

यु. जी. - 218

78

उ.प्र., पंजाब, हरियाणा, दिल्ली

पीला मोजैक रोग रोधी

15


उड़द बुवाई के लिए बीज दर :-

उड़द अकेले बोने पर 15 से 20 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर तथा मिश्रित फसल के रूप में बोने पर 8-10 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर काम में लेना चाहिए।

उडद बोने की विधि और समय :-

बसन्त ऋतु की फसल फरवरी-मार्च में तथा खरीफ ऋतु की फसल जून के अन्तिम सप्ताह या जुलाई के अन्तिम सप्ताह तक बुवाई कर देते है। चारे के लिए बोई गई फसल छिड़कवाँ विधि से बुवाई की जाती है तथा बीज उत्पादन हेतु पक्तियाँ में बुवाई अधिक लाभदायक होती है।
प्रमाणित बीज को कैप्टान या थायरम आदि फफूदनाशक दवाओं से उपचारित करने के बाद , राइजोबियम कल्चर द्वारा उपचारित करके बुआई करने से 15 प्रतिशत उपज बढ़ जाती है।

उडद बीज का राइजोबियम उपचार :-

उड़द दलहनी फसल होने के कारण अच्छे जमाव पैदावार व जड़ो में जीवाणुधारी गाँठो की सही बढ़ोतरी के लिए राइजोबियम कल्चर से बीजों को उपचारित करना जरूरी होता है। 1 पैकेट (200 ग्राम) कल्चर 10 किलोग्राम बीज के लिए सही रहता है। उपचारित करने से पहले आधा लीटर पानी का 50 ग्राम गुड़ या चीनी के साथ घोल बना ले उस के बाद में कल्चर को मिला कर घोल तैयार कर ले। अब इस घोल को बीजों में अच्छी तरह से मिला कर सुखा दे। ऐसा बुवाई से 7-8 घण्टे पहले करना चाहिए।

उडद की फसल में खाद एवं उर्वरक :-

उड़द दलहनी फसल होने के कारण अधिक नत्रजन की जरूरत नहीं होती है क्याेंकि उड़द की जड़ में उपस्थित राजोबियम जीवाणु वायुमण्डल की स्वतन्त्र नत्रजन को ग्रहण करते है और पौधो को प्रदान करते है। पौधे की प्रारम्भिक अवस्था में जब तक जड़ो में नत्रजन इकट्ठा करने वाले जीवाणु क्रियाशील हो तब तक के लिए 15-20 किग्रा नत्रजन 40-50 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय खेत में मिला देते है।

उर्वरक उपयोग एवं संयोग (कि./हे.) :-



नत्रजन

फास्फोरस


पोटाश


संयोग - 1


संयोग - 2


संयोग - 3

20

50

40

डि.ए.पी. - 108.7

एस.एस.पी. - 312.5

टि.एस.पी. - 104.17

युरिया - 0.95

युरिया - 43.48

युरिया - 43.48

एम.ओ.पी. - 66.66

एस.ओ.पी. - 80

एम.ओ.पी. - 66.66


उडद की फसल में सिंचाई :-

ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 10-15 दिन में आवश्यकतानुसार सिंचाई की जाती है। तथा वर्षा ऋतु में सुखा पड़ने की स्थिति में 2-3 बार कुल सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।

उडद में खरपतवार नियन्त्रण :-

वर्षा कालीन उड़द की फसल में खरपतवार का प्रकोप अधिक होता है जिससे उपज में 40-50 प्रतिशत हानि हो सकती है। रसायनिक विधि द्वारा खरपतवार नियन्त्रण के लिए वासालिन 1 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी के घोल का बुवाई के पूर्व खेत में छिड़काव करे। फसल की बुवाई के बाद परन्तु बीजों के अंकुरण के पूर्व पेन्डिमिथालीन 1.25 किग्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। अगर खरपतवार फसल में उग जाते है तो फसल बुवाई 15-20 दिन की अवस्था पर पहली निराई तथा गुड़ाई खुरपी की सहायता से कर देनी चाहिए तथा पुन: खरपतवार उग जाने पर 15 दिन बाद निंदाई करनी चाहिए।

उडद के फसल चक्र एवं मिश्रित खेती :-

उड़द की वर्षा ऋतु में उड़द की फसल प्राय: मिश्रित रूप  में मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास व अरहर आदि के साथ उगते है।
उड़द के साथ अपनाये जाने वाले साधन फसल चक्र निम्नलिखित है-

सिंचित क्षेत्र:

 उड़द - सरसों   , उड़द - गेहूँ  

असिंचित क्षेत्र:

  उड़द-पड़त-मक्का  ,   उड़द-पड़त-ज्वार

कीट और कीट की रोकथाम :-

सफेद मक्खी :-

 यह उड़द का प्रमुख कीट है जो पीला मोजेक वायरस का वाहक के रूप में कार्य करती है।

देखभाल :-

ट्रायसजोफॉस 40 ई.सी. का 1 लीटर का 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।
इमिडाक्लोप्रिड की 100 मिलीलीटर या 51 इमेथोएट की 25 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

अर्ध कुंडलक (सेमी लुपर) :-

 यह मुख्यत: कोमल पत्तियों को खाकर पत्तियों को छलनी कर देती है।

देखभाल :-

प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. 1 लीटर का 500 लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करते है।

फली छेदक कीट :-

 इस कीट की सूडियां फलियों में छेद कर दानो को खाती है। जिससे उपज में भारी नुकशान होता है

देखभाल :-

मोनोक्रोटोफास का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।

एफिड :-

 यह मुलांकूर के रस को चुसता है जिससे पौधे की वृध्दि रूक जाती है।

देखभाल :-

क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. 500 मिलीलीटर 1000 लीटर पानी के घोल में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

रोग और उनकी रोकथाम :-

पीला मोजेक विषाणु रोग :-

 यह रोग वायरस द्वारा फैलता है तथा यह उड़द का सामान्य रोग है तथा इसका प्रभाव 4-5 सप्ताह बाद ही दिखाई देने लगते है। रोग के सबसे पहले लक्षण पत्तियों पर गोलाकार पीले रंग के धब्बे दाने के आकार दिखाई देते हैं ।  कुछ ही दिनों में पत्तियाँ पूरी पीली हो जाती है अंत में ये पत्तियाँ सफेद सी होकर सूख जाती है।

देखभाल :-

सफेद मक्खी की रोकथाम से रोग नियंत्रण सम्भव है। उड़द की पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी किस्म पंत यु-19, पंत  यु-30, यु जी-218, टी.पी.यू.-4, पंतउड़द-30, बरखा, के.यू.-96-3 की बुवाई करनी चाहिए।

पत्ती मोड़न रोग :-

 नई पत्तियो पर हरिमाहीनता के रूप में पत्ती की मध्य शिराओं पर दिखाई देते हें। इस रोग में पत्तियां मध्य शिराओं से उपर की और मुड़ जाती हैं। तथा निचें की पत्तिया अंदर की और मुड़ जाती हैं। तथा पत्तियों की वृध्दि रूक जाती हैं। और पौधे मर जाते हैं।

देखभाल :-

यह विषाणु जनित रोग हैं। जिसका संचरण थ्रीप्स द्वारा होता हैं। थ्रीप्स के लिए ऐसीफेट 75 प्रतिशत एस.पी. या 2 मि.ली. डाईमैथोएट प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए तथा फसल की बुआई समय पर करनी चाहिए।

पत्ती धब्बा रोग :-

 यह रोग फफँद द्वारा फैलता है, इसके लक्षण पत्तियाँ पर छोटे-छोटे धब्बों के रूप में दिखाई देते है।

देखभाल :-

कार्बेन्डाजिम 1किग्रा 1000 लीटर पानी के घोंल में मिलाकर स्प्रे कर दिया जाता है।                 

उडद की फसल की कटाई और मड़ाई :-

उड़द लगभग 85-90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है इसलिए ग्रीष्म ऋतु की कटाई मई-जुन में तथा वर्षा ऋतु की कटाई सित.-अक्टु. में फलियो का रंग काला पड़ जाने पर हसियाँ से कटाई करके खलियानो में फसल को सुखाते है बाद में बेल या, डण्डो या थ्रेसर से फलियों से दानों निकाल लिया जाता है।

उडद की उपज :-

10-15 कुन्टल प्रति हेक्टेयर शुध्द फसल में तथा मिश्रित फसल में 6-8 कुन्टल प्रतिहेक्टेयर उपज हो जाती है।

भण्डारण :-


दानो को धुप में सुखाकर 10-12 प्रतिशत नमी हो जाए, तब दानों को बोरीयाँ में भरकर गोदाम में संग्रहित कर लिया जाता है।

Sunday, 1 October 2017

मसूर की खेती

मसूर की खेती (Farming of lentil)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Farming-of-lentil.html             , lentil (masoor) plant photos



रबी की दलहनी फसलों में मसूर का प्रमुख स्थान है। यह यहाँ की एक बहुप्रचलित एवं लोकप्रिय दलहनी फसल है जिसकी खेती प्रायः हर राज्य में की जाती है। कृषि वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि धान के कटोरे में दलहन की खेती की भी अपार संभावनाएं हैं।इसकी खेती प्रायः असिंचित क्षेत्रों में धान के फसल के बाद की जाती है । रबी मौसम में सरसों एवं गन्ने के साथ अंततः फसल के रूप में लगाया जाता है। मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने में भी मसूर की खेती बहुत सहायक होती है। उन्नतशील उत्पादन तकनीको का प्रयोग करके मसूर की उपज में बढ़ोतरी की जा सकती है।

जलवायु 

मसूर के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है,ऊष्ण-कटिबंधीय व उपोष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों में मसूर शरद ऋतू की फसल के रूप में उगाई है जाती,विभिन्न स्थानों पर विभिन्न प्रकार की जलवायु में मसूर की फसल समुद्री सतह से लगभग 3500 मीटर की ऊंचाई तक उगाई जाती है.पौधों की वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत अधिक ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है , अतः भारत में मसूर की फसल रबी की ऋतू में उगाई जाती है . उन सभी स्थानों पर 80-100 सेमी तक वार्षिक वर्षा होती है मसूर की फसल बिना वर्षा के भी उगाई जा सकती है जहाँ , परन्तु कम वर्षा वाले स्थानों पर सिंचाइयों की सुविधा उपलब्ध होना अति आवश्यक है , अधिक वर्षा फसल के लिए हानिकारक है होती . पौधों की वृद्धि के लिए अधिक ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है परन्तु पाले का फसल पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है , पौधों की वानस्पतिक वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत उच्च तापक्रम आवश्यक होता है , इस प्रकार फसल वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं 65-85 डिग्री फारेन्हाईट तापक्रम अनुकूल में होता है

भूमि का चयन

मसूर की खेती के लिए दोमट मिट्टी काफी उपयोगी होती है। नमीयुक्त मटियार खेत में धान की अगैती फसल के बाद या फिर खाली पड़े खेत में मसूर की खेतीबारी आसानी पूर्वक की जा सकती है।

खेत की तैयारी

मसूर की खेती के लिए खेत को 2-3 बार देशी हल अथवा कल्टीवेटर से जुताईकर मिट्टी को भूरभूरी बना देते है। बीज की बोआई जीरो टिलेज मशीन से करने के बाद कल्टीवेटर या रोटावेटर से जोताई कर खेत भुरभुरा करना पड़ता है।

मसूर बोने का समय

दलहन की बोआई के लिए वैसे तो असिंचित क्षेत्र में 15 से 31 अक्टूबर के बीच का समय उपयुक्त माना गया है। किन्तु सिंचित इलाकों में इसकी बोआई का समय 15 नवम्बर तक निर्धारित किया गया है। मसूर की उन्नत प्रजातियां को 15 अक्टूबर से 25 नवम्बर के बीज बुवाई कर देनी चाहिए।

मसूर की खेती के लिए अनुसंसित उन्नत प्रजातियाँ

छोटे दाने की प्रजातियाँ

पंत के 639 - यह प्रजाति 135-140 दिन में तैयार हो जाती है। यह जड़ सड़न एवं उकठा रोग के लिए प्रतिरोधी मानी जाजी है।
पी0एल0 406 - यह प्रभेद 140-145 दिन में तैयार होती है। इसमें रस्ट, बिल्ट एवं अट रोग से लड़ने की क्षमता होती है।
एच0यू0एल0 57 - यह प्रजाति 120-125 दिन में परिपक्व हो जाती है तथा इसमंे भी जड़ सड़न एवं उकठा रोग से लड़ने की क्षमता है।
के0एल0एस0 218 - यह प्रजाति 120-125 दिन में तैयार हो जाती है।
 


बडे़ दाने वाली प्रजातियाँ

पी0एल077-12 (अरूण) - यह प्रभेद 115-120 दिन में परिपक्व हो जाती है रस्ट एवं इकठा रोग से लड़ने की क्षमता होती है।
मसूर की बुवाई की जाने वाली प्रमुख प्रजातियाँ जैसे की पूसा वैभव, आई पी एल८१, नरेन्द्र मसूर 1, पन्त मसूर 5, डी पी एल 15 ,के 75 तथा आई पी एल 406 इत्यादि प्रजातियाँ हैंI 
के-75 (मल्लिका) - यह जाति 115-120 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 10-12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना छोटा होता है, जिसके 100 दानों का वजन 2.6 ग्राम है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र अर्थात सीहोर, भोपाल, विदिशा, नरसिंहपुर, सागर, दमोह एवं रायसेन आदि जिलों के लिये उपयुक्‍त है।
2. जे.एल.-1 -  इस जाति की पकने की अवधि 112-118 दिन है तथा औसत उपज 11-13 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है तथा 100 दानों का वजन 2.8 ग्राम होता है। यह जाति भी संपूर्ण विश्‍व क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
3.एल-4076 - यह जाति 115-125 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी औसत उपज 10-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। यह उकठा रोग निरोधक है। इसका दाना अपेक्षाकृत बड़े आकार का होता है। 100 दानों का वजन 3.0 ग्राम होता है। यह जाति प्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिये उपयुक्‍त है।
4. जे.एल.-3 - मध्‍यम अवधि की नई विकसित यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा 14-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर उपज देती है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है। इसके 100 दानों का वजन लगभग 3.0 ग्राम होता है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
5. आई.पी.एल.-18 (नूरी): यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा औसत उत्‍पादन 12-14 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। मध्‍यम आकार के दानों वाली इस जाति का वजन 3.0 ग्राम है।
6. एल. 9-2: देरी से पकने वाली यह किस्‍म 135-140 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 8-10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसके दाने छोटे आकार के होते हैं। यह जाति भिण्‍ड तथा ग्‍वालियर क्षेत्रों के लिये अधिक उपयुक्‍त है।

बीज की मात्रा एवं बोने की बिधि

छोट दानो वाले प्रभेदो के लिए एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में बुबाई के लिए 35-40 किलोग्राम बीच की जरूरत पड़ती है। जबकी बड़ेे दानों वालेे किस्मों के लिए 50-55 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। बुबाई के समय किस्मों के आधार पर कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी क्रमशः 25 से0मी0 ग् 10 से0मी रखनी चाहिए।

बीजोपचार

प्रारम्भिक अवस्था के रोगों से बचाने के लिए बुवाई से पहले मसूर के बीजों को सही उपचार करना जरूरी होता है। इसके लिए ट्राइकोडर्मा विरीडी 5 ग्राम प्रति किलों बीज या कार्बेन्डाजिन 2.0 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। बीजोपचार में सबसे पहले कवकनाशी तत्पश्चात् कीटनाशी एवं सबसे बाद में राजोबियम कल्चर से उपचारित करने का क्रम अनिवार्य होता है।

उर्वरकों का प्रयोग

मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग आवश्यतानुसार करना चाहिए। सामान्य परिस्थिति में 20 किलो नेत्रजन, 40 किलोग्राम स्फूर एवं 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर उपयोग करना चाहिए। प्रायः असिंचित क्षेत्रों में स्फूर की उपलब्धता घट जाती है। इसके लिए पी एस बी का भी प्रयोग कर सकते है। 4 किलो पी एस बी (जैविक उर्वरक) को 50 किलोग्राम कम्पोस्ट में मिलाकर खेतों मंे बुवाई पूर्व व्यवहार करें। जिन क्षेत्रों में जिंक एवं बोरान की कमी पाई जाती है उन खेतों में 25-30 किलोग्राम जिंक सल्फेट एवं 10 किलोग्राम बोरेक्स पाउडर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय प्रयोग करना चाहिए।

सिंचाई

जिन खेतों के नमी कमी पाई जाती है वहा एक सिंचाई (बुबाई के 45 दिन बाद) अधिक लाभकारी होती है। खेतों में पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। इससे फसल प्रभावित हो जाती है। प्रायः टाल क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती है।

खरपतवार नियत्रण

मसूर के खेत में प्रायः मोथा, दूब, बथुआ, मिसिया, आक्टा वनप्याजी, बनगाजर आदि खरपतवार का प्रकोप ज्यादा होता है। इसके नियत्रण के लिए 2 लीटर फ्लूक्लोरिन को 600-700 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जूताई के बाद छिटकर मिला दे अथवा पेण्डीमेथीलीन एक किलोग्राम को 1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के 48 घंटे के अन्दर छिड़काव करना चाहिए।

फसल सुरक्षा प्रबंधन

रोग प्रबंधनः

मसूर के प्रमुख रोग उकठा, ब्लाइट, बिल्ट एवं ग्रे मोल्ड है। इससे बचाने के लिए फसलों में मेंकोजेब 2 ग्राम लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

कीट प्रबंधन –


  मसूर के पौधे के उगने के बाद फसल को हमेशा निगरानी रखनी चाहिए जिससे कीड़े का आक्रमण होने पर उचित प्रबंध तकनीक अपनाकर फसल को नुकसान से बचाया जा सके। कजरा पिल्लू, कटवर्म, सूड़ी तथा एफिड कीड़ों को प्रकोप मसूर के पौधे पर ज्यादा होता है।

कीट नियंत्रण

5 लीटर देशी गाय का मठा लेकर उसमे 15 चने के बराबर हींग पीसकर घोल दें , इस घोल को बीजों पर डालकर भिगो दें तथा 2 घंटे तक रखा रहने दें उसके बाद बोवाई करें . यह 1 एकड़ घोल की बोवनी के बीजों के लिए पर्याप्त है .
5 देशी गाय के गौमूत्र में बीज भिगोकर उनकी बोवाई करें , ओगरा और दीमक से पौधा सुरक्षित रहेगा लीटर . इन कीटो को आर्थिक क्षतिस्तर से नीचे रखने के लिए बुवाई के 25-30 दिन बाद एजैडिरैक्टीन (नीम तेल) 0.03 प्रतिशत 2.5-3.0 मि0ली0 प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।

कटाई एंव भण्डारण


जब 80 प्रतिशत फलिया पक जाऐ तो कटाई करके झड़ाई कर लेना चाहिए। भण्डारण से पूर्ण दानों को अच्छी तरह से सुखा लेना याहिए। अगर किसान लोग उन्नत विधि से मसूर की खेती करे तो लगभग 18-20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त कर सकते है।

गन्ना की खेती

गन्ना की खेती (Farming of sugarcane)



https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Farming-of-sugarcane.html            , sugarcane (ganna) plant photos


ईंख की व्यावसायिक खेती गुड़ बनाने एवं इसका रस पीने के लिए की जाती है। ईंख एक नकदी फसल है, इसे एक वर्ष रोपकर दो खूँटी फसल के साथ लगातार तीन वर्षों तक उपज लिया जा सकता है। झारखण्ड राज्य के करीब 500 हेक्टेयर में गन्ना की खेती होती है। प्रमुख जिलों जैसे राँची, गुमला, गोड्डा, गढ़वा, कोडरमा, लोहरदगा आदि में इसकी खेती ज्यादातर की जाती है।
मिट्टी एवं खेत की तैयारीः ईंख की खेती लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में की जाती है परन्तु दोमट मिट्टी तथा ऊँची या मध्यम जमीन, जहाँ जल निकास की अच्छी व्यवस्था हो अधिक उपयुक्त है। ईंख की जड़े मिट्टी में काफी गहराई तक जाती है इसके लिए खेत की गहरी जुताई आवश्यक है। साधारणतया दो जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या ट्रैक्टर से करनी चाहिए। उसके बाद देशी हल से जुताई कर पाटा चला देना चाहिए जिससे मिट्टी भुरभुरी होकर उसमें अच्छा वायु संचार हो जाय।

रोपाई का समयः

 रोपाई का समय तापमान पर निर्भर करता है, इसके लिए औसत तापक्रम 24 डिग्री से 32 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त पाया जाता है। इस आधार पर दो मौसमों यानी शरदकालीन में 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक एवं बसंतकालीन में 15 फरवरी से 15 मार्च तक इसकी बुवाई की जाती है। शरदकालीन रोपाई में ईख की उपज बसंतकालीन रोप की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अधिक होती है।

अनुशंसित प्रभेद:

 अनुशंसित प्रभेद की ही बुवाई करनी चाहिए जिसकी उपज क्षमता अच्छी हो, एवं उसमें रस की प्रचूर मात्रा के साथ-साथ खूटी फसल भी ली जा सके। BO 147 एक मुख्यकालीन प्रभेद है जिसे विश्वविद्यालय ने अनुसंधान के बाद अनुशंसित किया है। यह 12 महीने में तैयार हो जाती है, इसकी उपज क्षमता एवं रस में सुक्रोज की मात्रा अधिक है।

कुछ उन्नत प्रभेद:

जलदी पकने वाली किस्में

बी.ओ. 90: यह एक मध्य मोटाई एवं जल्दी पकने वाली लाल विगलन रोग रोधी तथा 850 क्विं हे.उपज देने वाली प्रजाति है। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत है।
सी.ओ.पी.-2: इस प्रजाति में ज्यादा कल्ले निकलतें हैं। यह लाल विगलन रोधी हैं तथा उपज क्षमता 600 क्विंटल/ हेक्टेयर। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत है।

मध्यम तथा देर से पकने वाली किस्में

बी.ओ. 70: लाल विगलन रोग रोधी । उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में कटने योगय तैयार हो जाती है। इसमें शर्करा की मात्रा 11 प्रतिशत।
बी.ओ. 90: मध्यम मोटाई, हरा रंग, लम्बा व अधिक कल्ले पैदा करने वाली प्रजाति ।रोग रोधी उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। शर्करा की मात्रा 10.7 प्रतिशत।
सी.ओ.पी.-1: जलमग्न अवस्था के लिये उपयुक्त, अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 600 क्विंटल/ हेक्टेयर।
बी.ओ.-1: जलमग्न अवस्था के लिये उपयुक्त, अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 1100 क्विंटल/ हेक्टेयर। पेड़ी के के लिये उपयुक्त।
बी.ओ.-88: लाल विगलन रोग रोधी । अधिक कल्ले देने वाली, उपज क्षमता 1000 क्विंटल/ हेक्टेयर। शर्करा की मात्रा 10.7 प्रतिशत होती है।
सी.ओ. 1158 : लाल विगलन रोग रोधी । उपज क्षमता 950 क्विंटल/ हेक्टेयर। अधिक कल्ले, सी.ओ. 1148 औसत शर्करा की मात्रा 10.3 प्रतिशत होती है।

बीज का चुनाव:

 ऐसे बीज का चुनाव करें जिसकी आँख स्वस्थ हो एवं रोग कीट रहित हो। दस महीने की फसल बीज के लिए उपयुक्त होती है। जहाँ तक संभव हो पौधे के उपरी दो-तिहाई हिस्से को ही बीज के रूप में लेना चाहिए एवं कोशिश यह करनी चाहिए कि खूटी फसल से बीज नहीं लें।

रोपाई का समय:

 शरदकालीन गन्ना – अक्टूबर
बसन्तकालीन गन्ना – फरवरी
गन्ने की फसल की बोआई में गन्ना के तीन आँख वाला टुकड़ा अच्छा रहता है। बीज टुकड़ों को कवक आदि से बचाने के लिये 1 ग्राम थिरम व 1 ग्राम बैविस्टीन प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर दो घंटो के लिये डुबो दिया जाता है। बीज टुकड़ों को विषाणु मुक्त करने के लिये 540 से.ग्रे. तापमान वाले पानी में 2 घंटे उपचारित करना आवश्यक है।

बीज की मात्राः

 करीब 40,000 से 45,000 तीन आँखों वाले गुल्ले एक हेक्टर के लिए उपयुक्त है, जो करीब 60 क्विंटल गन्ने से प्राप्त होते हैं।

रोपनी की दूरी :

 पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सेन्टी मीटर तक रखते हैं एवं बीज को 30 सें.मी. की गहराई पर डालते हैं।

बीजोपचार:

 बीज (गुल्लों) को 0.2% कार्बेन्डाजिम (दो ग्राम प्रति लीटर पानी में) आधा घंटा तक डुबोकर उपचारित करना चाहिए। दीमक,जड़ छेदक एवं धड़ छेदक के रोकथाम के लिए क्लोरपाईरीफास 20 EC का 3 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 500 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से नालियों में बिछाई गई गेड़ियों पर छिड़काव कर मिट्टी से ढक दें।

रोपाई की विधिः

 ईंख रोप की दो अनुशंसित विधियाँ है : सिराउर विधि तथा ट्रेंच विधि।

 सिराउर विधि में 90 सें.मी. की दूरी पर खोले गये सिराउर (Furrow) के अनुशंसित खाद की मात्रा डालकर देसी हल से मिट्टी में मिला दें एवं उपचारित गुल्लियों को आँख से आँख मिलाकर बिछा देना चाहिए। उसके बाद शीघ्र ही सिराउर को ढ़क कर पाटा चला देना चाहिए। ट्रेंच विधि में भी 90 सें.मी. की दूरी पर रीजर द्वारा सिराउर खोला जाता है। इसके बाद कुदाली से 30 सें.मी. चौड़ी तथा 30 सें.मी. गहरी ट्रेंच या नाली बनाई जाती है एवं गुल्लियों को बिछा कर ढक दी जाती है।

खाद एवं उर्वरक:

 10 टन कम्पोस्ट या सड़े हुए गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में एक माह पहले डालकर अच्छी तरह मिला दें। रासायनिक खाद यानि नाइट्रोजन, फॉस्फोरस की क्रमशः 170 किलो, 85 किलो एवं 60 किलो मात्रा प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए। रोपाई के समय फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा डाल देनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची मात्रा को दो बराबर भागों में बाँटकर देना चाहिए। पहली टॉपड्रेसिंग 60 किलो नेत्रजन शरदकालीन गन्ने में बुवाई के दो महीने बाद तथा बंसत कालीन गन्ने में बुआई के 45 दिनों बाद करनी चाहिये। टॉपड्रेसिंग से पहले खरपतवार निकालकर पहले सिचाई करें फिर उसके दो दिन बाद यूरिया द्वारा टॉपड्रेसिंग करें। दूसरी टॉपड्रेसिंग (60 किलो नेत्रजन) जून माह के दूसरे पखवाड़े में वर्षांत के बाद खरपतवार निकालकर यूरिया द्वारा टॉपड्रेसिंग करें तथा मिट्टी चढ़ा दें।

निराई-गुड़ाई:

 साधारणतया ईंख में दो कमौनी, एक 45-50 दिनों के बाद एवं दूसरा 65-70 दिनों के बाद फसल के लिए उपयुक्त है। खरपतवार नष्ट करने के लिए रसायन एट्राजीन का ढाई से 3 किलो ग्राम 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से रोपाई के तीन दिनों के अन्दर छिड़काव करना चाहिए। पुनः 60 दिनों के बाद 2-4D तृण नाशक दवा 1.25 किलो ग्राम 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से काफी लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त मई के मध्य में एक गुड़ाई से खरपतवार नियंत्रण रहता है।

सिंचाई:

 रोपाई के लगभग 25 दिनों के बाद सिंचाई करें एवं 20 दिनों के अन्तराल पर बराबर पानी डालें। शरदकालीन रोप में 6-7 सिंचाई एवं बसंतकालीन में 4-5 सिंचाई की आवश्यकता मानसून के पहले तक होती है।

मिट्टी चढ़ाना:

 मानसून की पहली वर्षा में यूरिया का टॉपड्रेसिंग कर मिट्टी चढ़ा दी जाती है एवं बरसात का पानी निकलने की नाली बना दी जाती है।
सूखी पत्तियों को हटानाः सूखी पत्तियों को पाँचवे से सातवें महीने में धीरे से पौधे से अलग कर देना चाहिए।

स्तम्भनः

 फसल को बरसात के दिनों में तेज हवा एवं आँधी के कारण गिरने से बचाने के लिए अगस्त से मध्य सितम्बर तक पत्ती रस्सी विधि से स्तम्भन कर दें। इसके लिए ईख की आमने- सामने की पत्तियों को एक दूसरे तक झुकाकर उसी की कुछ सूखी एवं पत्तियों से बाँध दें।

पौधा संरक्षण:

 स्वस्थ बीज एवं रोगरोधी प्रभेद को ही लगावें। रोग का सर्वेक्षण खड़ी फसल में करते रहना चाहिए। यदि कोई झुड़, लालसड़न या कलिका रोग से ग्रसित दिखें तो शुरू में ही सावधानी से उखाड़कर नष्ट कर दें। लाल सड़न रोग में रोगी तने के गूदे लाल रंग के हो जाते हैं। पत्तियों की मध्य शिराओं में भी लाल धब्बे बनते हैं।

कीट:

 कीटों में शीर्ष छेदक, पायरीला तथा श्वेत मक्खी आदि का प्रकोप ईंख फसल पर पाया जाता है। कल्ला, मूल एवं शीर्ष छिद्रक के प्रकोप के कारण बीच की पत्तियाँ सूख जाती है जिसे पिहका कहते हैं। निजात के लिए इमिडाक्लोप्रीड तरल (17.8%) या मोनोक्रोटोफाँस (368% तरल) या मिथाईल डिमेटान (25 EC) का एक मिली लीटर प्रति लीटर पानी में घोलकर पहला छिड़काव जून के अंतिम सप्ताह में तथा दूसरा अगस्त के प्रथम सप्ताह में अवश्य कर दें जिससे सभी कीटों का नियंत्रण हो जायेगा।

कटाई:

 मुख्यतया 12 महीनों में फसल तैयार हो जाती है। मुख्यकालीन प्रभेदो की कटाई 15 जनवरी से करें।

खूटी :

 मुख्य फसल की कटाई के सप्ताह भर के अन्दर खूटियों को तेज धार वाले यंत्र से काट देना चाहिए। मेड़ों को तोड़ देना चाहिए, इस प्रकिया से खूटी में कल्ले स्वस्थ तथा एक साथ निकलते हैं। खेत की खाली जगहों को अंकुरित टुकड़ों की रोपाई से भर देना चाहिए एवं उर्वरक का उपयोग करना चाहिए।

उपज:


 शरद रोप से करीब 100 टन एवं वसंत रोप से 75 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती 

मूंगफली की जैविक खेती

मूंगफली की जैविक खेती (Organic farming of peanuts)


https://smartkhet.blogspot.com/2017/10/Organic-farming-of-peanuts.html



‘गरीबों का काजू' के नाम से मशहूर मूँगफली काजू से ज्य़ादा पौष्टिक है परन्तु मूँगफली खाने वाले यह नहीं जानते,मूँगफली में सभी पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। मूँगफली खाकर हम अनजाने में ही इतने पोषक तत्व ग्रहण कर लेते हैं जिन का हमारे शरीर को बहुत फायदा होता है , आधे मुट्ठी मूगफली में 426 कैलोरीज़ होती हैं, 15 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, 17 ग्राम प्रोटीन होता है और 35 ग्राम वसा होती है। इसमें विटामिन ई, के और बी6 भी प्रचूर मात्रा में होती है। यह आयरन, नियासिन, फोलेट, कैल्शियम और जि़ंक का अच्छा स्रोत हैं।मूँगफली वानस्पतिक प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत हैं। इसमें प्रोटीन की मात्रा मांस की तुलना में 1.3 गुना, अण्डों से 2.5 गुना एवं फलों से 8 गुना अधिक होती है। मूँगफली वस्तुतः पोषक तत्त्वों की अप्रतिम खान है। प्रकृति ने भरपूर मात्रा में इसे विभिन्न पोषक तत्त्वों से सजाया-सँवारा है। 100 ग्राम कच्ची मूँगफली में 1 लीटर दूध के बराबर प्रोटीन होता है। मूँगफली में प्रोटीन की मात्रा 25 प्रतिशत से भी अधिक होती है, जब कि मांस, मछली और अंडों में उसका प्रतिशत 10 से अधिक नहीं। 250 ग्राम मूँगफली के मक्खन से 300 ग्राम पनीर, 2 लीटर दूध या 15 अंडों के बराबर ऊर्जा की प्राप्ति आसानी से की जा सकती है। मूँगफली पाचन शक्ति बढ़ाने में भी कारगर है। 250 ग्राम भूनी मूँगफली में जितनी मात्रा में खनिज और विटामिन पाए जाते हैं, वो 250 ग्राम मांस से भी प्राप्त नहीं हो सकता है

जलवायु

मूँगफली की फसल उष्ण कटिबन्ध की मानी जाती है, परन्तु इसकी खेती शीतोष्ण कटिबन्ध के परे समशीतोष्ण कटिबन्ध  में भी, उन स्थानो  पर जहाँ गर्मी का मौसम पर्याप्त लम्बा हो, की जा सकती है  । जीवन काल में थोड़ा पानी, पर्याप्त धूप तथा सामान्यतः कुछ अधिक तापमान, यही इस फसल की आवश्यकताएं है । जहाँ रात में तापमान अधिक गिर जाता है, वहाँ पौधो  की बाढ़ रूक जाती है । इसी बजह से पहाड़ी क्षेत्रो  में 3,500 फिट से अधिक ऊँचाई पर इस फसल को  नहीं बोते है । इसके लिए अधिक वर्षा, अधिक सूखा तथा ज्यादा ठंड हानिकारक है। अंकुरण एंव प्रारंभिक वृद्धि के लिए 14 डि से.-15 डि से. तापमान का होना आवश्यक है। फसल वृद्धि के लिए 21-30 डि . से. तापमान सर्वश्रेष्ठ रहता है। फसल के जीवनकाल के दौरान सूर्य का पर्याप्त प्रकाश, उच्च तापमान तथा सामान्य वर्षा का होना उत्तम रहता है।  प्रायः 50-125 सेमी. प्रति वर्ष वर्षा वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त समझे जाते है। पौधों की वृद्धि एंव विकास के लिए सुवितरित 37-62 सेमी. वर्षा अच्छी मानी जाती है। फसल पकने तथा खुदाई के समय एक माह तक गर्म तथा स्वच्छ मौसम अच्छी उपज एंव गुणों के लिए अत्यंत आवश्यक है।कटाई के समय वर्षा होने से एक तो  खुदाई  में कठिनाई  होती है, दूसरे मूँगफली का रंग बदल जाता है और  फलियो  में बीज उग आने  की सम्भावना रहती है । धूप-काल  का इस फसल पर कम प्रभाव पड़ता है । मूँगफली के कुल क्षेत्रफल का लगभग 88 प्रतिशत भाग खरीफ में और शेष भाग जायद मौसम में उगाया जाता है।

भूमि 

देश के बिभिन्न भागो में मूंगफली कि खेती बलुवर , बलुवर दोमट , दोमट और काली मिटटी पर सफलता पूर्वक कि जाती है परन्तु बलुवर दोमट भूमि मूंगफली के लिए सबसे उत्तम होती है भारी और कड़ी भूमि मूंगफली के लिए अनुपयुक्त होती है कड़ी मृदा होने पर फलियाँ अच्छी प्रकार से नहीं बढ़ पाती उसकी अधिक पैदावार 5.0 पि एच से ऊपर वाली भूमि में प्राप्त होती है मूंगफली कि अच्छी उपज के लिए भूमि हलकी होनी चाहिए और जिवांस पदार्थ प्रयाप्त मात्रा में होनी चाहिए भारी भूमियों कि अपेक्षा हलकी भूमियों कि मूंगफली का रंग अच्छा होता है छिलका पतला होता है और अधिक उपज देती है .

भूमि  की तैयारी

खेत में 10-15 से मी गहरी जुताई करना लाभदायक है खेत कि अधिक गहरी जुताई करने पर भूमि में मूंगफलियों का बनना अथवा अधिकालिन अधिक गहराई पर फलियों का बनना खुदाई के समय कठिनाई उत्पन्न करता है मृदा कि किस्म के अनुसार बिभिन्न क्षेत्रो में खेत कि तैयारी करते है जुताई करने के लिए भिन्न भिन्न क्षेत्रो में भिन्न भिन्न प्रकार के यंत्रो का प्रयोग करते है हलकी भूमियों में जुताई कि संख्या कम या भारी भूमियों में जुताई कि संख्या अधिक होती है मध्य भारत में प्रथम जुताई बक्खर से व बाद कि 5-7 जुताई से देसी हल व कल्टीवेटर से करते है खेत ग्रीष्म काल में अगर खाली है तो गर्मियों में खेत कि जुताई करके खुला छोड़ देना चाहिए जिन क्षेत्रो में बक्खर का प्रयोग नहीं किया जाता वंहा पर प्रथम जुताई मिटटी पलटने वाले हल से पहली फसल कटाने के तुरंत बाद ही करनी चाहिए जिन कृषको के पास उन्नत कृषि यंत्र जैसे हैरो आदि है तो उन्हें पहली वर्षा होने पर 2-3 बार हैरो चलाकर भूमि को - भुरभुरा करना चाहिए .

जलवायु

उष्ण कटिबंधीय पौधा होने के कारण इसे लम्बे समय तथा गर्म मौसम कि आवश्यकता पड़ती है , अंकुरण और प्रारंभिक बृद्धि के लिए 14-15 डिग्री सेल्सियस तापमान का होना आवश्यक है फसल के जीवन काल में प्रयाप्त सूर्यप्रकाश का उच्च तापमान तथा सामान्य वर्षा का होना अति उत्तम रहता है फसल के बृद्धि के लिए सर्वोत्तम तापमान 70-80 डिग्री फारेनहाईट होता है पाला पड़ने पर सम्पूर्ण फसल नष्ट हो सकती है मूंगफली कि खेती उन सभी स्थानों पर जहाँ 60 - 130 मी वार्षिक वर्षा होती है कि जाती है बहुत अधिक वर्षा भी मूंगफली से कि खेती के लिए हानिकारक होती है फसल के कटाई के समय स्वच्छ और तेज धुप होना अति लाभदायक होता है क्योकि इस अवस्था में उत्पाद भली भांति सुख जाता है तथा उत्पाद के गुण भी अच्छे होते है .

प्रजातियाँ 

प्राचीन काल से ही उन्नत बीज कृषि का एक आवश्यक अंग रहा है। मूँगफली की पुरानी किस्मों की अपेक्षा नई उडन्नत किस्मों की उपज क्षमता अधिक ह¨ती है और उन पर कीटों तथा रोगों का प्रकोप भी कम होता है। अतः उन्नत किस्मों के बीज का प्रयोग बुवाई के लिए करना चाहिए। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु एंव मृदा के अनुसार अनुमोदित किस्मों का उपयोग करना चाहिए।

मूँगफली की प्रमुुख उन्नत किस्मों की विशेषताएँ

1.एके-12-24: मूंगफली की सीधे  बढने वाली यह किस्म 100-105 दिन में तैयार होती है । फलियो  की उपज 1250 किग्रा. प्रति हैक्टर आती है । फलियो  से 75 प्रतिषत दाना प्राप्त होते है । दानो  में 48.5 % तेल पाया जाता है । 
2.जे-11: यह एक गुच्छेदार किस्म है ज¨ कि 100-105 दिन में पककर 1300 किग्रा. प्रति हैक्टर फलियाँ उत्पन्न करने की क्षमता रखती है । खरीफ एवं गर्मी में खती करने के लिए उपयुक्त है । फलियो  से 75 प्रतिशत दाना प्राप्त होता है तथा दानो में 49 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।
3.ज्योति : गुच्छे दार किस्म  है जो की 105-110 दिन में तैयार होकर 1600 किग्रा. प्रति हैक्टर फलियाँ पैदा करने की क्षमता रखती है । फलियो  से 77.8 प्रतिशत दाना प्राप्त होता है तथा दानो  में 53.3 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।
4.कोंशल (जी-201): यह एक मध्यम फैलने वाली किस्म है जो कि  108-112 दिन में पककर तैयार होती है और  1700 किग्रा. प्रति हैक्टर फलियाँ पैदा करने की क्षमता रखती है । फलियो  से 71 प्रतिशत दाना प्राप्त होता है तथा दानो  में 49 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।
5.कादरी-3:  यह शीघ्र तैयार ह¨ने वाली (105 दिन) किस्म है जिसकी उपज क्षमता 2100 किग्रा. प्रति हैक्टर है । फलियो  से 75 प्रतिशत दाना मिलता है और  दानो  में 49 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।
6.एम-13: यह एक फैलने वाली किस्म हैजो  कि सम्पूर्ण भारत में खेती हेतु उपयुक्त रहती है । लगभग 2750 किग्रा. प्रति हैक्टर उपज क्षमता वाली इस किस्म की फलियो  से 68 प्रतिशत दाना प्राप्त होता है तथा दानो  में 49 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।
7.आईसीजीएस-11: गुच्छेदार यह किस्म 105-110 दिन में तैयार होकर 2000 किग्रा. प्रति हैक्टर उपज देती है । इसकी फलियो  से 70 प्रतिशत दाना मिलता है तथा दानो  में तेल की मात्रा 48.7 प्रतिशत होती है ।
8.गंगापुरीः मूंगफली की यह गुच्छे वाली  किस्म है जो  95-100 दिन में तैयार ह¨ती है । फलियो  की उपज 2000 किग्रा. प्रति हैक्टर आती है । फलियो  से 59.7 प्रतिशत दाना प्राप्त हो ते है । दाने  में 49.5 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।
9.आईसीजीएस-44: मूंगफली की  मोटे दाने वाली किस्म है । फलियो  की उपज 2500 किग्रा. प्रति हैक्टर आती है । फलियो  से 72 प्रतिषत दाना प्राप्त होते है । दाने  में 49 प्रतिशत तेल पाया जाता है ।
10.जेएल-24 (फुले प्रगति): यह एक शीघ्र पकने वाली (90-100 दिन) किस्म है । इसकी उपज क्षमता 1700-1800 किग्रा. प्रति हैक्टर ह¨ती है । दानो  में तेल 50-51 प्रतिशत होता है ।यह मध्यम सघन बढ़ने वाली चिकनी फल्लियो  वाली किस्म है ।
11.टीजी-1(विक्रम): यह किस्म 120-125 दिन में पककर तैयार ह¨ती है जिसकी उपज क्षमता 2000-2500 किग्रा. प्रति हैक्टर ह¨ती है । दानो  में तेल की मात्रा  46-48 प्रतिशत पाई जाती है ।यह एक वर्जीनिया अर्द्ध फैलावदार किस्म है ।
12.आई.सी.जी.एस.-37: यह किस्म 105-110    दिन में तैयार ह¨ती है जिसकी उपज क्षमता 1800-2000 किग्रा. प्रति हैक्टर तक ह¨ती है । दानो  में 48-50 प्रतिशत तेल पाया जाता है । यह एक अर्द्ध फैलने वाली किस्म है ।

बोआई का समय  

 बोआई के समय का मूंगफली की उपज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है । बोआई के समय खेत में पर्याप्त नमी होना चाहिए परन्तु अधिक नमी में भी बीज सड़ने की संभावना रहती है । खरीफ में मूँगफली की बोआई जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के दूसरे सप्ताह तक की जानी चाहिऐ।  पलेवा देकर अगेती बोआई करने से फसल की बढवार तेजी से होती है तथा भारी वर्षा के समय फसल को नुकसान नहीं पहुँचाता है। वर्षा प्रारम्भ होने पर की गई बोआई से पौधो की बढ़वार प्रभावित होती है साथ ही खरपतवारों का प्रकोप तीव्र गति से होता है।

बीज दर एंव बोआई 

 बीज के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली मूँगफली पूर्ण रूप से विकसित, पकी हुई मोटी, स्वस्थ्य तथा बिना कटी-फटी होनी चाहिए । बोआई के 2-3 दिन पूर्व मूँगफली का छिलका सावधानीपूर्वक उतारना चाहिए जिससे दाने के लाल भीतरी आवरण को क्षति न पहुँचे अन्यथा बीज अंकुरण शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। एक माह से ऊपर छीले  गये बीज अच्छी तरह नहीं जमते । छीलते समय बीज के साथ चिपका हुआ कागज की तरह का पतली झिल्ली नहीं उतारना चाहिए क्योकि इसके उतरने या खरोच लगने से अंकुरण ठीक प्रकार नहीं होता है ।  

 बीज की मात्रा


अच्छी उपज के लिए यह आवश्यक है कि बीज की उचित मात्रा प्रयोग में लाई जाए। मूँगफली की मात्रा एंव दूरी किस्म एंव बीज के आकार पर निर्भर करती है। गुच्छे वाली किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी. रखनी चाहिए। ऐसी किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेमी. रखी जाती है और उनके लिए प्रति हेक्टेयर 60-80 किग्रा. बीज पर्याप्त होता है। दोनों प्रकार की किस्मों के पौधों की दूरी 15-20 सेमी. रखना चाहिए। भारी मिट्टि में 4-5 सेमी. तथा हल्की मिट्टि में 5-7 सेमी. गहराई पर बीज बोना चाहिए। मूँगफली को किसी भी दशा में 7 सेमी. से अधिक गहराई पर नहीं बोना चाहिए। अच्छे उत्पादन के लिये लगभग 3 लाख पौधे प्रति हेक्टेयर होना चाहिए।

बोने की बिधि 

मूंगफली कि बुवाई के लिए निम्न लिखित बिधियाँ प्रचलित : है -

हल के पीछे  बोना

इस बिधि में देसी हल के पीछे बीजकि बुवाई 5-6 से मी गहरी कुण्ड में कि जाती है दो कुंदो के बिच का अंतरण आवश्यकता अनुसार रखते है .

डिबलर  बिधि

अधिको क्षेत्र पर बुवाई करने के लिए यह बिधि प्रयोगात्मक नहीं है कम क्षेत्रकी बुवाई के लिए बिज कि खुरपी या डिबलर कि सहायता से बुवाई करते है समय और श्रम कि आवश्यकता इस बिधि में अधिक पड़ती है .

सीड प्लान्टर  बिधि

अधिक क्षेत्रफल में कम समय में बुवाई करने के लिए यह बिधि अधिक उपयोगी है इस बिधि द्वारा बुवाई करने पर प्रति इकाई क्षेत्र खर्च भी अधिक आता है , बिज बोने के बाद पाटा चलाकर ढक देते है .

पौधों का अंतरण 

पौधों के अंतरण का फसल कि उपज पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है पक्तियों व पौधों के बीच रखे गए अंतरण पर मूंगफली कि जाती मृदा उर्बरता व बोने का समय आदि का भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है गुच्छेदार सीधी बढ़ने वाली जातियों में अंतरण कम व फ़ैलाने वाली जातियों में अंतरण अधिक रखा जाता है .
1- गुच्छेदार जातियां : - 45 से मी गुणे 10 से मी .
2 - फैलकर चलने वाली जातियां : ---60 - से मी गुणा 10 से मी .

बोने की गहराई 

भारी मृदो में बुवाई 4-5 से मी गहराई पर व हलकी भूमियो में बुवाई 5-6 से मी कि गहराई पर करते है .

खाद एंव उर्वरक 

मूँगफली की अच्छी उपज लेने के लिए  भूमि में कम से कम 35-40 क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद  50 किलो ग्राम नीम की खली और 50 किलो अरंडी की खली आदि इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर खेत में बुवाई से पहले इस मिश्रण को समान मात्रा में बिखेर लें  इसके बाद खेत में अच्छी तरह से जुताई कर खेत को तैयार करें इसके उपरांत बुवाई करें |


दलहनी फसल होने के कारण इस फसल को फास्फोरस की अधिक आवश्यकता पड़ती है। यह जड़ों के विकास तथा लाभदायक जीवाणुओं की वृद्धि में भी सहायता होती है। इससे नत्रजन का संस्थापन भी अधिक होता है। मूँगफली के लिए 40-60 किग्रा. फास्फोरस प्रति हे. पर्याप्त होता है। इनका प्रयोग इस तरह से करना चाहिए, जिससे कि यह बीज के 3-5 सेमी. नीचे पड़े। इसके लिए उर्वरक ड्रिल  नामक यंत्र का प्रयोग किया जा सकता है।

सिंचाई 

सिंचाई और जल निकाश उत्तरी भारत में मूंगफली कि बुवाई वर्षा प्रारंभ होने पर करते है : अत सिंचाई कि बिशेष आवश्यकता नहीं होती है . दक्षिणी भारत में ग्रीष्म कालीन फसल में 10-15 दिन के अंतर पर सिंचाई कि आवश्यकता होती है गुच्छेदार जातियों में 8-10 व फैलने वाली जातियों में 10-12 सिंचाइयों कि आवश्यकता होती है खरीफ के फसल में सुखा पड़ने पर आवश्यकता नुसार 2-3 सिंचाई कर सकते है फलियों में दाने भरते समय भूमि में प्रयाप्त नमी होना आवश्यक है भारी वर्षा के कारण जब खेत में पानी इकठ्ठा होने लगे तो जल निकाश करना आवश्यक है .

खरपतवार

निराई गुड़ाई का मूंगफली कि खेती में बहुत अधिक महत्व है 15 दिन के अंतर पर 2-3 गुड़ाई निराई करना लाभदायक है गुच्छेदार जातियों में मिटटी चढ़ाना लाभदायक पाया गया है जब पौधों में फलियों के बनने का कि क्रिया प्रारंभ हो जाय तो कभी भी निराई गुड़ाई या मिटटी चढ़ाने कि क्रिया नहीं करनी चाहिए .

 कीट -

बिहार रोमिल सुंडी 

यह एक मध्यम आकार का किट है जिसके पंखो पर काले धब्बे होते है इसकी सुंडी नारंगी रंग कि होती है यह पट्टी कि उपरी सतह को खा जाती है जिससे पौधोंको भोजन बनाने कि क्रिया या प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है और पौधा पूर्ण भोजन नहीं बना पता इसके कर्ण फसल को बड़ी हानी होती है यह किट कुछ दूसरी फसल और मूंगफली कि फसल पर जुलाई से अप्रैल तक प्रभावी होता है और फसलो को क्षति पहुचता है .

तम्बाकू की सुंडी 

यह सुंडी लगभग 4 से मी लम्बी होती है यह सुंडी काली और कुछ हरे काले रंग कि होती है इसका मौथ मध्यम आकार का काले भूरे रंग का होता है इसकी सुंडी हरी पत्तियों को खाती है और इस कारण से उत्पादन में बहुत हानी होती है .

सफ़ेद सुंडी 

यह भूमि के अन्दर जुलाई से सितम्बर तक क्रिया शील रहती है ये प्रारंभिक अवस्था में पौधों कि जड़ो को हानी पहुचाते है जिसके फलस्वरूप पौधे सुख जाते है .

दीमक -

यह मूंगफली का बहुत भयंकर किट है यह भूमि के अन्दर रहती है और पौधों कि जड़ो को खाती है .

रोग 

एन्थ्रेकनोज 

इस बीमारी के लक्षण पत्तियों और उनके डंठल पर देखने को मिलते है पत्तियां जगह जगह से पिली पड़ जाती है यह रोग अधिकतर उत्तर प्रदेश में देखा गया है .

कोलर रोट 

यह रोग अंकुरित बीजांकुर में अधिक लगता है और इस अवस्था में बहुत क्षति पहुचता है इसके बाद भी जो पौधे बचते है वह भी कमजोर हो जाते है यह बिज जनित , भूमि जनित रोग है उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए .

गेरुई 

यह पत्तियों कि निचली सतह पर गहरे भूरे रंग के धब्बे ऊपर सतह कि तुलना में अधिक पाए जाते है धब्बे प्रारंभ में हलके भूरे रंग के होते है फंफूद से यह बीमारी लगती है बीमारी रहित बिज उपचारित करके बोना चाहिए रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए .

जड़ बिगलन

यह एक बहुत हानिकारक बीमारी है और भारत वर्ष के मूंगफली उगाये जाने वाले सभी भागो में पाई जाती है यह रोग लगातार एक ही खेत में मूंगफली कि फसल लेते रहने से लग जाता है . यह रोग पौधों के अंकुरण के समय ही लगना प्रारंभ हो जाता है पौधे गिरने लगते है और फसल को बहुत क्षति पहुंचती है इसकी रोकथाम के लिएलगातार कई वर्षो तक एक खेत से मूंगफली कि फसल नहीं लेनी चाहिए अर्थात उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए इसके अतिरिक्त बिज को आर्गनिक बिधि से उपचार करना चाहिए और आर्गनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहिए .

टिक्का रोग

यह एक सफ़ेद फंफूद द्वारा लगता है इसके द्वारा फसल को बहुत हानी होती है प्रारंभिक अवस्था में इस रोग के लक्षण निचे कि पत्ती पर दिखाई देता है इन पत्तियों पर गहरे धब्बे बन जाते है बाद में ये धब्बे गोल चकत्तों में बदल जाते है इन धब्बो का ब्यास 1-2 मिमी होता है और ये काले भूरे रंग के हो जाते है धब्बो कि संख्या निरंतर बढ़ती जाती है और जिसके कारण पत्तियां गिरने लगती है .

चारकोल सडन

यह बीमारी फंफूद से फैलती है तने पर मृदा तल के नजदीक लाल भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते है धब्बे तने पर ऊपर कि ओर और जड़ो में निचे कि ओर तेजी से बढ़ते है तथा शीघ्र ही पौधों कि मृत्यु हो जाती है रोग से प्रभावित पौधा को इकठ्ठा कर जला देना चाहिए गहरी जुताई आवश्यक है .

रोजेट या बिशाणु  रोग 

यह एक बिशाणु द्वारा उत्पन्न होने वाला रोग है यह बिशाणु एफिड द्वारा फैलाया जाता है इस रोग के प्रभाव से पौधे बौने रह जाते है तथा इसका रूप रोजेट जैसा होजाता है पौधे पीले पड़ जाते है और मोजैक जैसा रूप दिखाई देने लगता है .

रोग और किट नियंत्रण या उपचार 

नीम कि ताजी हरी पत्ती 25 किलो ग्राम तोड़कर अच्छी तरह से कुचल कर 50 लीटर पानी में पकाना चाहिए जब पानी 20-25 किलोग्राम रह जाय उतार कर , ठंडा कर किसी बर्तन में सुरक्षित रख लेना चाहिए जब रोग या किसी भी प्रकार के किट का आक्रमण हो 200 लीटर पानी में 5 लीटर नीम का पानी और तो 10 लीटर गौ मूत्र अच्छी तरह मिलकर पम्प द्वारा प्रति एकड़ तर बतर कर छिड़काव करते रहना चाहिए जब तक रोग या किट का प्रकोप पूरी तरह से ख़तम न हो जाय . भूमि जनित और बिज जनित रोगों के लिए या किट पतंगों जैसे दीमक आदि के लिए आर्गनिक बिधि से बीजोपचार करना चाहिए और रासायनिक खाद छोड़ आर्गनिक खाद का उपयोग करना चाहिए

बीजउपचार 

 5  लीटर देसी गाय का मूत्र में बिज भिगोकर 2-3 घंटे बाद सूखने पर बुवाई करे .
देसी गाय का मट्ठा 5 लीटर लेकर 15 चने के आकार के बराबर हिंग लेकर पिस कर अच्छी तरह मिलाकर घोल बनाना चाहिए इस घोल को बीजो पर डाल कर भिगो देना चाहिए 2-3 घंटे बाद सुख जाने परबुवाई करे यह घोल एक एकड़ के लिए पर्याप्त है .
खेत में दीमक का प्रकोप होने पर केरासिन तेल से बीजउपचारित कर बुवाई करे .
साधारणतया छोटी फलियों वाली जातियां जैसे स्पैनिश आदि कि बुवाई फलियों को छीलकर दाने को बिज के रूप में प्रयोग किया जाता है अनुसंधानों के आधार पर यह पाया गया है फलियों का सीधा खेत में बोने पर बिज कि मात्रा प्रति इकाई क्षेत्र अधिक पड़ती है क्योकि फलियों कि बुवाई करने पर बिज का अंकुरण देर में होता है व पूरी कि पूरी फली नष्ट हो जाती है मृदा में प्रयाप्त नमी होने पर फलियों को बिज के रु में प्रयोग किया जाता है फलियों को बिज के रूप में लाने के लिए निम्नलिखित क्रियाये करना आवश्यक है : -

- 1 फलियों के छिलके को हलके दबाव से तोड़ना चाहिए जिससे कि दाने न टूट पायें व बिज को टूटे हुए छिलके के अन्दर ही बना रहने देना चाहिए .

- 2 बुवाई के पहले फलियों को 14 घंटे तक पानी में भिगोना चाहिएजिससे कि फलियाँ प्रयाप्त मात्रा में पानी या नमी का शोषण कर सके मूंगफली के दाने को बिज के रूप में प्रयोग करने से पहले फलियों से बाहर निकलना पड़ता है फलियों के दाने कि बुवाई से 1-2 पहले निकाल लेना चाहिए अधिक दिन पहले दानो को फलियों से बाहर निकालने पर भी दानो का अंकुरण क्षमता कम हो जाती है फलियों से दाने निकालने का कार्य अपने देश में अधिकांस रूप में हाथ से कियाजाता है फलियों से दाने निकलते समय यह ध्यान दिन रखना आवश्यक है कि दाने के ऊपर स्थित लाल छिलके पर किसी प्रकार का घात न आये लाल छिलके नष्ट होने पर भी बिज का अंकुरण शक्ति नष्ट हो जाती है बोने से पूर्ब 12-14 घंटे तक फलियों से निकले दाने को भी पानी में भिगोकर रखने से अंकुरण प्रतिशत बढ़ाती है और शीघ्र अंकुरण होता है अंकुरण इस अवस्था में और बाद में फसल पर बिज से उत्पन्न होने वाली बिमारियों का प्रकोप होता है - कभी कभी बिज अंकुरण से पहले ही सड़ कर नष्ट हो जाता है बुवाई से पहले बिज का उपचार उपरोक्त बिधि से कर लेना चाहिए .

कटाई - मड़ाई -

अधिक उपज और तेल कि मात्रा प्राप्त करने के लिए फसल कि उचित समय पर कटाई करना लाभदायक है अधपकी फसल को काटने पर उपज एवं तेल के गुणों में कमी आ जाती है मूंगफली के पौधों में फुल एक साथ न आक़र धीरे धीरे बहुत समय तक आते है गुच्छेदार जातियों में दो महीने तक व फैलने वाली जातियों में तिन महीने तक फुल आते रहते है दोनों जातियों में फलियों के बिकास के लिए दो माह का समय आवश्यक है खुदाई के के समय सभी फलियाँ पूर्ण रूप से पकी हुई नहीं होती : अत फसल कि खुदाई के समय ध्यान रखने योग्य बात यह है खुदाई ऐसे समय पर ही करे जब अधिकतर फलियाँ पक जाय देर से खुदाई करने पर पर जिन जातियों में सुषुप्ता अवस्था नहीं होती वे खेत में नमी मिलने पर : पुन अंकुरण कर सकती है इन जातियों में पौधों से पत्तियां गिर जाती है व पौधा सुख जाता है जब पौधे पीले पड़ जाय व अधिकांस पत्तियां गिर जाय तभी फसल कि कटाई करनी चाहिए फसल कि पूर्णतया परिपक्वता पर मृदा की किस्म मृदा में नमी कि मात्रा जलवायु व फसल कि जाती का प्रभाव पड़ता है सामान्य परिस्थितियों में अगेती जातियां 105 दिन पछेती जातियां 135 दिन तक कट जाती है बिभिन्न अवस्थाओ में फसल पकने की तथा खुदाई कि उपयुक्त अवस्था ज्ञात करने के लिए बनस्पति भागो को देखकर जब यह संभावना लगने लगे कि फसल पक गयी है तो कुछ दिनों के अंतर पर खेत से कुछ पौधे उखाड़ कर समय समय पर फसल के पकने का निरिक्षण करना चाहिए जब प्रति पौधे से अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ण बिकसित तथा परिपक्व फलियाँ प्राप्त हो तभी फसल कि कटाई करनी चाहिए पौधों और फलियों में निम्नलिखित लक्षण प्रकट होने पर फसल के पकने का अनुमान लगाया जाता है
  • पौधों कि पत्तियां पीली पड़ कर सूखने लगती है .
  • पौधे मुरझा कर गिरने लगते है .
  • फलियों के छिलके का रंग सुनहरा हो जाता है .
  • फलियों के दाने के ऊपर का छिलका अधिक चमकदार रंग का हो जाता है .
  • फलियों के छिलके कि सतह पर कुछ जातियों में धारियां अच्छी प्रकार दिखाई देने लगती है .
  • अपरिपक्व फलियाँ अँगुलियों से दबाने पर शीघ्र टूटती है. लेकिन परिपक्व फलियाँ दबाने पर आसानी से नहीं टूटती.
  •  कुछ जातियों के फलियों में पकाने पर छिलके कि अन्दर कि सतह पर काले धब्बे पड़ जाते है

 उपरोक्त लक्षण के स्पष्ट होने पर फसल कि खुदाई कर लेनी चाहिए फसल कि खुदाई हाथ से पौधों को उखाड़ कर देसी हल चलाकर या ब्लड हैरो से करते है खुदाई का कार्य अपने देश में श्रमिको द्वारा अधिकतर किया जाता है मशीनो से खुदाई करने का प्रचलन हमारे देश में अभी तक नहीं है हाथ से खुदाई करना या पौधों को उखाड़ना गुच्छेदार जातियों में लाभदायक है क्योकि इसमे फलियाँ जमीन के सतह के करीब बनती है हाथ से खुदाई कराते समय मृदा में नमी का होना आवश्यक है जिससे कि पौधे आसानी से उखाड़े जा सके फ़ैलाने वाली जातियों में फलियाँ निचे भूमि में गहरे तक बनती है इनकी खुदाई में अधिक श्रम कि आवश्यकता पड़ती है : अत इन जातियों कि खुदाई हल चलाकर लेते है कुछ स्थानों पर फावड़े से पौधों को उखाड़ कर फलियाँ अलग कर लेते है दक्षिणी भारत में कुछ स्थानों पर फसल कि पत्तियाँऔर तना पहले तोड़ लिया जाता है तथा खेत में प्रयाप्त पानी भरकर कई बार हल चला दीया जाता है इस प्रकार फलियाँ हलकी होने के कारण पानी में ऊपर तैरने लगती है इन तैरती हुयी फलियों को खेत में एकत्रित कर लिया जाता है फलियों को पौधों से अलग करने से पूर्ब उन्हें एक सप्ताह तक सुखाना चाहिए अधिक नमी वाले फलियों के गुणों में कमी आ जाती है : अत फलियों को तब तक सुखाना चाहिए जब तक फलियों में 9-10 % तक नमी रह जाये बीजो के लिएफलियों को अच्छी प्रकार सुखाना चाहिए तथा बिज को फली में ही रहने देना चाहिए .

उपज 

मूंगफली में फसल कि उपज बिभिन्न परिस्थितियों के अनुसार 10-12 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक पाई जाती है गुच्छेदार जातियां 8-10 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक व फ़ैलाने वाली जातियां 12 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है सिंचित क्षेत्रो में सभी मृदा व जलवायु कि परिस्थितियाँ अनुकूल होने 30 कुंतल प्रति हेक्टेयर तक उपज होती है 70% मूंगफलीसे बिज और तेल 40% तक प्राप्त होता है पर .

भण्डारण 

मूंगफली के फलियों का संग्रह गोदामों में ही करना चाहिए बीजो को फलियों से निकाल कर संग्रह करने पर बीजो के गुण में कमी आती है संग्रह के समय फलियों 5% से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए उच्च ताप पर संग्रह से करने से सुषुप्तावस्था कि अवधी में वृद्धि होती है.